कंजीलाल और उसकी पत्नी बुधिया एक निर्माणाधीन मकान में,काम करते थे कु॔जीलाल मिस्त्री का काम करता था उसे एक हजार रुपये रोज मिलते थे बुधिया मजदूरी करती थी उसे पाँच सौ रुपये रोज मिलते थे वे होली की छुट्टी मनाकर पाँच दिन बाद काम पर आए थे ,दोपहर में जब वे लंच कर रहे थे तब इंजीनियर से वहाँ आए गुप्ता जी कह रहे थे ये गरीब केसी होली मनाते होंगे कितने पैसे खर्च करते होंगे उनकी बात सुनकर जो कुंजी लाल ने जवाब दिया उससे गुप्ता जी हैरत में पड़ गए।
कुंजीलाल ने उनसे कहा आपको होली की कितने दिन की छुट्टी मिली थी वे बोले तीन दिन की ओर चौथे दिन का हमने अवकाश ले लिया था पाँचवे दिन हम भी ऑफिस गए थे कोई काम तो था नहीं इसलिए यूँ ही खाली बैठकर आ गए थे कुंजीलाल बोला छुट्टी का आपको वेतन मिलेगा की नहीं वे बोले मिलेगा मुझे महीने में दो लाख दस हजार रुपये की तनख्वाह मिलती है सात हज़ार रुपये रोज के कुंजीलाल बोला आपने होली पर कितने रुपये खर्च किए गुप्ता जी बोले दस रुपये की एक गुलाल की पुड़िया भी खर्च नहीं हुई। कुंजीलाल बोला आपको छुट्टी के दिनों में अठ्ठाइस हजार रुपये मिले और आपने सिर्फ दस रुपये खर्च किए और हमें छुट्टी के दिनों की मजूरी नहीं मिली हमें साढ़े सात हज़ार रुपये का नुक्सान हुआ और होली में हमारे बीस हजार से ऊपर रुपये खर्च हुए। आपको अठ्ठाइस हज़ार का लाभ हुआ और हमें उतने ही रुपये का नुक्सान अब बताइए गरीब की होली खर्चीली रही की आप जैसे अमीर की गुप्ता जी कुंजीलाल की बात सुनकर कुछ उत्तर नहीं दे सके तभी कुंजीलाल के लंच का समय समाप्त हो गया और वो फिर से अपने काम में जुट गया।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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