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कहानी: बेटी की कमाई

रामसुख पुराने विचारों के इंसान थे बेटी के घर का पानी तक नहीं पीते थे आज उनकी जान उनकी बेटी आई टी इंजीनियर रचना के कमाए हुए पैसों से बची थी। रचना को तीन लाख रुपये वेतन मिल रहा था और उसके वेतन से रामसुख जी के घर की कायापलट हो गई थी। आज राम सुख को बीमारी से निजात भी रचना के कमाए हुए पैसों ने दिलाई थी।
रामसुख जी के दो बेटे मोहन तथा सोहन थे और एक बेटी रचना थी सोहन मोहन को राम सुख जी ने प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया था और रचना सरकारी स्कूल में पढ़ी थी इसके बाद भी रचना अपनी कक्षा में हमेशा टॉपर रही थी नवमी से उसे मेरिट छात्र वृत्ति मिल रही थी राम सुख जी उससे छात्रवृत्ति के पैसे नहीं लेते थे वो उन्हें बैंक में जमा रहने देती थी रटना नवमी से ही ट्यूशन पढ़ाने लगी थी। मेधावी तो वो थी ही उसने बारहवीं में भी टॉप किया था। तथा इंजीनियरिंग टेस्ट भी क्वालिफाई कर लिया था उसका चयन आई आई टी मुंबई में हो गया था रचना ने कहीं कोई कोचिंग नहीं की थी रचना के पिताजी साधाण किसान थे वो घर का खर्च मुश्किल से चला पाते थे रचना पूरे जिले में एकमात्र ऐसी छात्रा थी जिसका चयन आइ आइ टी में हुआ था लेकिन पिताजी ने उसे आगे पढ़ाने से इंकार कर दिया था वे उसकी शादी की तैयारियाँ कर रहे थे । रचना ने तय कर लिया था कि वो आइ आइ टी जरूर करेगी शहर के समाज सेवी संगठन आगे आए प्रशासन ने भी सहयोग दिया प्रदेश के सी एम ने उसकी सारी फीस अपनी तरफ से भरने की घोषणा की रचना तो एजुकेशन लोन लेकर पढ़ाई करने का विचार कर रही थी पर इसकी नौबत भी नहीं आई उसके पास बैंक में अच्छी खासी रकम जमा थी। आइ आइ टी में भी रचना ने टॉप किया था बैंग्लोर की एक कंपनी में उसका प्लेस मेन्ट हुआ था उसकी तनखा तीन लाख रुपये प्रतिमाह थी तीन लाख रुपये तो राम सुख जी की सालभर की आय भी नहीं थी रचना ने खूब गरीबी देखी थी । उसने अपनी कमाई से पुराने जर्जर कच्चे घर को तुड़वाकर पक्का मकान बनवाया था उसके दोनों भाई प्राइवेट में जॉब कर रहे थे उनकी सैलरी बारह हजार रुपये महीने से अधिक नहीं थी वे पढ़ाई में तेज नहीं थे न ही मन लगाकर पढ़ाई कर पाते थे। । रचना ने उनकी शादी में भी खूब पैसा दिया था राम सुख जी यह सोचकर संतोष कर लेते थे कि वे बेटी की कमाई नहीं खा रसे हैं पर अचानक उन्हें हार्ट अटेक आ गया। रचना उस समय छुट्टी लेकर घर!आई हुई थी। उनके इलाज में बहुत पैसे लग रहे थे कोई भी उन्हें एक पैसा भी देने को तैयार नहीं था ऐसे में रचना आगे आई और उसने राम सुख जी की बीमारी का सारा खर्च उठाया था । पन्द्रह लाख रुपये उनके इलाज में खर्च हुए थे । रामसुख जी बोले इतनी बड़ी रकम का कर्ज तो मैं इस जन्म में कभी अदा नहीं कर पाऊँगा रचना बोली ये कोई कर्ज थोड़ी है मेरी कमाई पर आपका पूरा हक है। मैंने आप पर कोई कर्ज नहीं चढ़ाया है मैंने तो बेटी का फर्ज निभाया है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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