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कहानी: शुरूआत

सेवा निवृत कृषि विभाग के कर्मचारी फूल सिंह दो वर्ष पहले बारह हजार रुपये मे कोल्ड आइल प्रेस मशीन खुद के उपयोग के लिए लाए थे उसी से उन्होंने खाद्य तेल निकाल कर छोटे पैमाने पर बेचने की शुरूआत की थी आज उनका कारोबार खूब फल फूल गया था दस हज़ार वर्ग फीट के भूख॔ड में उन्होंने बड़ी आइल प्रेस मशीन लगवा ली थी वे हर महीने दस हजार लीटर तेल निकाल कर बेच रहे थे वहीं ग्राइन्डर एवं आटा चक्की से आटा मसाले और बेसन का कारोबार भी कर रहे थे।
आइल प्रेस मशीन खरीदने का दो वर्ष पूर्व उनके मन में तब विचार आया जब नगर के आयुर्वेद चिकित्सक मुकेश नेमा जी ने रिफाइन्ड तेल न खाने की सलाह देते हु कच्ची घानी का तेल उपयोग करने की सलाह दी यह तेल उन्हें बाजार में नहीं मिला तब उन्होंने छोटी आइल प्रेस मशीन खरीदो थी और वे उसी तेल का खाने में उपयोग कर रहे थे यह बात जब उन्होंने अपने मित्रों को बताई तो उनमें से कुछ मित्रों ने उन से तेल खरीदने की बात कही जो उन्होंने मान ली। यह एक छोटी सी शुरुआत थी धीरे धीरे और लोगों ने भी उनसे तेल लेना शुरू किया । जब इसकी डिमाँड बड़ी तो वे और बढ़ी मशीन ले आए मगर उसकी माँग बढ़ती जा रही थी। फूल सिंह जी ने कम कीमत के कारण शहर से कुछ दूर दो हजार वर्ग फीट का भूख॔ड खरीदकर उस पर!मकान बनवाया था उनके आस पास चार मकान और थे फिर दूर दूर तक किसी का घर नहीं था जब उनका काम बढ़ा तो उन्होंने पास में ही दस हज़ार वर्ग फीट का भूखंड मात्र छः लाख रुपये में खरीद लिया जबकि शहर के नजदीक तो इस कीमत में पाँच सौ वर्गफीट का भंखण्ड खरीदना भी मुश्किल था। उसी भूखंड पर उन्होंने मसाला आटा तथा बेसन पिसाई का काम भी शुरू कर दिया था वाजिब कीमत पर उच्च गुणवत्ता देने के कारण उनके द्वारा तैयार माल की बिक्री बढ़ती जा रही थी सौ से अधिक श्रमिक उनके यहाँ काम कर रहे थे। चहल पहल और रौनक होने के कारण आसपास कुछ दुकाने खुल गई थीं कुछ आवासीय!भूखण्ड भी बिकने लगे थे जिससे उस जगह की जमीन की कीमत दो साल में बीस गुना बढ़ गई थी । अपने फलते फूलते कारोबार को देखकर फूल सिंह जी खुद भी बहुत चकित थे कहाँ तो यह सोचकर दुखी हो रहे थे कि रिटायर मेन्ट के बाद अपना समय कैसे गुजारूँगा और कहाँ अब काम से ही फुरसत नहीं मिल रही थी । कई महीनों से उन्हें पेंशन निकालने की डरूरत ही नहीं महसूस हुई थी। शादी विवाह का सीजन होने तथा गर्मी में साल भर के लिए मसाले खरीदने वालों की बढ़ती संख्या के कारण उनके यहाँ चौबीस घंटे काम चल रहा था। जबकि यहाँ भूखंड खरीद कर मकान बनाते समय उनकी अपनी पत्नी शोभा से जोरदार बहस हुई थी । वो कह रही थी कम कीमत के फेर में शहर से इतनी दूर जमीन लेकर मकान बनाना कोई समझदारी का काम थोड़ी है देख लेना उसमें हम ज्यादा दिन नहीं रह पाएँगे। फूलसिंह उन्हें समझा रहे थे कि जितने रुपये में हम शहर के नजदीक वाला आठ सौ वर्ग फीट का भूखण्ड खरीदेंगे उतने रुपयों मैं तो यहाँ हम मकान बनवा लेंगे। और उन्होंने ऐसा ही किया भी। जिसका उन्हें पूरा लाभ दो साल ही में मिलने लगा था । अब उनकी पत्नी शोभा भी खुश थी। फूल सिंह को भी उस समय लिए गए सही निर्णय की बहुत खुशी थी उन्हें उम्मीद नहीं थी कि यहाँ आकर उनका कारोबार इतना अधिक बढ़ जाएगा।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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