राम मोहन तीसरी बार सरपंच का चुनाव जीते थे लेकिन यह चुनाव वो अपने खास दोस्त आलोक की बदौलत नहीं जीते थे। बल्कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी राजेश के कारण जीते। यही तो राजनैतिक चाल है जिसका शिकार आलोक हो गया। आलोक जो कभी उनका खासम खास था आज वो उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया था। और जितनी क्षति पहुँचा सकता उतनी क्षति वो राम मोहन की कर रहा था। इस बार शायद वो राम मोहन को परास्त करने में सफल भी हो जाता लेकिन राजेश के सहयोग से वे फिर चुनेव जीत गए थे।
आलोक राम मोहन जी का सबसे बड़ा समर्थक था और सबसे खास भी। जब राम मोहन पहली बार सरपंच बने थे तब आलोक उनके संपर्क में आया था। अब आलोक ने राममोहन की निकटता प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास किए थे और वो इसमें सफल भी हो गया था। कुछ समय बाद तो राम मोहन पूरी तरह आलोक के वश में हो गए थे। वो जो कहता उसे करते थे इससे आलोक की गाँव में भी बड़ी प्रतिष्ठा थी। आलोक को राममोहन जी ने बहुत लाभ पहुँचाया था। कभी जिसके पास घर का मकान तक नहीं था आज वो शानदार मकान में रह रहा था। दस एकड़ सिंचित जमीन थी उसके पास और बत्तीस लाख की बड़ी कार भी उसके पास थी। आलोक को महत्व देने के कारण राममोहन जी के कई अपने उनसे दूर हो गए थे और कुछ आलोक की चाल का शिकार हो कर राम मोहन की नजरों से उतर गए थे। दूसरे चुनाव में राम मोहन जी ने जनपद सदस्य के चुनाव में अपने समर्थन से आलोक को खड़ा किया था। इस तरह आलोक जनपद सदस्य बन गये थे। इससे उसका रुतबा और बढ़ गया था। सोमदत्त कभी राम मोहन के अच्छे मित्र थे और वे उन्हें सही परामर्श देते थे। एक दिन उन्होंने राम मोहन जी को समझाया था कि आलोक से सावधान रहना वो आपकी ज्यादा ही चापलूसी कर रहा है लेकिन राम मोहन को आलोक पर इतना विश्वास था कि उन्होंने आलोक के कहने पर सोमदत्त से बातचीत करना ही बंद कर दी थी। आलोक को राम मोहन जी की कमजोरी और शक्ति के विषय में सब पता था। आलोक ने ही राजेश से राममोहन जी की दुश्मनी कराई थी। राजेश वार्ड मेम्बर था और राम मोहन जी का सबसे बड़ा विरोधी भी। आलोक से दुश्मनी होने से राम मोहन अपने आपको कमजोर महसूस कर रहे थे। फिर पंचायत चुनाव आ गए थे। इस बार स्थिति उनके अनुकूल नहीं थी राजेश उनका प्रतिद्वंदी था ही अब आलोक भी उनका दुश्मन बन गया था। एक दिन राममोहन जी के सामने सोमदत्त आ गए उनके बीच बोलचाल बंद थी लेकिन जाने क्या सोचकर सोमदत्त जी से राममोहन जी ने झुक कर नमस्कार किया और उनके हाल चाल पूछ लिए। सोमदत्त जी इससे पिघल गए और बोले मैं समझ रहा हूँ इस बार स्थिति आपके अनुकूल नहीं है। आपका खास सहयोगी आपका सबसे बड़ा दुश्भन बन गया है जो आपकी हर खूबी और कमजोरी जानता है। और वो आपको क्षति पहुँचाएगा। हारकर राम मोहन बोले अब आप ही बताओ मुझे क्या करना चाहिए। तब सोमदत्त जी ने कहा राजेश को अपनी तरफ कर लो अगर आलोक और राजेश मिल गए तो आपको हारने से कोई बचा न पाएगा। वे बोले ऐसा कैसे हो सकता है तब सोमदत्त जी ने कहा कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। उन्हें सोमनाथ जी की बात जमी और उन्होंने राजेश से जनपद सदस्य के चुनाव में सहयोग देने की बात कही तथा बदले में सरपंच के चुनाव में राजेश का सहयोग एवं समर्थन माँगा। राजेश के सामने सुनहरा अवसर था। वो सीधे पंचायत के वार्ड मेंबर से जनपद सदस्य बनने वाला था तथा आलोक को पराजित करने का भी उसे मौका मिल रहा था। राजेश और राममोहन को एक साथ देखकर आलोक की परेशानी बढ़ गई थी। वो राजेश को सरपंच के चुनाव में सहयोग देकर जनपद सदस्य के चुनाव में सहयोग लेना चाहता था लेकिन इसके पहले ही उन्होंने राजेश को अपने पक्ष में कर लिया था। इधर उसने यह भी सुना था कि राजेश ने यह कहते हुए राम मोहन जी से सुलह की थी कि उसे आलोक से नफरत है। अब आलोक अगर आपका दुश्मन है तो मेरा तो वो पहले से ही दुश्मन है। इसका सकारात्मक परिणाम ये निकला कि राममोहन जी फिर इस बार सरपंच का चुनाव जीत गए थे। साथ ही राजेश जनपद सदस्य का चुनाव जीत गए और आलोक को करारी हार मिली थी। जिस उम्मीद से उसने राम मोहन जी का साथ छोड़ा था वो उम्मीद भी पूरी नहीं हुई थी। राम मोहन जी की खुशी तो दुगुनी हो गई थी और राजेश भी जनपद सदस्य के पद पर निर्वाचित होकर बहुत खुश था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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