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कहानी: नारायणी

महिमा ने पच्चीस साल के अपने विधवा के जीवन में अपने बेटा आकाश को आई टी इंजीनियर तथा बेटी मेघा को डॉक्टर बनाकर यह सिद्ध कर दिया था कि नारी भी समर्थ नारायणी होती है।
पच्चीस साल पहले महिमा के पति राजू की अधिक शराब पीने के कारण सत्ताइस साल की अल्पायु में ही दुखद मौत हो गई थी। तब उसकी बेटी रूपाली तीन वर्ष की थी तथा बेटा आकाश एक साल का। उसके पति राजू की एक छोटी सी चाय की दुकान थी जिसका नाम राजू टी स्टॉल था। महिमा से उसकी चार साल पहले शादी हुई थी। तब राजू शराब तो पीता था पर कभी कभार ही। लेकिन दोस्तों की संगति में रहकर वो कुछ अधिक ही शराब पीने लगा था। शराब पीकर वो महिमा से झगड़ा करता था। इससे तंग आकर उसके पिताजी ने उसे घर से अलग कर दिया था। राजू महिमा के साथ किराये के मकान में रहने लगा था। घर से अलग होने के बाद वो पूरी तरह से शराब का आदी हो गया था। पूरे समय शराब के नशे में डूबा रहता था। शराब ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। वो बीमार पड़ गया जब उसे डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा कि अधिक शराब का सेवन करने से इनका लीवर खराब हो गया है। अभी इनका इलाज तो हो सकता है लेकिन इन्हें शराब का सेवन पूरी तरह से बंद करना पड़ेगा। इसके लिए महिमा ने अपने सास ससुर की मदद ली वे उसे ठीक होने पर घर ले आए। घर में उसको पूरी निगरानी में रखा गया। कुछ दिनों में राजू पूरी तरह से ठीक हो गया था। घर के लोगों ने भी उसकी निगरानी में थोडी ढील दे दी थी। एक दिन वो अपने दोस्त की बर्थ डे पार्टी में गया वहाँ दोस्तों के कहने पर उसने शराब का सेवन तो कर लिया पर घर में सभी ने उसकी अच्छ खबर ली। उसकी निगरानी फिर से सख्त कर दी गई। इससे तंग आकर राजू अपनी पत्नी तथा दोनों बच्चों को छोड़कर अज्ञात स्थान पर चला गया। वहाँ उसने एक कमरा किराये पर ले लिया जिसमें रहकर वो बेरोक टोक शराब का सेवन करने लगा। इस बार उसके लीवर ने अधिक साथ नहीं दिया और गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। जिस दोस्त ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया था उसी ने घर में उसके गंभीर रूप से बीमार होने की सूचना दी। महिमा तथा राजू के माता पिता अस्पताल पहुँचे तब डॉक्टरों ने कहा वो अपनी जिंदगी की आखिरी साँसे ले रहा है। लीवर ने काम करना बंद कर दिया है। उसकी दोनों किडनी फेल हो गईं। उसी रात को दो बजे राजू ने दम तोड़ दिया। पच्चीस वर्ष की आयु में वो अपने बच्चों को अनाथ तथा महिमा को विधवा बनाकर चला गया था। उसके अंतिम संस्कार के बाद महिमा दोनों बच्चों के साथ अलग थलग पड़ गई थी। महिमा से उसके परिजनों तथा परिचितों ने खूब कहा कि वो दूसरी शादी कर ले अभी तो उसकी उम्र महज पच्चीस साल की ही है। मगर उसने साफ मना कर दिया महिमा के माता पिता ने तो यहाँ तक कह दिया कि वे उसके दोनों बच्चों की जिम्मेदारी उठा लेंगे और तू किसी अच्छे लड़के से शादी कर के सुख से रहना। महिमा के इंकार करने पर वे खिन्न हो गए थे। भाभी ने तो बात करना बंद ही कर दिया था और भैया उससे सिर्फ काम की बातें करते थे। जब निर्मला को ऐसा लगा कि उसके माता पिता भैया भाभी उसे बोझ समझ रहे हैं तो उसने उन्हें भी छोड़ दिया और ससुराल न जाते हुए एक किराये का घर ले लिया तथा अपने पति राजू की बंद पड़ी दुकान फिर से खोल ली तथा चाय बनाकर बेचने लगी। शुरू शुरू में उसे काफी परेशानियाँ आईं पर बाद में सब कुछ सामान्य हो गया। उसकी दुकान ठीक से चलने लगी आसपास की किसी भी दुकान पर उससे अच्छी चाय नहीं मिलती थी इसलिए उसकी दुकान पर खूब भीड़ होने लगी थी। दुकान की कमाई से वो अपने दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रही थी। जब बच्चे बड़े हो गए और उनकी पढ़ाई का खर्च बढ़ने लगा तो दुकान पर उसने अपने हाथों से तैयार स्नेक्स रखना शुरू कर दिया। उसके हाथ में स्वाद था इससे दुकान की आय बढ़ गई थी जिससे वो अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च आसानी से निकाल रही थी। घर में सारे सुख सुविधा के साधन हो गए थे। महिमा ने अपने बच्चों का दाखिला अच्छे और मँहगे स्कूल में कराया था। उसने बच्चों की पढ़ाई पर पूरी तरह ध्यान दिया था। अच्छे संस्कार दिए थे दोनों बच्चे पढ़ने में बहुत तेज थे। दोनों बच्चे आगे चलकर कामयाब इंसान बन गए थे। महिमा के लिए यही ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण था।

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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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