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कहानी: नियम से हटकर

शिक्षा विभाग के एकाउण्टेन्ट वीरेन्द्र तिवारी को गंभीर बीमारी से जूझते हुए आठ साल हो गए थे । आठ साल से उनका इलाज चल रहा था उनकी सारी छुट्टियाँ खत्म हो गई थीं फिर भी उनकी नौकरी चल रही थी जिसकी उन्हें पूरी तनख्वाह मिल रही थी सरकारी नौकरी के सारे लाभ दिए जा रहे थे उनकी नौकरी उनका बेटा निशिकाँत कर रहा था। और यह सब कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में हो रहा था फिर भी किसी को कोई एतराज नहीं था सभी ने नियम कानून से हटकर इंसानियत को सर्वोपरि रखा था उनके इलाज में हर महीने एक लाख बीस हज़ार रुपये खर्च हो रहे थे यह पूरा खर्च शुरू से ही शिक्षा विभाग का स्टॉफ उठा रहा था जो वेतन उन्हें दिया जा रहा था उससे परिवार का खर्च चल रहा था।
आठ साल पूर्व वीरेन्द्र तिवारी एक मिलनसार कर्मचारी के रूप में जाने जाते थे। एक दिन वे मोटर सायकिल से ट्रेजरी की ओर जा रहे थे तभी एक कार उन्हें टक्कर मारकर चली गई । उनके सिर में भारी चोट लगी थी जिसके कारण वे चलने से फिरने से लाचार हो गए थे उनका डॉक्टरों ने हर संभव इलाज किया पर कुछ लाभ नहीं हुआ । टक्कर मारने वाला भी पकड़ में नहीं आया था वो ठीक से बोल भी नहीं पाते थे हाथों में इतनी तेज कंपन होता था कि उससे एक अक्षर लिखना बी मुमकिन नहीं था।घर की सारी जमा पूँजी खर्च हो गई थी पैतृक जमीन जायदाद बिक गई थी। और वे किराये के मकान में रहने लगे थे एक दिन उनके बड़े अधिकारी उन्हें देखने आए उनकी हालत देखकर वे बड़े दुखी हुए पास मे ही उनका बेटा निशिकाँत भी खड़ा था उसकी उम्र अठारह वर्ष हो गई थी उसने हायर सेकेण्डरी की परीक्षा तो पास कर ली थी पर आगे पढ़ाई के पैसे ही नहीं थे । अधिकारी जी ने उस लड़के से कहा कि कल से ऑफिस आ जाओ और अपने पिताजी का काम सम्हाल लो ताकि उनकी नौकरी चलती रहे बाकी में सब देख लूँगा रहा सवाल उनके इलाज के खर्च का तो वो हम आपस में मिल कर इक्ठ्ठा कर लेंगे उसकी चिंता करने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है निशिकाँत को पिताजी का काम सम्हाले छॆ साल हो गए थे उसकी शादी भी हो गई थी अब तो कई लोग उसे ही एकाउण्टेन्ट समझने लगे थे निशिकाँत भी अपने काम में माहिर हो गया था अभी पिताजी के रिटायर मेन्ट में आठ साल का समय बाकी था ऑफिस वालों के सहयोग से सब ठीक चल रहा था नियमित इलाज से उनकी हालत स्थिर बनी हुई थी डॉक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि इससे अधिक हालत में सुधार नहीं होगा घर वालों ने भी इसे किस्मत का खेल मानकर स्वीकार कर लिया था वीरेन्द्र के स्थान पर निशिकाँत का नौकरी करना नियम विरुद्ध था एक अपराध था जिसकी सजा मिल सकती थी पर इंसानियत इतनी प्रबल हो गई थी की सभी ने नियमों को ताक पर रख दिया था और वीरेन्द्र जी की नौकरी चल रही थी इसको सभी जानते थे बड़े से बड़े अधिकारी राजनेता तथा पत्रकारों को भी इसकी जानकारी थी मगर इस मुद्दे को कोई नहीं उठाता था सभी चाहते थे कि वीरेन्द्र जी की नौकरी ऐसे ही चलती रहे और आठ साल बाद वे रिटायर हो जाएँ इसमें किसी प्रकार की कोई भी अड़चन आने नहीं देना चाहता था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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