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कहानी: लाड़ला बेटा

नारायण दास जी ने अपने जिस बेटे को करोड़ों की संपत्ति दी थी वही बेटा उनको अस्सी वर्ष की आयु में उज्जैन के मेले में अकला छोड़कर घर आ गया था। नारायणदास जी को भूलने की बीमार थी। उन्हें अपने नाम के सिवा कुछ याद नहीं था। दो दिन तक जब वे एक ही स्थान पर भूखे प्यासे बैठे रहे तब लोगों का ध्यान उन पर गया। पर वे किसी को अपने घर का पता बता नहीं सके थे। संयोग से उनकी बेटी सरोज तथा दामाद घनश्याम उधर से गुजरे तो भीड़ देखकर रुक गए। भीड़ के पास जब सरोज ने बदहवास हालत में अपने पिता को देखा तो काँप गई। वहीं एक दुकानदार ने बताया कि दो दिन पहले एक व्यक्ति इन्हें यहाँ बिठाकर गया था। तभी से ये भूखे प्यासे बैठे हैं। सरोज उन्हें अपने घर ले आई थी तथा उनकी अच्छी तरह से देखभाल कर रही थी। इस घटना को घटे दो वर्ष हो गए थे। वे सरोज को भी नहीं पहचानते थे। उसे वे अपनी बहू समझते थे और कहते बहू मेरी बहुत अच्छी है जो मेरा ख्याल रख रही है।
नारायणदास जी की शादी के तीन साल बाद सरोज का जन्म हुआ था। सरोज के जन्म पर उन्हें बड़ा दुख हुआ था उन्हें बेटे की उम्मीद थी। सरोज से उन्हें इतनी चिढ़ थी की वे उसे गोद में लेना तो दूर उसकी तरफ देखना तक पसंद नहीं करते थे। सरोज के जन्म के पाँच साल बाद जब बेटे सुरेश का जन्म हुआ तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। सारा लाड़ प्यार उन्होंने बेटे को दिया। सरोज इस बात को लेकर मन ही मन दुखी रहती थी। उसके पिता उससे सौतैली बेटी से बुरा व्यवहार करते थे। माँ जरूर बेटी से लगाव रखती थी। माँ की जिद से सरोज ने आठवीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। आठवीं के बाद उन्होंने सरोज की माँ सुमन की जिद नहीं चलने दी और उसकी पढ़ाई छुड़वा दी। सरोज को उसकी माँ ने घर के कामकाज में लगा दिया। नारायणदास अपने बेटे की हर जिद पूरी करते थे। वे उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे थे। नारायणदास जी की किराने की दुकान थी, पाँच एकड़ सिंचित जमीन थी, दो मकान थे। वे धन संपन्न थे मगर बेटी की जायज माँग पर भी एक पैसा तक खर्च नहीं करते थे। सरोज की शादी उन्होंने अठारह वर्ष की उम्र में सम्मेलन से घनश्याम के साथ कर दी थी। घनश्याम एक कपड़े की दुकान पर काम करता था। उसे बहुत कम वेतन मिलता था तथा वो किराये के मकान में रहता था। नारायणदास ने सरोज को दहेज के नाम पर एक कटोरी तक नहीं दी थी। उसी दिन वे अपने बेटे सुरेश को शाला की ओर से जाने वाले टूर के लिए तीस हजार रुपये जमा करके आए थे। सरोज जो एक बार शादी होकर घनश्याम के पास आई इसके बाद कभी नारायणदास जी ने सरोज की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा। सरोज को उन्होंने कभी अपने घर नहीं बुलाया। सरोज अगर किसी समारोह में मिल भी जाती थी तो वे उसकी तरफ से मुँह फेर लेते थे। सरोज के बच्चों को कभी नाना-नानी, मामा-मामी का सुख नहीं मिला था। दूसरी ओर सुरेश जिसे टूर पर जाते समय उन्होंने पूरे दस हजार रुपये दिए थे। जो उसने तीन दिन में पूरे