रवीन्द्र वर्मा जिनका विद्रार्थी जीवन में सी ए बनने का सपना था जो पूरा नहीं हो सका था आज उनका बेटा अनुज सी ए बन गया था । आज उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था जो सपना वे पूरा नहीं कर पाए थे वो सपना उनके बेटे अनुज ने पूरा कर दिया था।
रवीन्द्र जी ने हायर सेकेण्डरी में कामर्स विषय यही सोच कर ,लिया था कि वे आगे चलकर सी ए बनेंगे उन्होंने बहत्तर प्रतिशत अंक से हायर सेकेण्डरी की परीक्षा पास भी कर ली थी । इसके बाद बी कॉम में एडमीशन ले लिया था। लेकिन प रिवा की आर्थिक स्थिति इतवी दय नीय थी की वर्मा जी को अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर प्राइमरी शिक्षक की नौकरी करना पडी थी वर्मा जी के पिताजी राम मोहन कृषि विभाग में बाबू थे । उनकी जुआ खेलने तथा सट्टा लगाने की आदत थी । घर में वे आधी तनखा लाकर देते थे वर्मा जी का एक छोटा भाई नीरज था तथा बहन निशा थी। इतने कम पैसों में परिवार का खर्च नहीं चल पा रहा था पिताजी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास ही नहीं था माँ के कपड़े पुराने होकर फट जाते थे । माँ वही कपड़े पहने रहतीं थीं। फिर भी पितेजी एक बड़ी रकम जुएँ सट्टे में गँवा देते थे जो ऊपर की कमाई होती थी वो सट्टे की भेंट चढ़ जाती थी। । रवीन्द्र जी के पास भी एक जोड़ी कपड़े थे। रवीन्द्र छुट्टी के दिनों में मजदूरी करने लगे थे फिर भी एक दिन उनके पिताजी ने उनसे कह दिया कि अब मैं तुम्हें और नहीं पढ़ा सकूँगा तुम कोई नौकरी ढूँढ लो वैसे मेरी किशन आटा चक्की वाले से बात हुई है उसे एक सहायक की जरूरत है ढाई सौ रुपये महीना तनखा देगा चाहो तो वहाँ काम कर लो ढाई सौ रुपये पैंतीस साल पहले बड़ी रकम मानी जाती थी। रवीन्द्र जी ने गरीबी से तंग आकर काम करने का मन बना लिया था तभी उनकी शिक्षा विभाग में नौकरी लग गई और वे प्राइमरी शिक्षक बन गए। सी ए बनने का सपना उनका अधूरा रह गया बी कॉम तो उन्होंने पास चर,लिया पर सी ए की पढ़ाई वे नौचरी छोड़ करने का साहस नहीं जुटा सके थे। रवीन्द्र जी की शादी भी हो गई थी जिससे वे अपनी नौकरी नसीं छोड़ सके थे अनुज उनका बड़ा बेटा था। उन्होंने उसकी अच्छी परवरिश की थी ज़माना बदल चुका था अनुज भी सी ए बनने का सपना देख रहा था। रवीन्द्र जी ने भी तय,कर लिया था कि वे अनुज का सपना पूरा करने में हर तरह का सहयोग देंगे उन्होंने अनुज को सी ए की पढ़ाई कराई अनुज ने पाँच साल कड़ी मेहनत की तब कहीं वो सी ए की परीक्षा पास कर पाया था अपनी इस उपलब्धि पर अनुज बहुत खुश था रवीन्द्र,जी भी अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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