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कहानी: दंश

मानपुर गाँव के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रघुराज सिंह की नाराजी के कारण दस वर्ष पूर्व गाँव छोड़कर जाने को मजबूर हुए तिलकराम की आज ब्रज नगर में ड्राईक्लीनिंग एवं लान्ड्री की बहुत बड़ी दुकान थी तथा बहुत बड़ा मकान था जिसमें आठ किरायेदार रह रहे थे तथा उनका पूरा परिवार खुशहाल था।
दस वर्ष पहले जब तिलकराम मानपुर गाँव में रहते थे तब उनकी पत्नी शाँति देवी दाई का काम करती थी। तिलकराम कपड़े धोने का एवं कपड़ों में प्रेस करने का काम करते थे। तिलकराम की बेटी रूपा की शादी हो गई थी। बेटे राजीव की शादी उन्होंने छः महीने पहले मोहिनी से की थी। गाँव का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रघुराज सिंह था। गाँव में उसकी बहुत बड़ी हवेली थी। उसके पास दो सौ एकड़ जमीन थी। किसी में हिम्मत नहीं थी उसकी बात को काटने की वो जिससे जो कह देता था वो उसे करना ही पड़ता था। एक बार की बात है रघुराज सिंह के घर धुलाई के लिए कपड़े लेने जाना था। शाँति देवी कहीं दाई का काम करने गईं थीं तो मोहिनी रघुराज सिंह जी की हवेली पर कपड़े लेने चली गई। उसने घूँघट में अपने चेहरे को छिपा रखा था। ड्यौढ़ी से आगे निकलकर जब दालान में पहुँची तो रघुराज सिंह की पत्नी जिन्हें सब मालकिन कहते थे वो मोहिनी को कपड़े देने लगी। आसपास कोई पुरूष नहीं होने से उसने चेहरे से घूँघट हटा रखा था। मोहिनी को पता नहीं था कि बगल के कमरे से रघुराज का बिगड़ैल बेटा राजकुमार उसे बुरी नजर से देख रहा है। अचानक मोहिनी की नजर उस पर पड़ी वो उसकी बुरी नजर को भाँप गई और उसने शीघ्रता से घूँघट कर लिया और कपड़े लेकर चली गई। मोहिनी ने यह बात अपनी सास को बताई तो उन्होंने कहा कि चाहे जो परिस्थिति हो रघुराज सिंह की हवेली पर मत जाना। मोहिनी ने कहा ठीक है। लेकिन राजकुमार किसी बहाने से तिलकराम के घर आने लगा। तिलकराम उसे छोटे मालिक कहते थे। मोहिनी अच्छी तरह समझती थी कि वो उसके लिए यहाँ आ रहा है। जब तक राजकुमार रहता वो उसके सामने कभी नहीं आती थी। एक बार राजकुमार ने मोहिनी का रास्ता रोककर कहा कल हवेली पर आ जाना नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। मोहिनी ने मन में सोच लिया था चाहे कुछ भी हो जाए वो हवेली पर नहीं जाएगी। दूसरे दिन रघुराजसिंह ने खबर भिजवाई की मालकिन के हाथ पैरों की मालिश करना है इसलिए मोहिनी को हवेली पर भेज देना। मोहिनी ने सास को यह बात बताई तो सास ने उससे कहा तू मत जा मैं चली जाती हूँ। शाँति देवी को देखकर रघुराज सिंह को गुस्सा आ गया। बोले तुम्हारी बहू क्यों नहीं आई जल में रहकर मगर से बैर कर सकोगे क्या। शाँति देवी कुछ नहीं बोली वो फिर मालकिन के पास भी नहीं गई सीधे अपने घर आ गई। इस घटना से रघुराज सिंह आग बबूला हो गया। उसने तिलकराज को सबक सिखाने के लिए गाँव के सब लोगों से कह दिया कि तिलकराम के परिवार से किसी प्रकार का कोई भी सहयोग नहीं करेगा। इसके साथ ही रघुराज ने एक दूसरे परिवार को गाँव में बुला लिया था जो तिलकराम के सारे काम कर रहा था। अब तिलकराम को कोई मजदूरी पर भी नहीं रखेगा न ही किसी प्रकार का सहयोग देगा। थोड़े दिन में ही तिलकराम मुफलिस हो गया।
रघुराज सिंह के पास वो माफी माँगने भी गए पर रघुराज पर कोई फर्क नहीं पड़ा। हारकर तिलकराम जी ने गाँव छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी और पूरे परिवार को लेकर वे ब्रजनगर में आ गए। यहाँ आकर उन्होंने तीन पत्थरों की सहायता से कपड़ों पर प्रेस करना शुरू कर दी। कई दिनों तक ऐसा ही चलता रहा तिलकराम किराये के मकान में रह रहे थे। धीरे धीरे उनका काम अच्छी तरह चलने लगा था। उन्होंने एक दुकान भी ले ली थी।
पाँच साल में तिलकराम पूरी तरह अपनी गरीबी को दूर कर पाए थे। एक दिन रघुराज सिंह को तिलकराम ने अपनी दुकान पर आते देखा। तिलकराम बाहर आया हाथ जोड़कर उन्होंने रघुराज जी को प्रणाम किया। फिर उनके आने का कारण जानना चाहा तब रघुराज ने कहा कि वो अपने कर्मों की सजा भोग रहे हैं। बोले बहू की कोई संतान नहीं है। पोते का मुँह न देख पाने को मजबूर हूँ। पाँच बार उसका गर्भपात हो गया है। अब फिर वो गर्भवती है अब सिर्फ हमें तुमसे ही उम्मद है। केवल शांति देवी ही इस बच्चे को बचा सकती है। शाँति देवी पुरानी बात भूलकर उनकी मदद करने को तैयार हो गई। वो वहाँ पूरे चार महीनों तक रही। वो फिर रघुराज सिंह को पोते का मुँह दिखाकर ही आई। अपनी नेकी के कारण तिलकराम जी आज सुखी जीवन जी रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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