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कहानी: मकान

नरेन्द्र के युवा बेटे अविनाश की शादी इसलिए नहीं हो पा रही थी क्योंकि उनके पास बहुत छोटा मकान था। बेटी की शादी तो उन्होंने कर दी थी पर बेटे की शादी में दिक्कत आ रही थी। कोई भी रिश्ता लेकर आता था तो घर देखकर अपना मन बदल देता था। जब वो रिटायर हो गए तब उन्होंने जो पैसे मिले उनसे बड़ा घर बना लिया तब कहीं अविनाश की शादी हुई। आज उन्होंने नए घर में अपने बेटे की बहू स्मिता की अगवानी की थी। आज वे बहुत ख़ुश थे।
नरेन्द्र जी सिंचाई विभाग में बाबू की नौकरी करते थे। जब उन्हें उनके माता पिता ने घर से अलग कर दिया था तब उन्होंने कम बजट में यह छोटा सा मकान बनवाया था। जिसमें एक किचिन और दो छोटे छोटे कमरे थे। उस में बहुत दिनों तक सुखपूर्वक रहे लेकिन जब बच्चे बड़े हो गए तो जगह की कमी महसूस होने लगी। यह मकान जो था उसकी छत टीन शेड की थी। मकान में कॉलम बीम भी नहीं थे। बारह बाई तीस का मकान था। उसे तोड़े बिना डबल स्टोरी नहीं बनाया जा सकता था। बेटी के शादी के बाद उन्हें बेटे की शादी की चिंता थी। अविनाश एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था। उसका वेतन इतना अच्छा नहीं था कि वो बड़े किराये के मकान में रह सके। नरेन्द्र के ससुर ने उन्हें आश्वासन दे रखा था कि जब उनकी जमीन बिकेगी तब वे अपने दोनों बेटों को मकान खरीद कर देंगे तो एक मकान आपको भी खरीद कर देंगे। आखिर हमारी जायदाद में बेटी का भी तो हिस्सा है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं उनकी जमीन दो करोड़ रुपये में बिकी। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी तथा दामाद से बोलचाल ही बंद कर दी तथा जिन बहु बेटों से वे परेशान थे वे उनके चहेते बन गए थे। ससुर ने मकान तो खरीदे थे पर सिर्फ अपने बहू बेटों के लिए, बाकी पैसों की उन्होंने जमकर मौज उड़ाई उन्हीं पैसों से अपने बेटों की बेटियों की शादी की। नरेन्द्र को इसका कोई दुख नहीं था बस मलाल इसी बात का था कि बार बार मकान खरीदकर देने की बात कहने के बाद भी उन्होंने उनकी बेटी और दामाद के लिए कुछ भी नहीं किया। इधर नरेन्द्र जी का बेटा भी विवाह योग्य हो गया था पर मकान अच्छा न होने से शादी में रुकावट आ रही थी। आखिर उन्होंने जी पी एफ से पैसे निकाल कर तथा बैंक से लोन लेकर बारह सौ वर्ग फीट का पलॉट तो ले लिया था पर उस पर मकान बनवाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। जब वे दो साल बाद रिटायर हुए और उन्हें जो पैसा मिला उससे वे बड़ा मकान बना सके थे। उनके पूरे पैसे इसी में लग गए थे। अब उनके पास सिवाय पेंशन और कोई जमा पूँजी नही थी पर इस बात की खुशी थी कि उनके पास भी बड़ा और सर्व सुविधा युक्त मकान है। और बहू के आने से तो वे बहुत ही ख़ुश थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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