आज तहसील के बड़े गाँव शोभाखेड़ी में ग्राम संपर्क अभियान था। पूरे हाई स्कूल का स्टॉफ सुबह सात बजे ग्राम के हाई स्कूल में आया था। दिन भर गर्मी में परेशान होने के बाद वे सब शाम को सात बजे घर आए थे। अभियान में एस डी एम तथा बी ई ओ की मोजूदगी ने उन्हें स्कूल नहीं छोड़ने दिया था। अगर विवेक सर सूझ बूझ से काम लेकर उनके भोजन की व्यवस्था नहीं करते तो उन्हें पूरे दिन भूखा रहना पड़ता। विवेक सर एक लोक प्रिय शिक्षक थे। छात्र उन्हें अपना आदर्श मानते थे। अभियान के दो दिन पहले पंचायत के सरपंच और सचिव स्कूल में आए थे और प्राचार्य विजय सिंह से स्कूल कहकर गए थे कि स्कूल के पूरे स्टॉफ को उस दिन सुबह सात बजे आना है तथा बारह बजे अधिकारियों के जाने के बाद स्कूल छोड़ना है। उस दिन रविवार था पूरा स्टॉफ अपनी छुट्टी खत्म होने से दुखी था। सरपंच ने यह कहा था आपके भोजन की व्यवस्था हम करेंगे आप इसकी चिंता मत करना। स्कूल में दो चपरासी थे तथा प्राचार्य सहित दस का स्टॉफ था चाय स्कूल के टी क्लब में बनती थी। उस दिन सभी सात बजे आ गए थे। आते ही सब को चाय टी क्लब से दी गई थी। ठीक दस बजे विवेक जी ने सबको गरमा गरम पोहे का नाश्ता दिया था। विवेक जी ने प्राचार्य जी से कहा था अभी तक अभियान दल नहीं आया। खाना कब मिले इसका कोई ठिकाना नहीं। इस बात से प्राचार्य जी भी सहमत थे। सबने नाश्ता कर लिया था। गर्मी के मौसम भूखे रहना भी ठीक नहीं था। दल अभी भी नहीं आया था। दिन के बारह बज गए थे। प्राचार्य जी ने विवेक सर को बुलाकर कहा कि अभी सरपंच ने खबर भिजवाई है कि वो हमारे भोजन की व्यवस्था नहीं करेंगे। अब हम क्या करें कब दल आएगा और कब हम घर जाएँगे। सिर्फ नाश्ते के सहारे दिन भर थोड़ी रहा जा सकता है। विवेक सर ने कहा कब तक भोजन होना चाहिए। वे बोले अधिक से अधिक डेढ़ बजे तक। सर बोले स्टॉफ की भोजन व्यवस्था हो जाएगी। प्राचार्य जी बोले इतनी जल्दी कैसे करोगे। विवेक जी बोले इसकी चिंता आप न करें। विवेक जी अपने काम में जुट गए थे। ईंट का चूल्हा बनाकर उस पर दाल की तपेली चढ़ा दी गई थी। एक बाटी का आटा तैयार कर रहा था एक ने कंडे सुलगा दिए थे। एक सलाद काट रहा था तथा दाल में बघार के लिए लेसन प्याज तैयार कर रहा था। केरी की चटनी भी तैयार हो गई थी। विवेक जी ने खुद दाल में तड़का लगाया था तथा बाटियों को घी से चिपड़ा था। ठीक एक बजकर पच्चीस मिनिट पर विवेक जी ने पूरे स्टॉफ को खाने पर बुला लिया था। विवेक जी ने सभी को दाल बाटी चटनी सलाद और नमकीन छाछ परोसी थी। सभी ने भरपेट खाना खाया था। खाना बहुत स्वादिष्ट था सभी विवेक सर को धन्यवाद दे रहे थे। खाने के बाद प्राचार्य जी ने विवेक जी को अपने ऑफिस में बुलाया तथा कहा खाना वाकई में लाजवाब था। अगर यह खाना होटल से मंगाते तो पूरे चार हजार रुपये में आता। हम सबने विचार किया तथा कुछ कलेक्शन किया है। वो आप रख लीजिए वे उन्हें पन्द्रह सौ रुपये देने लगे। तो विवेक सर ने मना कर दिया बोले पैसे देने की जरूरत नहीं है। सर बोले क्या आप अपनी जेब से खर्च करेंगे आप भी तो बाल बच्चे वाले हो हम यह पैसे अपनी खुशी से आपको दे रहे हैं। तब विवेक ने साफ करते हुए कहा इसमें मेरा भी एक रुपया तक खर्च नहीं हुआ है। प्राचार्य जी बोले फिर यह भोजन की व्यवस्था किसकी तरफ से हुई। तब विवेक जी ने बताया कि द्वारका के लड़के रोहित को जो बारहवीं की परीक्षा दे रहा था उसे आठ दिन तक मैंने इंग्लिश की कोचिंग दी थी। जिससे अंग्रेजी में उसे विशेष योग्यता मिली थी जिससे खुश होकर द्वारका मुझे मिठाई खाने के लिए तीन सौ रुपये देकर गया था। यह सब उन्हीं पैसों से हुआ है। प्राचार्य जी को इस पर विश्वास नहीं हुआ तब विवेक जी ने चपरासी रामलाल को बुलाया। रामलाल ने बताया कि सारा सामान मैंने लाकर दिया था। सब तीन सौ रुपये में आया था। यह सुनकर प्राचार्य महोदय भी विवेक सर की सूझबूझ और प्रबंधन का लोहा मान गए। पूरा स्टॉफ तो ये पहले से ही जानता था कि विवेक सर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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