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कहानी: अंतिम संस्कार

शारदा देवी का पिच्यासी वर्ष की आयु में दुखद निधन हो गया था उनके दो बेटे होते हुए भी उनका अंतिम संस्कार उनकी बेटी सुनीता ने मुखाग्नि देक किया था उनके बेटे अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए थे । सुनीता ने ही अपने पास से रुपये खर्च कर,उनकी तेरहवीं की थी तथा प्रयाग में जाकर गंगा जी में अस्थियों का विसर्जन कराया था सुनीता के दोनों भाई किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए थे। उसका एकमात्र कारण यही था कि शारदा देवी ने सुनीता के नाम मकान कर दिया था सुनीता और उसका पति उसी मकान में शारदा देवी के साथ रहते थे।
सुनीता पन्द्रह वर्ष से माँ के साथ रह रही थी पन्द्रह वर्ष पूर्व सुनीता के पति सुरेश का किसी से लेनदेन को लेकर झगड़ा हो गया था जिसके उसे सजा हो गई थी सुनीता को ससुराल वालों ने अपने साथ रखा नहीं तो वो अपने एक साल के बेटे नितिन को लेकर मायके आ गई। सुनीता के पिताजी अमृतलाल शिक्षा विभाग में चपरासी के पद से रिटायर हुए थे। अपनी नौकरी के दौरान उन्होंने रजत नगर में,यह छोटा सा मकान बनवाया था यही उनकी एक मात्र संपत्ति थी जिसमें वे रह रहे थे बड़ा,बेटा भी चपरासी के पद पर नौकरी कर रहा था उस समय चालीस हजार,रुपये खर्च करके उन्होंने ही उसकी ये सरकारी नौकरी लगवाई थी छोटे बेटे उपेन्द् को पुलिस में भर्ती कराया था उसके लिए उन्होंने,तीन लाख रुपये खर्च किए थे दोनों बेटे शादी के बाद जोरू के गुलाम साबित हुए और माँ बाप को छोड़कर अलग अलग रहने लगे दोनों भाइयों ने अपना अपना मकान भी बनवा लिया वे माँ बाप की कभी भी खबर लेने नहीं आए सुनीता के आ जाने पर,दोनों को बड़ा सहारा मिला था पिताजी को जो पेंशन मिलती थी उनमें उनका ही गुजारा मुश्किल से होता था सुनीता एक निजी अस्पताल में नर्स की नौकरी करने लगी थी उसके वेतन से वो अपना तथा बच्चे का खर्च चला रही थी सुनीता के दोनों भाई इससे बहुत नाराज थे। उन्होंने माँ बाप से फोन पर बात करना भी बंद कर,दिया था उनका कहना था सुनीता का खर्च वे अपनी पेंशन में से उठा रही हैं जबकि उन्हें बारह हजार रुपये पेंशन मिल,रही थी। तीन साल बाद सुरेश भी जेल से छूटकर सुनीता कः साथ ही अपनी ससुराल में रहने लगा था। मकान शारदा देवी के नाम था जब अमृतलाल का निधन हुआ उस समय दोनों बेटे आए थे तब माँ से कहकर गए थे कि सुनीता और उसके पति को मकान से निकाल दो। लेकिन शारदा देवी ने उनकी बात नहीं मानी अगर,मान लेतीं तो उनका बुढ़ापा कैसे कटता। सुनीता का पति मिस्त्री का काम करता था। पति के निधन के बाद शारदा देवी छः साल जीवित रहीं वे पिछले एक वर्ष से बीमार थीं तब सुनीता और,उसके पति ने उनकी बहुत सेवा की थी जिससे खुश होकर,उन्होंने ये मकान सुनीता के नाम कर दिया था ऐसा करना दोनों बेटों की नाराजगी का कारण बना यही कारण रहा कि वे माँ के अंतिम संस्कार में भी वे शामिल नहीं हुए थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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