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कहानी: दो बहूओं की सास

चंचला की उम्र बहत्तर साल की थी उनके दो बेटे रवि एवं प्रकाश थे तथा दो बेटियाँ नीरा तएवं रमा थीं सबकी शादी हो गई थी दो बहुओं के होते हुए भी चंचला अकेली रहकर अपना बुढ़ापा काट रही थी इसमें बहुओं का कोई दोष नहीं था दोष चंचला का ही था बहुओं के प्रति उसका व्यवहार सही नहीं था बड़ी बहू सुषमा तो सीधी सरल थी तथा उसने सबकी खूब सेवा भी की थी पर उसको भी चंचला ने अपने घर से निकाल दिया था छोटी बहू उमा तो शादी के कुछ दिन बाद ही अलग हो गई थी।
चंचला का सबसे बड़ा बेटा रवि था उन्होंने रवि की सबसे पहले शादी की थी उसकी पत्नी सुषमा ने बी एस सी बी एड किया था इसके बाद भी उसने गृहस्थी के कामों में अपने आपको खपा दिया था रवि एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था । रवि के पापा राम रतन ब्लॉक ऑफिस में क्लर्क थे। सुषमा को रोज सात लोगों का दोनों समय खाना बनाना पड़ता था रोटियाँ बना बना कर सुषमा के हाथ दर्द करने लगते थे सुब्ह पाँच बजे से रात के ग्यारह बजे तक उसे फुर्सत नहीं मिलती थी उसकी दोनों ननद घर का कोई काम नहीं करतीं थीं । तथा सुषमा की झुटी बुराई कर सास से डाँट खिलाती रहती थीं। समय गुजरा दोनों ननदों की शादी हो गई थी सुष्मा के भी दो बच्चे हो गए थे रघु एवं प्राची दोनों ननदें शादी के बाद भी मायके में जमी रहती थीं उनके पति भी उनके साथ कई दिनों तक मेहमानी करते थे तथा नए नए पकवान बनाने की फरमाइश करते रहते थे। प्रकाश की शादी जब उमा से हुई और उमा ने जब सुषमा को रात दिन खटने के बाद भी अपमान जनक जीवन जीते हुए देखा तो उसने घर से अलग रहना ही ठीक समझा और वो अपने पति के साथ अलग किराये के मकान में रहने लगी थी। राम रतन जी का हार्ट अदेक से निधन हो गया था अब चंचला को उनकी पेंशन मिलने लगी थी निधन के समय उनकी उम्र चौहत्तर साल थी। चंचला को मकान किराये से भी आमदानी होती थी। एक दिन रवि जब ऑफिस से आया तो उसका मुँह उतरा हुआ था उसकी नौकरी छूट गई थी। चार महीने तक रवि की कहीं नौकरी नहीं लगी फिर भी चंचला की पेंशन तथा मकान किराये से घर का खर्च अच्छे से चल सकता लेकिन बेटियों के भड़काने पर एक दिन उन्होंने रवि से कह ही दिया कि तेरी पत्नी और बच्चे तथा तेरा खर्च मैं कब तक उठाऊँगी। ऐसा कहकर उसने रवि को घर से निकाल दिया था। सुषमा के सारे किए कराए पर पानी फिर गया था रवि आठ साल से घर का खर्च चला रहा था । और उसकी माँ उसका खर्च चार महीने भी वहन नहीं कर सकी थी। रवि ने माँ को खूब समझाया भी फिर भी उसके समझ में कुछ नहीं आया हारकर सुषमा तथा बच्चों को उसने कुछ दिन उनके मायके छोड़ा तथा दोस्त रमेश के घर के एक कमरे में रहकर नौकरी की तलाश करने लगा। जब उसकी नौकरी लग गई तो वो अपने अपनी पत्नी तथा बच्चों को ले आया। ननदों का मायका छूट गया था कोई काम करने वाला था नहीं अगर मायके में ही काम करना पड़े तो अपने घर में रहना क्या बुरा है। यह सोच चंचला की दोनों बेटियों की थी। अब बुढ़ापे में वो अकेली ही रह रही थी। सुषमा की भी नौकरी शिक्षा विभाग में शिक्षक पद पर लग गई थी। । बाकी सब तो ख़ुश थे लेकिन चंचला की देखभाल करने वाला कोई नहीं था अब वे दुखी भी रहने लगी थीं । मरने का इंतज़ार कर रहीं थी उन्हें सहारा देने वाला कोई नहीं था। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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