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कहानी: कामयाबी

नीरज हर्षपुर गाँव में हाईवे से लगी डेढ़ सौ एकड़ जमीन में मेडिसिन की फेक्ट्री खोली थी तथा एक बड़ा रिसर्च सेन्टर भी बनवाया था। अस्सी एकड़ जमीन उसने दलाल के माध्यम से खरीदी थी तथा साठ एकड़ जमीन शासन ने उसे लीज पर प्रदान की थी। नीरज उसमें वो दवाइयाँ बना रहा था जो पहले विदेशों से मँहगी कीमत पर ली जाती थीं। अस्सी हजार से एक लाख रुपये तक के इंजेक्शन नीरज की फेक्ट्री पन्द्रह सौ रुपये की कीमत में तैयार कर रही थी। आज नीरज ने अपनी फेक्ट्री की एक युनिट में अपने ताऊजी के दो लड़के बाबूलाल और मान सिंह को काम करते देखा तो उसे बड़ी हैरत हुई। उनके पास तो साठ एकड़ जमीन थी। उसके हिस्से की तीस एकड़ जमीन भी उनके पास थी। फिर उन्हें नौकरी करने की क्या जरूरत पड़ गई।
नीरज को सतरह साल पहले का समय याद आ गया जब उसके ताऊजी चमनलाल और उनके चार बेटों ने उस पर प्राण घातक हमला किया था तथा उसके हिस्से की तीस एकड़ जमीन छीन कर उसे गाँव से बाहर निकाल दिया था। नीरज के माता पिता का बस दुर्घटना में निधन हो गया था। तब नीरज आठवीं में पढ़ता था। माता पिता के निधन के बाद ताऊजी ने पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया था तथा घर से भी बेदखल कर दिया था। नीरज स्कूल के शिक्षक रामचरण सर जी के पास आया था। वे गाँव में अकेले रहते थे। उन्होंने नीरज को अपने पास रख लिया था। नीरज उनके लिए खाना बनाता था तथा उनके सारे घरेलू काम करता था। नीरज ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी थी। नीरज ने बारहवीं की परीक्षा विज्ञान एवं गणित विषय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। जब वो अपने हिस्से की जमीन लेने ताऊजी के पास गया तब उन्होंने तथा उनके बेटों ने उस पर जानलेवा हमला कर दिया। उसे मार मार कर अधमरा कर दिया तथा धमकी दी कि आज के बाद अगर गाँव में नजर आया तो तुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे। नीरज कुछ दिन रामचरण सर के पास रहा और फिर इन्दौर आ गया। इन्दौर में उसे दवा की फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी। वह कुछ ही समय में बहुत कुछ सीख गया था। फार्मेसी की उपाधि वाले भी उसके सामने नहीं ठहर पाते थे। उसकी योग्यता को देखकर फेक्ट्री के मालिक श्यामराव जी ने उसका एडमीशन फार्मेसी कॉलेज में करा दिया था। फार्मेसी की उपाधि लेने के बाद मालिक ने उसकी पदोन्नति कर दी थी। कुछ दवाओं के निर्माण में बहुत परेशानी आती थी। तब नीरज ने उन दवाओं के घटक अपने घर पर बनाई छोटी सी युनिट में तैयार करना शुरू किए। इससे कुछ दवाएं जल्दी बनने लगीं। फेक्ट्री मालिक ने नीरज को सहयोग दिया और औद्योगिक क्षेत्र में उसे एन्सीलेरी युनिट खुलवा दी। अब नीरज नौकर नहीं खुद एक दवा फैक्ट्री का मालिक बन गया था। इसी दौरान उसने वो दवाओं का फार्मुला खोज लिया था जो विदेश से मँहगे दामों में आती थीं। उसकी इस खोज पर मुख्यमंत्री ने भी सराहना की थी। उन्हीं की पहल पर नीरज इतनी बड़ी दवा की फैक्ट्री खोल पाने में सफल हुआ था और दवा इंडस्ट्री में तहलका मचा रहा था। जबकि ताऊजी के चारों लड़के अवारा निकल गए थे। गुंडागिर्दी करने के कारण पुलिस की लिस्ट में उनका नाम आ गया था। ज्यादातर जेल में रहते थे। इसके कारण उनकी सारी जमीन जायदाद बिक गई थी। हाल इतने बिगड़ गए थे कि अब वे चारों भाई मजदूरी कर के अपनी गुजर बसर कर रहे थे। जिसमें से दो भाई तो नीरज की फेक्ट्री में लेबर थे।नीरज की हैसियत में और उनकी हैसियत में जमीन आसमान का फर्क था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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