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कहानी: मोरनी के अंडे

आज किशनलाल की जान उसके खेत में रह रहे दो मोरों ने बचाई थी। दिन भर उसने खेत में काम किया था। दोपहर में खाना खाकर आम के पेड़ के नीचे कुछ देर के लिए लेटा हुआ था। उसकी आँख कब लग गई ये पता ही नहीं चला। तभी मोरों की आवाज से उसकी आँख खुल गई तो देखा कि वे दोनों मोर एक जहरीले साँप से लड़ रहे हैं। वो उनकी लड़ाई देखने लगा आखिर में मोरों ने उसे मारकर अपना भोजन बना लिया। तभी उसके पड़ोस के खेत वाला सेवाराम उसके पास आया उसने बताया यह साँप तुम्हारी तरफ तेजी से बढ़ रहा था तभी अचानक मोरों ने उस पर हमला कर दिया। फिर तुम्हारी नींद खुल गई आज इन मोरों के कारण तुम्हारी जान बच गई। इन मोरों से किशनलाल को बड़ा लगाव था। उसकी उनसे मित्रता थी। आज उन्होंने मित्रता का फर्ज निभा दिया था। किशनलाल सोच रहा था कि इंसानों से पशु पक्षी कई गुना अच्छे और भले होते हैं। ये दोनों मोर उसके खेत में रहकर ही पले बढ़े थे जिसमें किशनलाल की मुख्य भूमिका थी।
दो साल पहले की बात है किशनलाल किसी काम से जंगल गया था। वहाँ एक जगह पर उसने मोरनी के पंख बिखरे देखे उसके पास ही दो अंडे पड़े थे। किसी बेरहम शिकारी ने मोरनी का शिकार किया था। अंडों पर उसका ध्यान नहीं गया था इसलिए अंडे वहीं रह गए थे। गाँव में आया तो बाबूलाल ने उसके हाथ में अंडे देखकर कहा ये कहाँ से ले आए तुम तो अंडे खाते नहीं हो। तब किशन ने कहा ये मोरनी के अंडे हैं। यह सुनकर बाबूलाल उन्हें चार गुना दाम में खरीदने को तैयार हो गया मगर किशनलाल ने साफ मना कर दिया। वो सलीम भाई के घर आया तथा उनसे कहा कि तुम्हारे पास मुर्गियाँ हैं ये दो अंडे उनके पास रख दो ये मोरनी के अंडे हैं। सलीम बोले एक मुर्गी अंडे दे रही है सलीम ने वे दो अंडे मुर्गी के पास रख दिए। मुर्गी उनको भी सेती रही। समय आने पर उनसे चूजे निकले वे दोनों मोरनी के चूजों को भी मुर्गी ने अपना ही समझा। लेकिन जब वे थोडे बड़े हुए तब मुर्गी को समझ आया कि ये चूजे उसके नहीं हैं। उसने उनको मारना शुरू कर दिया। तब सलीम भाई ने वे दोनों चूजे किशनलाल को दे दिए। किशनलाल उन्हें अपने खेत पर ले आए उनकी देखभाल की। जब वे बड़े हो गए तो उसने उन्हें जंगल में छोड़ दिया मगर वे फिर किशनलाल के खेत पर आ गए। तबसे वे किशनलाल के खेत पर ही रह रहे थे। किशनलाल से उनकी अच्छी दोस्ती थी जो आज उसके जान बचाने में काम आई थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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