उमानाथ जी के दो बेटे और दो बेटियाँ थीं। सब की शादी हो गई थी। उन्होंने अपने जीते जी अपनी पुश्तैनी एक एकड़ जमीन दो करोड़ रुपये में बेचकर चार मकान बनवाए थे। चारों मकान उन्होंने अपनी चारों संतानों के नाम कर दिए थे। बेटियों के नाम भी उन्होंने दो मकान किए थे। उन्होंने किसी के साथ अन्याय नहीं किया था। सतहत्तर वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ था। निधन के पहले वे बची हुई आधा एकड़ जमीन स्कूल को दान कर गए थे। उनकी पत्नी का निधन दो वर्ष पूर्व हो गया था। आज उनकी तेरहवीं में सब उनकी प्रशंसा कर रहे थे कि उन्होंने बेटों के साथ ही बेटियों का भी ख्याल रखा था।
दो वर्ष पहले जब उनकी पत्नी श्यामा का निधन हुआ तब उनकी दोनों बेटी सुधा और सरला का मायका ही छूट गया। उमानाथ जी की जमीन शहर से लगी हुई थी। उसकी कीमत अच्छी हो गई थी। बेटे उमानाथ जी पर उसे बेचने का दवाब बना रहे थे। दोनों बेटे और उनकी पत्नियाँ बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनके पिताजी बहनों को एक रुपया भी दें। उमानाथ जी को भी बहुएँ बुढ़ापे में रोटी नहीं दे रही थीं। टिफिन सेन्टर से खाना मँगाकर खा रहे थे वे गाँव के मकान में अकेले रह रहे थे। उससे लगा आधे एकड़ का एक बाड़ा था। उसमें सब्जी भाजी लगाकर उसे बेचकर वे अपनी गुजर बसर कर रहे थे। बेटे जब चाहे तब आकर उन्हें धमका जाते थे कि जमीन बेचकर पैसे हमें दे दो। जबकि उन्होंने आज तक उन्हें एक टाइम का खाना तक नहीं खिलाया था। उनकी दोनों बेटियाँ सुधा और सरला के पति प्राइवेट नौकरी करते थे तथा किराये के मकान में रह रहे थे। आज के इस मँहगाई के ज़माने में वे खुद का मकान लेने की सोच भी नहीं सकते थे। इस बात को उमानाथ जी अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने एक बिल्डर को अपनी एक एकड़ जमीन इसी शर्त पर बेची थी की वो बारह सौ वर्ग फीट के चार डुप्लेक्स मकान उन्हें बनाकर देगा। इस बात की भनक उन्होंने किसी को भी नहीं लगने दी थी। मकान बहुत सुंदर बने थे आधुनिक सुख सुविधाओं से लैस थे। उनके निधन पर अंत्येष्टि पर होने वाले खर्च की व्यवस्था भी वे कर के गए थे बड़े बेटे ने सिर्फ उन्हें मुखाग्नि दी थी। किसी की जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ था। उमानाथ जी की मौत चलते फिरते हुई थी। वे एक दिन के लिए भी बीमार नहीं पड़े थे। रात को मंदिर में कीर्तन में गए थे सुबह दालान में सो रहे थे जब देर तक नहीं जागे तब पड़ोस के रामलखन जी उन्हें जगाने आए तब पता चला कि उनका तो निधन हो गया है। उनके अंतिम संस्कार के बाद उनकी जायदाद को लेकर दोनों बेटों में विवाद होने लगा। बेटियाँ पिता के जाने के दुख से दुखी थीं भाईयों को लड़ते देख और भी दुखी हो रहीं थीं तभी वकील विजय शर्मा जी वहाँ आए तथा उन्होंने कहा कि जिस जमीन को लेकर तुम झगड़ा कर रहे हो वो जमीन उमानाथ जी बेच चुके हैं और इस मकान को लेकर भी झगड़ने की जरूरत नहीं है यह वो स्कूल को दान कर चुके। यह सुनकर दोनों बेटे और बहू सकते में आ गए जबकि बेटियों के चेहरे भावहीन रहे। तब विजय शर्मा बोले घबराने की जरूरत नहीं है उमानाथ जी शहर की पाॅश एरिए में स्थित वृंदावन कॉलोनी में चारों के नाम अलग अलग डुप्लेक्स बनवाकर गए हैं। मकानों की भव्यता देखकर सब खुश थे। उनकी बेटियों की आँखों से तो आँसू निकल आए थे ऐसा मकान तो उनके लिए सपना था। वे किराए के छोटे मकानों में जैसे तैसे रह रहे थे। अगर पिताजी ऐसा कर के नहीं जाते तो उनके दोनों भाई उनसे दस्तखत कराकर जमीन बेच देते और आपस में रुपया बाँट लेते उन्हें एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती। सरकार ने उमानाथ की जमीन पर हायर सेकेण्ड्री स्कूल बनाने का निर्णय लिया था। जिसका नाम उमानाथ हायर सेकेण्डरी स्कूल रखा जाना था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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