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कहानी: नए एस डी एम

नए एस डी एम साहब ने कान्ट्रेक्टर द्वारा निर्माण कराए जा रहे स्कूल का कार्य रुकवा दिया था तथा पाँच लाख रुपये का भुगतान भी रोक दिया था। उसी सिलसिले में उनसे मिलने ठेकेदार विनोद वर्मा आया था। लेकिन जब मिलकर वो वापिस आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। उसकी ठेकेदारी खतरे में पड़ गई थी। ब्लेक लिस्टेड होने का डर सताने लगा था।
नए एस डी एम साहब आर पी मौर्य जी ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद निर्माणाधीन स्कूल भवन का निरीक्षण किया था। इंजीनियर नीरज जैन भी उनके साथ थे। स्कूल का निर्माण कार्य शुरू ही हौआ था। पाँच लाख रुपये ठेकेदार को मिल चुके थे। पाँच लाख का चेक और जारी होना था। एस डी एम साहब ने चैक देने से पहले निर्माण कार्य का निरीक्षण करना जरूरी समझा था और वे इंजीनियर जैन साहब को अपने साथ लाए थे। जैन साहब ने जाँच कर बताया नींव बहुत कमजोर है, निर्धारित मोटाई का सरिया नहीं डाला गया, सीमेंट बहुत कम मिलाई गई है, कुछ कालम जमीन को बिना खोदे ही उठा दिए गए हैं। इसे देखकर एस डी एम साहब बहुत नाराज हुए थे। तभी उन्होंने ठेकेदार को ब्लेकलिस्टेड करने का मन बना लिया था। संयोग बात यह थी की ठेकेदार उनका सहपाठी था जो उनके साथ कक्षा नौ से बारहवीं तक पढ़ा था। मगर एस डी एम ने इसका कुछ भी ख्याल नहीं किया। ठेकेदार ने पन्द्रह लाख की रिश्वत देने का ऑफर दिया वो भी उन्होंने ठुकरा दिया था तथा पुलिस में एफ आई आर दर्ज कराने की बात कही थी। विनोद वर्मा को स्कूल के दिन याद आ गए। विनोद वर्मा संपन्न परिवार के थे। जबकि  उनके साथ पढ़ने वाले रामप्रसाद मौर्य अत्यंत गरीब थे। उसके पास एक जोड़ी कपड़े थे। किताबें भी पर्याप्त नहीं थीं। परीक्षा में उनके नंबर भी अच्छे नहीं आते थे। गरीब होने के कारण उनसे कोई ठीक से बात भी नहीं करता था। उसी रामप्रसाद मौर्य ने आज विनोद वर्मा का ठेका निरस्त करवा दिया था। उनसे वर्मा की गहरी दोस्ती नहीं थी। सिर्फ उनके बीच में हलो-हाय होती थी। रामप्रसाद जी के पिताजी हरिप्रसाद जी का निधन तब हो ठया था जब वे सातवीं में पढ़ते थे। पिता के निधन के बाद सारी जिम्मेदारी राम प्रसाद जी के छोटे कंधो पर आ गई थी। वे हाइवे के एक ढाबे में रातभर काम करते थे। सुबह जब वे घर आते तो बहुत सारा होटल का बचा खाना लाते थे। तब सभी को पेटभर भोजन मिलता था। काम से वापस आने के बाद वे स्कूल जाते थे इसी कारण से वे पढ़ाई में बहुत कमजोर थे। वे अक्सर शिक्षकों की डाँट खाते रहते थे। जब वे बारहवीं कक्षा में आए तब तक उनकी उम्र अठारह वर्ष हो गई थी। शिक्षक गौरीशंकर जी उनसे लगाव रखते थे। उन्होंने अपने चाचा की फेक्ट्री में रामप्रसाद जी को काम दिला दिया था। उनकी शिफ्ट शाम चार बजे से रात के बारह बजे तक चलती थी। इस बीच उन्हें पढ़ने तथा स्कूल जाने का समय मिल जाता था। उन्होंने हायर सेकेण्डरी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीरण की थी। बीए पास उन्होंने फेक्ट्री में काम करते हुए किया था। फिर वे पी एस सी की तैयारियों में जुट गए थे। उनकी मेहनत रंग लाई थी और वे तहसीलदार बन गए थे। आठ साल बाद उनका प्रमोशन एस डी एम के पद पर हुआ था और उन्होंने विनोद वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की थी।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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