सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: छिपा हुआ धन

गढ़े धन की खोज में अपनी जान गँवा चुके फूलचंद के दोनों बेटे रोहित और दिनेश आज शहर के सफल व्यापारी थे। रोहित अनाज का बड़ा व्यापारी था तथा दिनेश का टू व्हीलर तथा फोर व्हीलर ऑटोमोबाइल का शोरूम था। उनका मकान शहर के आलीशान मकानों मे से एक था।
तीस पहले की बात है जब रोहित की उम्र दस साल तथा दिनेश की उम्र आठ साल की थी तब फूलचंद अपने खेत  में एक जगह पर गढ्ढा खोद रहे थे। खुदाई कुछ ज्यादा गहरी हो गई थी। उस खुदाई में उन्हें एक छोटा घड़ा मिला उसमें सौ चाँदी के सिक्के थे। फूलचंद उसे पाकर बड़े खुश हुए। उस समय चाँदी का भाव छः हजार रुपये किलो था। मगर सुनार ने उन सिक्कों के बदले फूलचंद जी को साढ़े चार हजार रुपये ही दिए थे। सस्ता जमाना था वे पैसों को उन्होंने मौज मजे में खर्च कर दिए थे। इसके बाद उन्हें धरती में गढ़ा धन पाने की चाहत हो गई थी। किसी ने उन्हें एक तांत्रिक का पता बताया था। जो राजस्थान के किसी गाँव में रहता था। फूलचंद उसे अपने साथ ले आए उसने पूजा अनुष्ठान के नाम से उनसे बहुत सारे रुपये ऐंठ लिए थे। खेती पर उन्होंने ध्यान देना बंद कर दिया था। तांत्रिक के कहने पर उन्होंने अपना खेत गिरवी रख दिया था तथा सारी सारी रात तांत्रिक के साथ धन की खोज में भटकते रहते थे। एक बार वे उस तांत्रिक को अपने गर लेकर आए तो तांत्रिक ने ध्यान लगाकर कहा धन की खोज में इधर उधर बेकार ही भटक रहे हो तुम्हारे घर के नीचे तो खजाना दबा पड़ा है। जिसमें ट्रक भर के सोने चाँदी हीरे जवाहरात दबे हैं। कुल बारह फीट खुदाई करना है इसके बाद तो धन का अंबार हमारे सामने होगा। फूल चंद मौके की तलाश में रहने लगे थे। पत्नी के सामने वे ऐसा कर नहीं सकते थे वो ऐसे धन की विरोधी थी। वो अपनी मेहनत पर भरोसा करती थी। पत्नी जब दोनों बच्चों को लेकर राखी पर मायके गई तब उन्हें मौका मिला। वो तांत्रिक को घर ले आए। वहाँ उसने कुछ अनुष्ठान किया तथा कहा रात को खुदाई करना शुरू कर देना सुबह जब मैं आऊँगा तब तक तुम शहर के सबसे बड़े रईस बन चुके होगे। फूलचंद जी का घर कच्चा था। मिट्टी की उसकी दीवारें थी। दो रातों तक वे अकेले खुदाई करते रहे पर कुछ हाथ नहीं आया। दो बजे लोगों ने तेज स्वर सुना तो  लोग बाहर निकले तब पता चला की फूलचंद जी का मकान भर भराकर नीचे गिर गया है। उस मकान के तेरह फीट नीचे फूलचंद जी की मृत देह मिली थी। फूलचंद जी ने सिवाय कर्ज के और कुछ नहीं छोड़ा था। मकान गिर ही गया था पति का निधन हो गया था। उनकी पत्नी मेहनत मजदूरी कर अपना तथा बच्चों का पालन कर रही थी तथा बच्चों को पढ़ा लिखा रही थी। सभी ने साथ छोड़ दिया था। वो अकेले ही संघर्ष कर रही थी। बच्चे जब बड़े  हुए तो उन्होंने अपनी मेहनत पर ध्यान दिया। यही कारण रहा की पढ़ लिखकर वे कामयाब व्यापारी का दर्जा हासिल कर पाए थे।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...