खर्च कर दिए थे तथा पाँच हजार रुपये उधार लेकर भी खर्च कर डाले थे। जिसे बाद में नारायणदास जी ने चुकता किए थे। पिताजी के लाड़ प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था। वो बेरहमी से रुपये खर्च करता था बिना कुछ कमाए धमाए ही। नारायणदास जी ने उसका विवाह तय कर दिया था। सुरेश ने हर साल कक्षा में फेल होने का रिकार्ड बनाया था। दसवीं में तो वो पाँच बार परीक्षा देने के बाद भी सफल नहीं हो सका था। नारायणदास जी ने तब भी यही कहा था ज्यादा पढ़कर उसे नौकरी थोड़ी करना है वो तो सेठ बनेगा। उसके पिता के पास धन की कमी थोड़ी है। नारायणदास जी ने सुरेश की शादी धूमधाम से की थी। उसकी शादी में एक करोड़ रुपये खर्च किए थे मगर सरोज को तीन सौ रुपये की साड़ी तथा दामाद को सौ रुपये से ज्यादा विदा के समय नहीं दिया था। सरोज से शादी होने के बाद घनश्याम ने कपड़े की दुकान पर काम करना बंद कर फुटपाथ पर रेडीमेड कपड़ों की छोटी सी दुकान लगा ली थी। उसकी मेहनत रंग लाई थी। आठ साल में घनश्याम शहर की सबसे बड़ी कपड़े की दुकान का मालिक बन गया था जिसमें बीस लोग काम कर रहे थे। घनश्याम ने शानदार मकान बनवाया था उसके बच्चे भी अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे। जबकि सुरेश शादी के बाद भी पिता की कमाई पर ऐश कर रहा था। सुरेश की पत्नी रीना एक कुटिल स्वभाव की महिला थी। वो अपने ससुर की जमीन जायदाद और संपन्नता के कारण उनके साथ रह रही थी। वो अनाप शनाप खर्च कर रही थी। सुरेश की माँ सुमन का कैंसर की बीमारी के कारण निधन होने पर घर की मालकिन रीना बन गई थी। पत्नी के मरने के बाद नारायणदास की मनोदशा खराब हो गई थी। वे कई दिनों तक दुकान नहीं गए थे। जब कुछ ठीक हुए और दुकान पर गए तो पता चला सुरेश ने सारी दुकान खोखली कर दी थी। खाते में एक पैसा नहीं था दस लाख की उधारी चढ़ गई थी वो अलग चिंता की बात थी। नारायणदास जी ने एक मकान बेचकर दुकान का कर्ज चुकाया था तथा दुकान में फिर से सामान भरा था। उनके साथ जबतक पैरों में ताकत रही तब तक वे दुकान करते रहे। जब पस्त पड़ गए तो घर बैठ गए। सुरेश ने वो दुकान बिकवा दी थी तथा उससे मिला सारा रुपया उड़ा दिया था। जिस मकान में वे रह रहे थे वो मकान भी गिरवी रखा दिया था। यह सब नारायणदास जी बर्दाश्त नहीं कर सके और उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया। उन्हें भूलने की बीमारी हो गई थी। उसी दौर में सुरेश ने उनकी पाँच एकड़ जमीन दस करोड़ में बेच दी थी। सारा पैसा अपने खाते में जमा कराकर सुरेश उन्हें उज्जैन के मेले में भगवान भरोसे छोड़कर आ गया था। तभी से नारायणदास अपनी बेटी के पास रहे थे। उस बेटी के पास जिसे वो भूल गए थे कि ये उनकी बेटी है। वे उसे अपने लाड़ले बेटे की बहू समझकर उसकी तारीफों के पुल बाँधते रहते थे। सेवा सरोज कर रही थी और दुआएँ उस बहू को मिल रहीं थी जिसने नारायणदास जी को पूरी तरह मिटा दिया था। फिर भी सरोज उनकी अच्छी तरह से देखभाल कर रही थी।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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