माँ के मरने के बाद रेशम बुआ सिर्फ एक बार मायके गई थी तबसे पूरे पाँच साल हो गए थे उसे मायके गए हुए। इस बार होली की भाई दूज पर अशोक भैया भी नहीं आए थे। आज रेशम बुआ भोपाल में आयोजित एक सामरोह में शामिल होकर सीधे इन्दौर अपने घर आ गई थी। जबकि भोपाल में उसका मायका था पर मायके से उसका मन अपनी भाभी के व्यवहार से इतना उचट गया था कि उसने घड़ी भर को भी वहाँ जाना उचित नहीं समझा था। अशोक भैया से भी उसे कोई उम्मीद नहीं थी वो तो भाभी के गुलाम हैं तो उसके खिलाफ एक शब्द भी बोलने की उनकी कभी हिम्मत नहीं होती थी।
छः साल पहले तक बुआ हर साल गर्मी की छुट्टियों में मायके जाती थी तब उसकी माँ जीवित थी और माँ की पेंशन से घर का खर्च चलता था। अशोक भैया का तो धंधा मंदा ही चलता था इसलिए भाभी भी अपनी ननद रेशम बुआ तथा उनके बच्चों का ख्याल रखती थी। रेशम बुआ की गरमी की छुट्टियाँ बड़े आराम से गुजरती थीं।लेकिन माँ का निधन हार्ट अटेक से हो जाने पर जब बुआ मायके आई तब उसे भाभी के व्यवहार में फर्क नजर आया। बुआ को भी ये लगा की माँ से ही तो बेटी का मायका रहता है जब माँ ही नहीं रही तो फिर कैसा मायका। माँ के निधन के बाद एक दिन अशोक भैया उसके पास इन्दौर आए और बड़े प्रेम से उसे भोपाल लेकर आए। बुआ की खूब खातिरदारी की गई फिर भैया बुआ को बैंक में ले गए जहाँ माँ के दस लाख रुपये जमा थे। भैया को वो पैसे निकालना थे उसमें बुआ के दस्तखत होना जरूरी थे। बुआ ने बिना ना नुकुर के दस्तखत कर दिए थे। भैया ने सारी रकम निकालकर अपने खाते में जमा कर दी थी। इसी तरह मकान के नामांतरण में भी बुआ के दस्तखत होना थे। बुआ ने उसमें भी दस्तखत कर दिए थे। इस तरह करोड़ों के मकान पर बुआ ने अपना हिस्सा छोड़ दिया था। बुआ ने यह सोचकर ऐसा किया था कि भाभी उसे माँ की कमी महसूस नहीं होने देंगी। वो इसी मुगालते में रही और गर्मी की छुट्टी में बच्चों के साथ मायके आ गई। पर भाभी के तेवर बदले देखकर उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। भाभी ने अपने सर पर पट्टी बाँध ली थी और बिस्तर पकड़ लिया था। अशोक भैया ने बताया कि भाभी की तबियत खराब हो गई है। बुआ को किचिन में जाकर सबके लिए चाय बनाना पड़ा। शाम को आठ लोगों का खाना बनाना पड़ा। भाभी ने कामवाली बाई को भी छुट्टी दे दी थी। बुआ को घर का झाड़ू पौंछा एवं बर्तन माँजने धोने का काम भी करना पड़ रहा था। भाभी बिस्तर पर ही खाना खा रही थी। ऐसा करते हुए पूरे पाँच दिन गुजर गए थे। इन पाँच दिनों में बुआ अच्छी तरह समझ गई थी की भाभी बीमार नहीं है बल्कि बीमारी का बहाना कर रही है। बुआ आईं तो थी डेढ़ महीने तक रहने के लिए लेकिन पाँच दिनों में ही वापस अपने घर आ गई थी। घर आते ही उसने चैन की साँस ली थी। बुआ को बाद में पता चला की भाभी की बहन अपने बच्चों के साथ गर्मी की छुट्टी बिताने आई थी। बहन को देखकर भाभी की तबियत एकदम ठीक हो गई थी। भाभी ने पूरे डेढ़ महीने तक अपनी बहन तथा उसके बच्चों की अच्छी खातिरदारी की थी। उन पर खूब रुपये भी खर्च किए थे। यह खबर सुनकर बुआ को बहुत दुख हुआ था। वो माँ की याद कर कई दिनों तक रोती रही थी। इसके बाद बुआ फिर कभी मायके नहीं गई। बुआ ने तय कर लिया था कि अब वो किसी भी स्थिति में कभी अपने मायके नहीं जाएगी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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