दस साल पहले गाँव से शहर आए ब्रजेश ने पन्द्रह बाई तीस वर्ग फुट का टीन शेड वाला कच्चा मकान तीन साल तक पाई पाई जोड़ने के बाद खरीदा था। मकान में पैसे उसके खर्च हुए थे। लेकिन वो मकान उसने अपनी माँ के नाम से रजिस्ट्री करा कर लिया था। उसके कारण उसे वो मकान छोड़कर दूसरी जगह किराये से रहना पड़ा था। इसके बाद फिर उसने लोन लेकर दूसरा मकान खरीदा था। आज उसने उस मकान में गृहप्रवेश किया था। पुराने मकान छोटे भाई ने पूरी तरह कब्जा कर लिया था।
दस साल पहले ब्रजेश जब गाँव से आया तब उसकी उम्र पूरे अठारह वर्ष की भी नहीं थी। गाँव से आने का कारण यही था कि उसके माता पिता छोटे भाई और बहन को तो बड़े लाड़ से रखते थे और उसे प्रताड़ित करते थे। स्कूल जाने नहीं देते थे। पन्द्रह वर्ष की आयु से ही उससे मजदूरी कराना प्रारम्भ करा दिया था। तब ब्रजेश ने सोचा मजदूरी करना ही है तो क्यों न शहर में जाकर की जाए। यह सोचकर ब्रजेश शहर में आ गया था। यहाँ आकर वो मजदूरी करने लगा था। शहर में मजदूरी के गाँव से दोगुने पैसे मिलते थे। एक बार वो हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्राचार्य वर्मा जी के घर पर मजदूरी कर रहा था तब उसने सुना वर्मा जी कह रहे थे कि उनके पिताजी लकवाग्रस्त होने के कारण ठीक से चल नहीं पाते हैं। उनकी दाढ़ी बढ़ गई सिर के बाल भी बहुत बढ गए हैं। कोई ऐसा नहीं मिल रहा जो घर आकर उनकी दाढ़ी कटिंग बना सके सुनकर ब्रजेश बोला मुझे दाढ़ी कटिंग बनाना आती है। मैं शाम को घर आकर उनकी दाढ़ी कटिंग बना दूँगा और फिर उसने ऐसा किया भी। साथ ही उनकी मालिश और चम्पी भी बहुत अच्छी की। साहब के पिताजी खुश हो गए उन्हें खुश देखकर साहब को अच्छा लगा उन्होंने ब्रजेश से कहा स्कूल में चौकीदारी का काम करोगे। ब्रजेश तैयार हो गया। ब्रजेश को कंटनजेन्सी से वेतन मिलने लगा। साहब ब्रजेश से बहुत खुश थे। गर्मी में जल संकट के दौरान ब्रजेश एक किलोमीटर दूर स्थित कुएँ से साहब के लिए पानी लाता था। इसका लाभ यह हुआ कि जब वर्मा जी डी ई ऑ बने तब उन्होंने ब्रजेश की नौकरी पक्की कर उसे चपरासी बना दिया था। इससे ब्रजेश की तनख्वाह बढ़ गई थी। ब्रजेश ने पैसे जोड़कर मकान खरीद लिया था। मकान बहुत छोटा था पर उसी मकान में उसके माता पिता और उसका छोटा भाई भी आकर रहने लगा। छोटा भाई अक्खड़ स्वभाव का था। उसकी पत्नी भी व्यावहारिक नहीं थी। आए दिन देवरानी जिठानी में लड़ाई होती। एक दिन ब्रजेश की माँ ने कहा कि मैं तेरे साथ नहीं रहूँगी मैं छोटे बेटे के पास रहूँगी और इस तरह ब्रजेश और उसका भाई अलग हो गए। उस मकान के दो हिस्से हुए ब्रजेश के हिस्से में साढ़े सात बाई तीस की जगह आई। दीवाल के कारण अंदर की जगह छः फीट बची थी। ब्रजेश जैसे तैसे उस मकन में रह रहा था। ब्रजेश का छोटा भाई कमाता कम था और शराब में पैसे ज्यादा खर्च कर देता था। उसकी पत्नी और माँ मजदूरी करने जाते तब उनका खर्च चलता। दूसरी और ब्रजेश को वेतन मिलता था। जिसमें उसका खर्च आराम से चल जाता था। ब्रजेश पार्ट टाइम काम भी कर लेता था। ब्रजेश को अच्छी तरह रहते हुए देखकर उसकी माँ और भाई उससे आए दिन झगड़ा करते रहते थे। एक दिन ब्रजेश की माँ कहने लगी हमें आधी तनख्वाह दिया कर या फिर यह घर छोड़कर कहीं और चला जाए। अंततः ब्रजेश ने वो घर छोड़ दिया और किराये के मकान में रहने लगा। फिर ब्रजेश ने बैंक से लोन लेकर बीस बाई चालीस वर्गफुट में बहुत अच्छा मकान बनाया था और आज उसमें गृहप्रवेश भी कर लिया था। यह मकान उसने खुद के नाम लिया था। आज वो बहुत खुश था जबकि ब्रजेश की माँ और उसका भाई उसे कोस रहे थे। जो भी रिश्तेदार उनसे मिलने आता उससे वे ब्रजेश की खूब बुराई करते थे पर ब्रजेश इसकी परवाह नहीं करता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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