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कहानी: जनार्दन सेठ

सुखताल गाँव के सामान्य कृषक जनार्दन पूरे गाँव में सेठ के नाम से जाने जाते थे। उनकी उम्र पिन्च्यानवे साल की हो गई थी मगर आज भी दान करने में वे पीछे नहीं हटते थे। गाँव का जो हायर सेकेण्डरी स्कूल है उसके लिए सत्तर साल पहले जगह उन्होंने ही दी थी। तब वो प्राइमरी स्कूल था उसमें दो कमरे और दालान भी आपने अपने पैसों से ही बनवाई थी। वे मनमौजी थे उनके बारे में गाँव में कई किस्से प्रचलित थे। हाल ही में शिवरात्रि पर उन्होंने गाँव के सारे व्रतधारियों को अपनी तरफ से फलाहार कराया था। पिन्चयानवे साल की उम्र में भी वे पूरी तरह स्वस्थ थे। उन्हें किसी प्रकार की कोई बीमारी नहीं थी। उनके पूरे बत्तीस दाँत अभी तक सही सलामत थे।
जनार्दन सेठ के बारे में कई प्रकार की अफवाह फैली हुईं थीं। कोई कहता उनको कहीं से गढ़ा धन मिल गया है। कोई कहता उन्हें कोई अज्ञात साधु सिद्धि दे गया जिससे उनके पास कभी धन की कोई कमी नहीं होती है। जनार्दन सेठ की एक ही बेटी थी निर्मला उसकी उम्र भी अब तिरेपन साल की हो गई थी। उसकी शादी उन्होंने पैंतालीस साल पहले जब की थी तब उसकी भव्यता की दूर दूर तक कई दिनों तक चर्चा चली थी। उस समय उनके समाज में पढ़े लिखे लड़कों की कमी थी। सेठजी ने अपनी लड़की को आठवीं तक पढ़ाया था। जबकि उस समय गाँव में कोई अपनी लड़की को स्कूल नहीं भेजता था। सेठ जी ने अपनी लड़की की शादी एम बी बी एस पास डॉक्टर नरेश से की थी। उनकी बेटी की शादी में चाय पान मिठाई तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ ऐसे टेन्ट लगाकर रखी गई थी जैसे मेला लगा हो। हर चीज मुफ्त में मिल रही थी। जितनी चाहे उतनी पोहा जलेबी खाओ कोई मनाही नहीं थी। शहर से बड़ा बैंड उन्होंने बुलवाया व दूल्हे के लिए शाही बग्घी बुलवाई गई थी। उस समय गाँव में लोग अपनी बेटियों की शादी छः वर्ष की उम्र में ही कर देते थे। जबकि जनार्दन सेठ ने अपनी बेटी की शादी पूरे अठारह वर्ष की उम्र में की थी। जनार्दन सेठ के पास तीस एकड़ सिंचित कृषि भूमि थी। वे उस पर उन्नत कृषि करते थे। सबसे पहले गोबर गैस प्लाँट उनके यहाँ लगा था। डेरी सबसे पहले उन्होंने खोली थी। ट्रेक्टर सबसे पहले वे खरीदकर लाए थे। सबसे पहले कंक्रीट की छत वाला मकान उन्होंने बनवाया था। बात उस समय की है जब जनार्दन सेठ की उम्र पच्चीस वर्ष की थी। तब वे पास के गाँव में नाटक देखने गए थे। वहाँ किसी बात पर उनका किसी से झगड़ा हो गया। दूसरे दिन वे वृंदावन गए और वहाँ से नाटक मंडली लेकर आ गए। उसके रहने खाने का खर्च आने जाने की व्यवस्था उन्होंने की। उनका वो आयोजन हर ओर चर्चा का विषय बन गया। कई दिनों तक वो नाटक मंडली रोज शाम को नाटक करती रही जिसमें भारी भीड़ उमड़ती थी। गाँव में सबसे पहले डीजल से चलने वाली आटा चक्की वे ही लाए थे। उस समय गाँव की महिलाएँ हाथ की चक्की से अनाज पीसती थीं। गाँव में कोई अतिथि आता तो वो जनार्दन सेठ के पास भेज देते थे। उनका बहुत बड़ा मकान था जिसमें रोज ही कोई न कोई अतिथि रुकते रहते थे। उनके भोजन पानी की व्यवस्था वही करते थे। गाँव के हायर सेकेण्डरी स्कूल में पढ़ने वाले अत्यंत निर्धन बच्चों की फीस वे ही भरते थे। इतना सब करने के बाद भी उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी। कितना पैसा वे परमार्थ में खर्च कर चुके थे इसका कोई हिसाब नहीं था। उनके ऊपर किसी का कोई कर्ज नहीं था। सत्तर साल की उम्र तक जनार्दन सेठ को सायकिल चलाने का बड़ा शौक था। उस समय सायकिल हजार रुपये में आती थी। वे नई सायकिल कसवाकर लाते थे और तीन महीने चलाने के बाद उसे तीन सौ रुपये में बेच देते थे। उनसे सायकिल खरीदने वालों की कोई कमी नहीं थी। एक बार बस के कन्डक्टर से उनका विवाद हो गया तो जनार्दन सेठ ने बस का परमिट लेकर अपनी बस उस लाईन पर चलवा दी जिससे उन्हें बहुत लाभ हुआ। जनार्दन सेठ का जब भी मन होता तो वे नोटों की गड्डी लेकर स्कूल पहुँच जाते थे और सारे बच्चों को एकत्रित कर वे नोट सब में बाँट कर आ जाते थे। एक बार जनार्दन सेठ स्कूल के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक बालक आइसक्रीम वाले से आइसक्रीम देने की मिन्नत कर रहा था। उसके पास तीन रुपये थे जबकि आइसक्रीम पाँच रुपये की थी। वो कह भी रहा था कि कल वो बाकी के दो रुपये अदा कर देगा लेकिन आइसक्रीम वाला मानने को तैयार ही नहीं था। सेठजी से नहीं रहा गया वे आइसक्रीम वाले के पास गए वो सेठजी को अच्छी तरह जानता था। सेठजी ने उस बालक को आइसक्रीम तो दिलवाई साथ ही यह भी कह दिया कि मध्यांतर का अवकाश चल रहा है इसलिए सब बच्चों से कह दो जनार्दन सेठ सबको आइसक्रीम खिला रहे हैं। देखते ही देखते बच्चों की भीड़ जमा हो गई। आइसक्रीम वाले की सारी आइसक्रीम जो वो दिन भर में बेचता वो आधे घंटे में ही बिक गई थीं। जनार्दन सेठ ने सबका भुगतान अपनी तरफ से कर दिया था। आइसक्रीम वाला खुश होकर चला गया था। सुखताल की पहचान जनार्दन सेठ से थी। लोग जब सुखताल का नाम लेते थे तो यही कहते जनार्दन सेठ वाला सुखताल। सेठ जी ने जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा था। राजनीति से वे कोसों दूर रहते थे। उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। सबसे उनका अपनापा था। यही कारण था कि पिन्चयानवे साल की उम्र में भी वे सक्रिय बने हुए थे।


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प्रदीप कश्यप

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