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कहानी: मायके वाले

सरोज के मायके वालों ने सरोज को पचास लाख रुपये की चपत लगाई थी और जब सरोज को उनकी जरूरत पड़ी तो सभी ने उससे कन्नी काट ली थी। माँ जो घंटों बात करा करतीं थीं वो फोन नहीं उठा रही थीं। जो भाई कहता था की आधी रात को भी मैं मदद करने के लिए तैयार रहूँगा उस भाई ने बोलचाल बंद कर दी थी और पिताजी जिन्हें फुर्सत ही फुर्सत थी उन्होंने भी कह दिया था कि उनके पास आने की फुरसत नहीं है। इस घड़ी में भी सरोज के जेठ दीपक ने उसका पूरा साथ दिया था। पूरे पन्द्रह लाख रुपये अपनी जेब से खर्च किए थे तब कहीं सरोज के पति सूरज की जान बची थी।
सूरज और दीपक दोनों सगे भाई थे। दीपका बड़ा भाई था। दीपक चौदह साल की उम्र में गाँव से पढ़ने के लिए शहर में आए थे। उनके पिताजी लखनलाल खेतिहर मजदूर थे। दीपक जी ने काम करते हुए अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला था। पिताजी से एक रुपये भी कभी नहीं लिया था। बी एस सी करने के बाद दीपक जी ने एक फेक्ट्री में केमिस्ट की नौकरी की पर नौकरी उन्हें रास नहीं आई और उन्होंने फेरी लगाकर कपड़े बेचना शुरू कर दिया। इसी बीच उनका छोटा भाई सूरज भी आगे की पढ़ाई करने के लिए उनके पास आ गया। सूरज की पढ़ाई का खर्च भी उन्होंने ही उठाया। दीपक की शादी तभी हो गई थी जब वे केमिस्ट की नौकरी कर रहे थे। दीपक जी ने बाजार में कपड़े की दुकान खोल ली थी। जो अच्छी चल निकली थी। दुकान की कमाई से उन्होंने शहर में पक्का बड़ा मकान बनवा लिया था। सूरज ने बी कॉम कर लिया था तथा दीपक के साथ दुकान में बैठकर उनका हाथ बँटाना शुरू कर दिया था। सूरज के काम सम्हालने पर दीपक जी ने गाँवों के हाट बाजारों में दुकान लगाना शुरू कर दिया था। सूरज की शादी दीपक जी ने बड़ी धूमधाम से सरोज के साथ कर दी थी। दीपक सूरज पर अंधा भरोसा करते थे। सारा लेन देन हिसाब किताब सूरज के हाथ में था। सरोज को अपने जेठ जेठानी से पहले दिन से ही चिढ़ थी। वो हर वक्त मायके वालों के गुण गाती रहती थी। सूरज को भी उसने दीपक के खिलाफ भड़का दिया था। सरोज को उसकी माँ और भाभी भड़काती रहतीं थीं और उल्टी पट्टी पढाती रहती थीं। सरोज के कहने पर सूरज ने अपने देवता समान बड़े भाई के विश्वास का लाभ उठाकर लेनदेन में हेराफेरी करना शुरू कर दी थी। सरोज जब मायके जाती तो ढेर सारे रुपया माँ को दे आती। माँ और भाई भाभी उससे कहते जब तुम्हारा जेठ तुम्हें घर से अलग कर देगा तब ये पैसे तुम्हारे काम आएँगे। तुम्हारे ये पैसे हमारे पास धरोहर की तरह हैं। बेटी के पैसे खाकर हमें पाप थोड़ी कमाना है। एक दिन सरोज को उसके भाई ने फोन करके बताया कि आठ लाख रुपये में बारह सौ वर्ग फिट का मौके का भूखण्ड बिक रहा है तू रुपये की व्यवस्थे कर मैं भूखण्ड तेरे नाम से खरीद देता हूँ। इस पर सरोज ने सूरज को बातों में लेकर आठ लाख रुपये सरोज ने भाई को दे दिए। इसके बाद भाई ने मकान बनवाने के नाम पर सरोज से बयालीस लाख रुपये और झटक लिए। यह सब सूरज ने दुकान के पैसों में हेराफेरी कर के दिए थे। उधर दीपक जी को पिताजी ने खबर दी की गाँव में पाँच एकड़ जमीन मौके की साठ लाख रुपये में बिक रही है। अब बुढ़ापे में मुझसे मजदूरी नहीं होती तू अगर वो जमीन मुझे खरीद