शिक्षा विभाग में पदस्थ शिक्षक रामनरेश का हाल ही में रिटायरमेन्ट हुआ था। वे बी ई ओ ऑफिस के एकाउण्टेन्ट चन्द्र मोहन के समधी थे। इसलिए उनका एक भी रुपया खर्च नहीं हुआ था। सारे प्रकरण निपट गए थे तथा पूरे रुपयों का भुगतान हो गया था। दूसरी ओर एक अन्य शिक्षक कमलसिंह भी रिटायर हुए थे। एकाउण्टेन्ट को पचास हज़ार रुपये की रिश्वत देने के बाद भी उनके कुछ क्लेम अधूरे थे और वे बार बार ऑफिस के चक्कर लगा रहे थे।
रामनरेश के लड़के नीरज की सगाई कुछ दिनों पूर्व चंद्रमोहन की लड़की निशा से तय हुई थी। वे दोनों नए नए समधी बने थे इसलिए रामनरेश जी को एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ा था। कमल सिंह सबसे यही कहते कि मेरे लड़के से उनकी बेटी की शादी थोड़ी हो रही है जो वे मेरा काम करें जबकि मैंने तो उन्हें मुँह माँगी रिश्वत दी है। फिर कमल सिंह यह सोचकर मन में संतोष कर रहे थे कि कम से कम उनका काम तो हो रहा है। सुरेश जी जो दो साल पहले रिटायर हुए थे उन्होंने रिश्वत देने से इंकार कर दिया था जिसके कारण उनका एक भी क्लेम उन्हें नहीं मिला था। सर्विस बुक ही ठीक नहीं हुई थी। बेचारे ऑफिस के चक्कर लगा लगाकर परेशान हो गए थे। हाई बी पी की शिकायत हो गई थी। पिछले महीने उनका निधन हो गया था। उनके निधन के बाद उनके लड़के अशोक ने रिश्वत की रकम पहुँचा दी थी। तब कहीं उनके काम ने रफ्तार पकड़ी थी। सुरेश जी तो उम्मीद को रखते रखते दुनिया छोड़कर चले गए थे। चंद्रमोहन बड़े अधिकारियों के चहेते थे। विश्वसनीय थे ईमानदारी से सबको अपना अपना हिस्सा पहुँचाते थे। कहीं कोई काम अटकने नहीं देते थे। शर्त यही थी की उन तक रिश्वत की रकम पहुँचनी चाहिए। बाकी सारे कर्मचारी एकाउण्टेन्ट के खराब व्यवहार से पीड़ित थे। वो किसी भी शिक्षक से सीधे मुँह बात तक नहीं करता था। बिना रिश्वत दिए कोई उनके सामने कुर्सी पर बैठ तक नहीं सकता था। चंद्र मोहन बी ई ओ ऑफिस में पन्द्रह साल से जमे हुए थे। सबका तबादला हो गया था पर उनका तबादला कोई नहीं करा सका था। कमल सिंह जी उनकी किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते थे शिकायत करने से कोई लाभ भी नहीं था बल्कि नुक्सान ही था। पैसा देने के बाद भी उनके प्रकरण लंबित होने का डर था इसलिए वे मिल जुलकर अपना काम निकालना चाहते थे। कमल सिंह जी की कोई राजनैतिक पहुँच भी नहीं थी न किसी अधिकारी से अच्छी जान पहचान। इसी से वे कुछ कर नहीं पा रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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