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कहानी: गुरूजी

गुरूजी के नाम से बड़गाँव के सेवानिवृत शिक्षक स्व ज्ञान प्रकाश जी एव उनकी स्व पत्नी दीपिका की आज युगल मूर्ति का ग्रामीणों ने अनावरण समारोह आयोजित किया था उनकी यह मूर्ति गाँव के गुरूकुल छात्रावास के विशाल प्रांगण में स्थापित की गई थी इस के साथ ही गुरूकुल का नाम भी दीपिका ज्ञान प्रकाश गुरूकुल रखा गया था ज्ञान प्रकाश जी आदर्श शिक्षक थे अपने जीवन के पूर चौंसठ वर्ष उन्होंने ऐस गाँव में बिताए थे उनके प्रयासों से कभी अत्यंत पिछड़ा माना जाने वाला गाँव आज जिले का सबसे प्रगतिशील गाँव माना जाता था।
चौंसठ वर्ष पूर्व जब ज्ञान प्रकाश जी इस गाँव में शिक्षक बनकर आए थे तब उनकी उम्र महज अठारह वर्ष की थी वे इंटर पास करने के बाद ही शिक्षक पद पर नियुक्त हो गए थे। जब वे बड़गाँव में आए तब गाँव में कोई स्कूल नहीं था शासन ने यहाँ प्राथमिक स्कूल खोला था ज्ञान प्रकाश जी की पदस्थापना उस स्कूल में हुई थी वे गाँव के पहले शिक्षक थे। शाला भवन था नहीं पटेल कृपाराम ने अपनी दालान दे दी थी जिसमें उन्होंने पहली कक्षा से पढ़ाने की शुरूआत की थी दालान से लगे दो कमरे थे जो पटेल ने ज्ञान जी को रहने के लिए दिए थे। वे उस गाँव में ऐसे रमे कि तीन साल तक अपने गृहनगर गए ही नहीं तीन वर्ष बाद गर्मी की छुट्टियों में गए तो छुट्टी खत्म होने पर जब आए तो उनके साथ उनकी नव विवाहिता पत्नी दीपिका थीं दीपिका भी अपने पति के अनुरूप मिलनसार और सरल सहज स्वभाव की थीं गाँव जिला मुख्यालय से चालीस किलोमीटर दूर था गाँव दुर्गम था तीन नदियाँ और छ़ नाले रास्ते में पढ़ते थे आसपास घना जंगल था गाँव में बिजली नहीं थी सड़क भी नहीं थी बरसात में गाँव का संपर्क शहर से पूरी तरह कट जाता था। गाँव में साक्षरता जीरो प्रतिशत थी पढ़े लिखे के नाम पर ज्ञान सर ही थे जब दोपिका आईं तब तक सर ने बीस बच्चों को अच्छे से पढ़ना लिखाना सिखा दिया था। जब गाँव में पंचायत बनी तो ज्ञान जी को सेक्रेटरी का पद भी दे दिया गया वे दस वर्ष तक उसके सचिव रहे इन दस वर्षों में उन्होंने अथक मेहनत की गाँव तक सड़क बनवाई शाला भवन बनवाया साप्ताहिक हाट शुरू कराई बस चलवाई दीपिका ने महिलाओं को पढ़ाया घूँघट प्रथा समाप्त कराई गाँव में प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र पशु चिकित्सालय खुलवाया स्कूल को मिडिल तक उन्नत कराया। गाँव वाले उनका खूब सम्मान करते थे कोई उनकी बात टालता नहीं था उन्होंने गाँव में शिक्षा की अलख जगाई थी जो बच्चे उन्होंने पहली क्लास में भर्ती किए थे वे पूरे बीस बीस के बीस हायर सेकेण्री में बारह साल बाद अच्छे अंकों से पास हुए थे उनमें से चार अत्यंत निर्धन थे जिनकी पढ़ाई का खर्च वे उठा रहे थे। उनकी प्रेरणा से सभी ने महाविद्यालय में पढ़कर डिग्रियाँ हासिल की सभी की अच्छे पदों पर सरकारी नौकरी लग गई थी। यह एक नया इतिहास था आसपास के चालीस गाँवों में कोई भी ऐसा नहीं था जो आठवीं पास हो गाँव का तेजी से विकास हो रहा था दीपिका और ज्ञान प्रकाश जी की अपनी कोई संतान नहीं थी वे गाँव के बच्चों को ही पुत्रवत स्नेह देते थे। एक बार जब ग्राम की पंचायत के सरपंच की सीट महिला के लिए आरक्षित की गई तब कोई भी महिला सरपंच के पद पर चुनाव में खड़ी होने को तैयार नहीं हुई तब गुरूजी ने दीपिका को सरपंच पद का उम्मीदवार बनाया उनका निर्विरोध चुनाव हुआ दीपिका जी पन्द्रह वर्ष तक गाँव की सरपंच रहीं तथा उन्होंने अपने कार्यकाल में कई उल्लेखनीय काम किए गाँव में हायर सेकेण्डरी स्कूल खुलवाया भव्य शाला भवन बनवाया। गुरूजी अपने वेतन का अधिकाँश पैसा गरीब बच्चों की पढ़ाई में तथा बीमारों की दवाई में खर्च कर देते थे। वे गुरूजी के नाम से विख्यात हो गए थे गुरूकुल की स्थापना उन्होंने ही की थी सौ एकड़ के परिसर में स्कूल कॉलेज आई टी आई पोलीटेक्नीक तथा इंजीनियरिंग कॉलेज थे बड़ा छात्रावास बनवाया जिसमें दूर दूर से विद्यार्थी आकर अपनी पढ़ाई करने लगे थे गुरूजी ने बड़गाँव के स्कूल से ही नौकरी की शुरूआत की थी और चवालीस साल बाद उसी स्कूल से सेवानिवृत्त हो गए थे सेवानिवृत होने के बाद भी वे गाँव छोड़कर नहीं गए जबकि उनका गाँव में कोई निजी घर नहीं था जिस दिन वे रिटायर होकर घर आए तो देखा कि घर में ताला लगा है गाँव वाले उन्हें एक शानदार आधुनिक नव निर्मित घर में ले गए और बोले सर ये घर आपका है आपके पढाए हुई छात्रों की तरफ से ये छोटी सी भेंट है गुरूजी ने बहुत मना किया पर गाँव वालों के आग्रह पर झुक गए। बीस साल उन्होंने उस मकान में बिताए उनके निधन के चार साल पहले दीपिका जी का निधन हो गया चार साल तक गुरूजी ने संत का जीवन जिया ग्रामीण उन्हें बहुत मानते थे जब उनका निधन हुआ तब पूरे गाँव को ऐसा लगा कि वे अनाथ हो गए हों बड़ा गाँव का नाम कब गुरूजी का गाँव पड़ गया इसका किसी को पता ही नहीं चला। आज उनकी तथा उनकी पत्नी की युगल मूर्ति का भव्य अनावरण समारोह था जिसमें पाँच लाख लोग शामिल हुए थे उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी पर वे सभी को पुत्रवत स्नेह देते थे उनके कारण गाँव अपराध मुक्त था व्यसन मुक्त था। वे अब दुनिया में जीवित नहीं थे मगर !गाँव अब भी उनके आदर्शों पर ही चल रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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