सोमनाथ जी बहत्तर वर्ष की उम्र में पैदल ही गली गली में घूमकर समोसे बेचते थे तब कहीं उन्हें तथा उनकी पत्नी को दो वक्त की रोटी मिलती थी कभी खूब धन संपन्न सोमनाथ जी की आज यह हालत थी ।
सोमनाथ जी के दो बेटे अमित और सुमित थे तथा बेटी सुनिधि थी जिसका दो साल पहले दुखद निधन हो गया था । सोमनाथ जी की दो दुकानें थीं एक दुकान उन्होंने किराये पर दे रखी थी तथा एक दुकान वे खुद चलाते थे दुकान किराने की थी और खूब चलती थी। उसकी आमदानी से सोमनाथ जी ने दो फ्लेट खरीदे थे अमित और सुमित के नाम से दोनों बेटों की जैसे ही शादी हुई तो वे अपनी अपनी पत्नियों को लेकर फ्लेट में रहने लगे दोनों भाईयों ने एक एक दुकान पर कब्जा कर लिया था सोमनाथ जी पुत्र मोह के कारण कुछ कर न सके न ही उन्होंने इसकी पुलिस में कोई रिपोर्ट दर्ज कराई सुनिधि की शादी हो चुकी थी ।उसकी शादी में उन्होंने खूब दहेज दिया था यह शादी अमित सुमित की शादी से पहले हुई थी दोनों फ्लेट तथा दोनों दुकानों पर बेटों का कब्जा होने के बाद भी उनके पास जो मकान था उसमें चार किरायेदार रह रहे थे जिसके किराये से उनका खर्च चल रहा था। जब सोमनाथ जी के हाथ में पैसाथा तब वे सुनिधि को पैसे देकर सुनिधि के लालची दामाद एवं ससुराल वालों को संतुष्ट करते रहते थे जब उनकी दुकान छिन गई तो उनके पास पैसे की कमी हो गई फिर भी वे कुछ महीनों तक सुनिधि को जैसे तैसे पैसे देते रहे। जब उनकी हैसियत नहीं रही तो उन्होंने पैसे देने बंद कर दिए इसके भीषण पराणाम का उन्हें अंदाजा नहीं था सुनिधि के ससुराल वाले सोमनाथ जी को सुनिधि से मिलने नहीं देते थे न ही फोन करने देते थे एक दिन अचानक पुलिस ने उन्हें खबर दी कि वे जल्दी अस्पताल पहुँचे सुनिधि की सालत खराब वो अस्सी प्रतिशत जल गई है। सोमनाथ जी तथा सुनिधि की माँ घबराये हुए अस्पताल पहुँचे तो उसकी हालत देखकर उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े सुनिधि को लालची ससुराल वालों ने जलाया था जिसमें उसका पति भी शामिल था सुनिधि की कॉलोनी वाले दहेज की खातिर जलाने वालों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे जब सुनिधि थोड़ी होश में आई और उसने बयान दिए तब पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार,किया सुनिधि का आठ महीने इलाज चला सोमनाथ जी ने उसमें खूब रुपया खर्च किया उनका मकान तक बिक गया सुनिधि ठीक होने लगी थी कुछ घावों में संक्रमण ज्यादा हो गया बाद में उसकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया खून की कमी हो गई और अंत में सुनिधि ने दम तोड़ दिया सोमनाथ जी के दोनों बेटों पर कोई फर्क नहीं पड़ा वे अपनी पत्नी बच्चों में मगन रहे उन्हें इस बात की बड़ी शिकायत थी की उन्होंने सुनिधि के इलाज में मकान बेच दिया जब उसे मरना ही था तो उसके इलाज पर इतना रुपया खर्च करने की क्या जरूरत थी। । सोमनाथ जी ने एक छोटा किराये का मकान ले लिया था पास में कोई पूँजी तो थी नहीं क्या करते भीख माँगना उन्हें गवारा नहीं था आज भी उन्हें लोग सेठजी कहकर बुलाते थे बहत्तर वर्ष की उनकी उम्र हो गई थी सोमनाथ जी की पत्नी ने उन्हें,एक हजार रुपये देते हुए कहा कि अल्मारी की सफाई करते समय,ये रुपये मिले हैं इससे कुछ राशन पानी ले आओ सोमनाथ जी ने कुछ और ही सोचा वे समोसे की दुकान पर गए जो फेरीवालों को आठ रुपये में समोसे बेचता था फेरी वाले उन्हें दस से बारह रुपये में बेचकर,लाभ कमाते थे सोमनाथ जी ने आठ सौ रुपये में सौ समोसे लिए और झोले में रखकर गलि गली घूमकर बेचना शुरू किया दोपहर तक उनके पूरे समोसे बिक गए थे सोमनाथ जी की जेब में पूरे बारह सौ रुपये थे जिसमें दो सौ रुपये का वे आटा सामान लाए जिससे शाम को घर में रोटी बनी तथा दोनों को पेटभर भोजन मिला । अब वे दिनभर में दो सौ समोसे बेच लेते थे चार सौ रुपये का उन्हें लाभ होता था जिससे उनकी गुजर बसर आराम से चल रसी थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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