कर ले दे तो उसके सहारे मैं अपना बुढ़ापा काट लूँगा। शहर में रहना नहीं चाहता ठेठ गाँव का आदमी हूँ। तब दीपक ने पैसे जुटाने के लिए दुकान के बैंक एकाउण्ट की जानकारी हासिल की तो पता चला कि खातों मे बेलेन्स ही नहीं था। उन्होंने दुकान का हिसाब किताब रखने वाले से संपर्क किया तो पता चला की सारी हेराफेरी सूरज ने की है। उन्हें इसका गहरा धक्का लगा। सूरज ने उनसे विश्वास घात किया था। जब यह बात उन्होंने सूरज से कही तो सूरज और सरोज दीपक से झगड़ने लगे और लड़ भिड़कर अलग हो गए। सरोज को हेराफेरी करके छुटाए गए पैसे की गरमी थी। वो सूरज को लेकर मायके आ गई। सारी बात सुनकर मायके वालों के चेहरों का रंग उड़ गया। सरोज ने माँ के पास जमा किए रुपये माँगे तथा भैया से अपने मकान की चाबी माँगी। देखते ही देखते मायके का माहौल बदल गया। माँ बोली कौन से पैसे? कैसे पैसे? कब दिए थे तूने। हमको कोई पैसे नहीं दिए। सरोज ने पिता की तरफ देखा तो वो बोले तेरी माँ सही कह रही है हम बेटी के पैसे लेकर क्या करेंगे। सरोज ने भैया से कहा मकान की चाबी दो भैया बोले कैसी चाबी तेरा कोई मकान नहीं। मकान तेरी भाभी के नाम है और वो हमारा है। सरोज दुखी मन से सूरज के साथ लौट आई थी। अब वे दीपक के साथ रह नहीं सकते थे। उन्होंने एक छोटा मकान किराये से ले लिया था। सूरज जो कभी सेठ था अब एक दुकान पर नौकरी कर रहा था। दोनों को अपनी करनी का फल मिल रहा था। दीपक जी को अपनी दुकान फिर से जमाने में पूरे दो साल लगे थे। उन्होंने पिताजी को पाँच एकड़ जमीन भी खरीद कर दे दी थी। लेकिन जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम कराई थी। भाई पर उनका भरोसा हट गया था। सूरज की दो साल में बहुत बुरी हालत हो गई थी। सरोज के मायके वालों ने उससे पूरी तरह मुह मोड़ लिया था। सरोज की जिठानी तरस खाकर उनकी मदद कर दिया करती थी। सूरज को इन घटनाओं ने तोड़कर रख दिया था। अचानक एक दिन सूरज को घबराहट हुई। सरोज उसे फौरन अस्पताल ले गई। सूरज को हार्ट अटेक आया था। उसके हार्ट की नली में ब्लॉकेज थे। डॉक्टरों ने इलाज के पहले दो लाख रुपये जमा करने को कहा था। सरोज के पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसने मायके वालों से संपर्क करने की खूब कोशिश की पर किसी ने उसका फोन नहीं उठाया। उधर डॉक्टर कह रहे थे जल्दी निर्णय लो अगर दूसरा हार्ट अटेक आ गया तो इन्हें बचाना मुश्किल हो जाएगा। सरोज की आँखों के आगे अंधेरा छा गया था। वो निढाल होकर बैंच पर बैठ गई थी। उसकी आँखें दुख के कारण बंद थी तभी उसके काँधे पर किसी ने हाथ रखा। सरोज ने आँख खोलकर जो देखा तो हैरत में पड़ गई। ये हाथ उसकी जेठानी का था। सरोज रोकर अपनी जैठानी से लिपट गई। उधर दीपक फौरन डॉक्टरों से मिले पैसे जमा कराए और सूरज का इलाज शुरू कराया। दीपक के पूरे पंद्रह लाख रुपये इलाज में खर्च हो गए थे तब सूरज ठीक हुआ था। सूरज के पूरी तरह ठीक होने तक दीपक ने उसका पूरा ख्याल रखा इसके बाद सूरज फिर किराये के मकान में आ गया। उसने फिर नौकरी करना शुरू कर दी थी। सूरज ने एक बार दीपक का विश्वास तोड़ दिया था अब वे फिर से उस पर विश्वास कैसे करते।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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