सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: कुमाता

रोशनी जब ग्यारह वर्ष की थी तब उसकी मम्मी उसे तथा उसके तीन बहन भाईयों को छोड़कर अपने प्रेमी के साथ फरार हो गई थी रोशनी ने ग्यारह वर्ष की उम्र से अपने छोटे बहन भाईयों को पाला था रोशनी पढ़ने में होशियार थी मगर उसके बूढ़े दादा दादी ने उसकी शादी अठारह वर्ष की उम्र में ही कर दी शादी के दो साल बाद वो मायके आई थी अपने छ़ माह के बेटे अंशु के साथ जबकि उसकी सहेलियाँ कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं और पढ़ने लिखने की उम्र में रोशनी गृहिणी होने के साथ ही एक बच्चे की माँ भी बन गई थी।
रोशनी के दो भाई तथा एक बहन थी इस तरह वे चार भाई बहन थे जब उनकी माँ अपनी ममता को त्यागकर अपने प्रेमी के साथ चली गई तब रोशनी का सबसे छोटा भाई राहुल कुल एक वर्ष का था उसका दूध भी नहीं छूटा था। रोशनी के पापा नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते थे । रोशनी अपने दादा दादी और माँ रेशम बाई के साथ अपने तीनों भाई बहनों के साथ रह रही थी किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी की रेशम बाई का किसी से चक्कर चल रहा है वो तो जब प्रेमी के साथ फरार हुई तब रोशनी के दादा दादी के होश उड़ गए रोशनी के पापा तो बदहवास हालत में घर आए उन्होंने रेशम बाई को ढूँढ़ने की खूब कोशिप की मगर असफलता हाथ लगी वे चाँदबड़ में रहते थे चाँदबड़ में जब उनकी बदनामी हुई तो वे देवीपुर आ गए । पिताजी कुछ दिन रुककर,अपनी नौकरी पर चले गए रोशनी और दादी ने घर का काम सम्हाला तथा बच्चों की देखरेख की दादा जी मजदूरी करते थे दादी बीयर,फेक्ट्री में काम करती थीं रोशनी ने जब आठवीं पास की तो ए ग्रेड होते हुए भी उसकी पढ़ाई छुड़वा दी गई रोशनी चौदह साल की उम्र में दादी के साथ बीयर फेक्ट्री में काम करने जाने लगी थी । पिताजी ने दंसरी शादी कर ली थी रोशनी की सौतैली माँ का बच्चों से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था । पिताजी भी घर में पैसे नहीं देते थे अपनी नई पत्नी पर,वे सारा पैसा खर्च कर रहे थे। रोशनी की शादी होने के बाद उसकी छोटी बहन किरण बीयर फेक्ट्री में काम करने जाने लगी थी। रोशनी की माँ अपने प्रेमी के साथ चाँदबड़ में रह रही थी और अपने प्रेमी के दो बच्चों की माँ भी बन गई थी। रोशनी अपने छोटे भाई राहुल को लेने के लिए आई थी राहुल चौथी में पढ़ रहा था राहुल से बड़ा भाई रजत अंडे की दुकान पर काम करने लगा था रोशनी का यह सोचना था कि वो अपने छोटे भाई को खूब पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाए यही सोचकर वो दो साल बाद अपने मायके आई थी।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...