सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: मायके की शादी

मनीष को अपनी पत्नी रीता के भतीजे की शादी बड़ी मँहगी पड़ी थी जिसमें उसके पूरे डेढ़ लाख रुपये खर्च हो गए थे जबकि दोमहीने पूर्व जब उसके भानजे की शादी हुई थी तब रीता ने अपने पास रखे लेनदेन वाले कपड़ों तथा उसी के पास रखी चाँदी की पायल को उजलवाकर काम चला लिया था बहुत कम पैसे खर्च किए थे। भतीजे की शादी के बाद वो अपने भाई भाभी का गुणगान गाते हुए थक नहीं रही थी जबकि ननद के लड़के और उसके भानजे की शादी की ढेरों कमियाँ गिना रही थी तथा अभी तक उनकी बुराइयाँ कर रही थी।
रीता के भतीजे की शादी के एक महीने पहले से ही रीता उसकी तैयारियों में जुट गई थी भतीजे को उसने पन्द्रह हजार रुपये का सूट सिलवाया था जबकि भानजे को जो पेन्ट शर्ट के पीस दिए थे उनकी कीमत पाँच सौ रुपये भी नहीं थी भानेज बहू की मुँह दिखाने में पुरानी चाँदी की पायल उजलवाकर दी थीं जिनकी रिसेल वेल्यू बारह सौ रुपये थी और भतीज बहू को मुँह दिखाई में पैंतालीस हज़ार रुपये के कान के सोने के टॉपस दिए थे। भतीज बहू को बीस हज़ार का लँहगा चुन्नी दिया था और कई प्रकार के नेगों में खुलकर खर्च किया था खुद के लिए नए कपड़े बनवाए थे अलग अलग रस्मों के लिए अलग अलग कपड़े खरीदे थे मेकक्षप में खूब खर्च किया था बारात में खूब फैसे लुटाए थे जबकि मनीष ने अपने लिए कोई नया कपड़ा नहीं लिया था इसके बाद भी वो उसकी कंजूसी का रोना रो रही थी । शादी के बाद जब रीता घर आई तो विदाई में जो उसकी भाभी ने उसे इतनी सस्ती सी साड़ी दी जिसे कामवाली बाई ने भी लेने से इंकार कर दिया मगर मनीष की इतनी भी हिम्मत नहीं हुई की वो इस विषय में कुछ कह सके उसे बासा खाना खिलाया गया वो भी खा लिया भले ही बीमार पड़ गई जबकि भानेज की शादी के ताजा और अच्छे खाने में भी उसने कई मीन मेख निकाली थी मनीष की कार का रीता के भाई ने भरपूर उपयोग किया था जिसमें मनीष का पन्द्रह हज़ार रुपये का पेट्रोल जल गया था पर उसने एक रुपया भी पेट्रोल का नहीं दिया था विदाई के समय मनीष का एक सौ एक रुपये का टीका करके टरका दिया था उसे तो एक सस्ता वाला पेन्ट शर्ट का पीस तक नहीं दिया गया था इसके बाद भी रीता अपने भाई भाभी के गुणों का खूब बखान कर रही थी । और मनीष चुपचाप सुन रहा था उसकी इतनी भी हिम्मत नहीं थी की वो उनकी जरा सी भी बुराई कर सके जबकि रीता अपने ससुराल वालों की हमेशा जी खोलकर बुराई करती थी मनीष तब भी कुछ नहीं बोलता था सोचता था बोलकर कौन घर की शाँति भंग करे। । इसलिए वो अपने डेढ़ लाख रुपये खर्च कर के भी चुप था। और उसकी पत्नी फिर भी उसकी बुराई किए जा रही थी। मनीष फिर भी हँस रहा था करे तो क्या करे और जाए तो कहाँ जाए।

*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...