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कहानी: निठल्ला

राम करन की उम्र पचास साल हो गई थी उस के चार बच्चे थे उसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी एक रुपया भी कमाकर घर में नहीं दिया था उसको पत्नी मीना एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स का काम करती थी रामकरन के ससुर मरते समय,अपना चार मंजिला मकान अपनी बेटी मीना के नाम कर,गए थे जिसके किराये तथा मीना की नौकरी से घर का खर्च चल रहा था उनमें आपस में कभी कभी जमकर लड़ाई होती थी । ऐसा लगता था कि कहीं कोई कैसी की जान न ले ले पर वाक युद्ध ही चलता रहता था उनके बीच कभी हाथापाई की नौबत नहीं आई थी आज भी दिन में उनकी जमकर,लड़ाई हुई थी दोनों घर से,निकलकर सड़क पर आ गए थे लेकिन शाम को जब दोनों स्कूटी से साथ निकले तो नए किरायेदार सतीश को बड़ा ताज्जुब हुआ यह देखकर पुराना किरायेदार राकेश बोला यह कोई नई बात नहीं है आए दिन इनके बीच ऐसा होता रहता है मोहल्ले का कोई भी इनकी लड़ाई को कभी गंभीरता से नहीं लेता है।
रामकरन की मीना से शादी छब्बीस साल पहले हुई थी । रामकरन तब विधायक जी का कार्यकर्ता था । उसने ओमप्रकाश जी के संपत्ति विवाद संबंधी कुछ काम कराए थे। ओम प्रकाश जी को रामकरन का यह व्यवहार,अच्छा लगा रामकरन पढ़ा लिखा तो था ही विधायक जी का भी खास था यह सोचकर ओम प्रकाश जी ने अपनी बेटी मीना की शादी रामकरन से कर,दी थी। मीना कुछ दिनों तक रामकरन के साथ ससुराल में रही तब उसे पता चला कि रामकरन की तो घर में कोई इज्जत ही नहीं है उसे मुफ्तखोरी कीआदत है एक दिन उसने अपनी सास को यह कहते सुना कि पहले ही हम ऐक निकम्मे को पाल रहे थे अब इसकी पत्नी और आ गई दो लोगों को पालो। मीना बड़ी आहत हुई इसके बाद वो जो भायके गई तो फिर कभी ससुराल नहीं आई आखिर रामकरन ही मीना के कारण अपनी ससुराल में जम गया वो रोज सुब्ह घर से निकल जाता इसके,रात को नौ बजे तक घर आता था फिर मुफ्त की रोटी खाकर सो जाता था दूसरे दिन फिर वही दिनचर्या मीना ने उसे खाना देना बंद कर दिया रामकरन पर इसका कोई असर नहीं हुआ उसे कहीं न कहीं से दो वक्त का खाना रोज मिल जाता था चार महीने तक ये क्रम चलता रहा हारकर,मीना ने रामकरन को फिर खाना देना शुरू कर दिया था। मीना अब नौकरी पर जाने लगी थी ओम प्रकाश जी के तीन बेटे थे तीनों शहर के बाहर दूसरे शहर में बस गए थे वे माँ बाप की कोई खोज खबर नहीं लेते थे ओम प्रकाश जी इस बात से खुश थे कि उनका बेटी दामाद उनके साथ तो रह रहे हैं । यही कारण रहा कि जब ओम प्रकाश जी की मौत निकट आ गई तो इसके पहले उन्होंने मकान मीना के नाम कर,दिया था ओम प्रकाश जी के मरने चे बाद हिस्से को लेकर चारों भाई बहनों में खूब लफ़ाई हुई पर,उसका कोई लाभ नहीं हुआ। तेरहवीं के बाद सब अपने ऊपने घर चले गए । अब रामकरन जी आराम से अपने घर में रह रहे थे मीना की नौकरी चल ही रही थी। रामकरन जी अब बिंदास स रहकर अपना समय गुजारते। थे आपस की लडाई का उन पर कोई असर नहीं पड़ा था। आज भी ऐसा ही हुआ था।


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रचनाकार
प्रदोप कश्यप

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