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कहानी: परित्याग

किशोर का बीस साल पूर्व उसके उन माता पिता ने  परित्याग कर दिया था जो उसे अनाथालय से गोद लाए थे तथा लिखित में यह वचन देकर आए थे कि वे इसको अपनी संतान की तरह लाड़ प्यार से रखेंगे, इस से कभी भेद नहीं रखेंगे। आज किशोर पूरे चौँतीस साल का हो गया था। उसकी शहर में कपड़े की दुकान थी। उसके दोनों बच्चे अनुरोध एवं अनुराधा अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे। उसकी पत्नी ममता नगर निगम में पार्षद थी तथा समाज सेवा भी करती थी। वे शहर के प्रतिष्ठित नागरिक थे।
किशोर को अनाथालय में उसकी अज्ञात माँ उस समय छोड़ गई थी जब वो एक दिन का था। उसको गोद लेने के लिए कई निस्संतान दंपत्ति आगे आए थे। उनमें से एक जीवन और उसकी पत्नी माया भी थी। उनकी शादी के आठ साल बीत जाने के बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई थी। उन्होंने किशोर को गोद ले लिया था। शुरू में तो उन्होंने उसका लालन पालन अच्छी तरह से किया लेकिन उनके मन में यह बात गहरे से बैठ गई थी कि यह कोई अपना खून थोड़ी है पराया है। किशोर जब बारह साल का हो गया तब शादी के बीस साल बाद जीवन और माया को अपनी संतान का सुख मिला। उनके यहाँ बेटे का जन्म हुआ था जिसका नाम उन्होंने अभिनव रखा था। उनका सारा लाड़ प्यार अभिनव के लिए हो गया था। किशोर की अब वे उपेक्षा करने लगे थे। इस तरह दो साल बीत गए थे किशोर जब चौदह साल का हुआ और उसने आठवीं पास कर ली। आठवीं उसके अच्छे नंबर आए थे मगर उसके माता पिता ने कोई ख़ुशी ज़ाहिर नहीं की ना ही उसे मिठाई खिलाई। किशोर का उत्साह ठंडा पड़ गया था। रिजल्ट आने के तीन दिन बाद उन्होंने किशोर के साथ मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया। किशोर दुखी मन से पुल के पास आ गया और वहाँ जाकर बैठ गया। उस पुल के नीचे भिखारियों का डेरा था। भिखारी उसे देखकर समझ गए कि यह घर से निकाला गया है। कुछ भिखारी उसके पास आए उसे समझा बुझाकर खाना खिलाया फिर बोले अब तुम्हारी यही दुनिया हैं तुम्हें हमारे बीच में ही रहना है। फिर वे उसे भीख माँगने के गुर सिखाने लगे कैसे लंगड़ाकर चला जाता है, चेहरे पर कैसे बेबसी के भाव लाए जाते हैं, कपड़े फटे पुराने और मैले कुचैले होने चाहिए या फिर अपने आपको पागल की तरह दिखाओ तभी तुम्हें भीख मिलेगी। किशोर ने देखा अधिकाँश भिखारी नशे के आदी थे। चरस, गाँजा, अफीम, शराब, तंबाकू का सेवन कर रहे थे। किशोर ने उनकी एक बात भी नहीं मानी जैसे तैसे उसने वहाँ रात गुजारी सुबह वो बस स्टेण्ड पर आ गया। वहाँ कपड़े का व्यापारी अशोक कपड़े का बड़ा गठ्ठर लेकर बस की प्रतीक्षा कर रहा था। किशोर अशोक को जानता था उसने अशोक से कहा वो काम करना चाहता है अगर कोई काम हो तो बताओ मैं कर दूंगा। जब अशोक ने उससे पूछा कि तुम्हें काम करने की नौबत कैसे आ गई तब किशोर ने बताया कि उसे घर से निकाल दिया गया है। अशोक को एक सहायक की जरूरत थी वो तीस किलोमीटर दूर श्याम नगर कस्बे में साप्ताहिक हाट में कपड़े की दुकान लेकर जा रहा था। उसने किशोर को अपने साथ रख लिया तथा कहा कि इसके बदले में वो उसे सौ रुपये देगा। वो सस्ता समय था पच्चीस रुपये में भरपेट भोजन मिल जाता था तथा पाँच रुपये में चाय नाश्ता हो जाता था। किशोर तैयार हो गया एक ट्रक में उसका कपड़े का गठ्ठर रखवा दिया जिसमें और भी व्यापारियों सामान रखा था। इसके बाद अशोक और किशोर ने चाय नाश्ता किया। फिर बस आ गई और वे बस में बैठकर श्याम नगर आ गए। दोनों ने मिलकर अपनी दुकान जमाई। दिन भर किशोर ने खूब मन लगाकर काम किया जिससे अशोक खुश हो गया। रात को आठ बजे वे घर आए। अशोक ने उसे एक कमरा किराये से दे दिया था तथा काम पर भी रख लिया था। दस बजे रात को किशोर ने कुत्तों के जोर जोर से भौंकने की आवाज सुनी। बाहर निकल कर देखा तो आठ दस कुत्ते एक कुत्ते को घेरकर भौंक रहे थे। किशोर ने जब उस कुत्ते को देखा तो चौंक गया। ये तो वर्मा अंकल का लेब्रोडोर कुत्ता जिगर था। वो बड़ी बेबसी से किशोर की तरफ देख रहा था। किशोर ने उसे उनसे बचाया तो जिगर उसके कमरे के पास आकर बैठ गया और कृतज्ञ नजरों से उसे देखने लगा। किशोर उसके लिए ब्रेड लेकर आया तथा उसे खिलाकर उसकी भूख मिटाई। किशोर को पता चला कि वर्मा अंकल ने उसे घर से बाहर निकाल दिया था। जिगर और उसकी कहानी एक जैसी थी। उनमें से एक इंसान था और एक जानवर पर उनमें गहरा रिश्ता हो गया था। इसके बाद जिगर कभी किशोर का साथ छोड़कर नहीं गया था। किशोर ने चार साल तक अशोक के साथ काम किया था। फिर अशोक का भान्जा दिनेश जब उसका सहायक बनकर आ गया तो उसने किशोर को हटा दिया। किशोर ने चार साल में पाई पाई जोड़कर कुछ पूँजी इकठ्ठी की थी। उसे लेकर वो कपड़े के थोक व्यापारी की दुकान पर गया। वो उसे पहचानते थे वहाँ से उसने रेडीमेड कपड़ा खरीदा पचास प्रतिशत नगद भुगतान किया तथा पचास प्रतिशत की उधारी कर दी। कपड़ों का छोटा सा गठ्ठर लेकर वो भी बस स्टेण्ड आ गया। वहाँ उसे अशोक भी मिल गया था पर दोनों ने एक दूसरे बात भी नहीं की। किशोर ने अपनी दुकान अशोक की दुकान से काफी फासले पर लगाई थी। शादी ब्याह का सीजन चल रहा था। पूरे बाजार में भीड़ थी। शाम तक किशोर का पूरा सामान बिक गया था। अशोक का बाजार फीका रहा था। उसके भाँजे ने भी उसे निराश कर दिया था पर वो किशोर से कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। किशोर दिनोंदिन तरक्की करता हुआ आज इस मुकाम पर पहुँचा था। जहाँ उसके पास किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। दूसरी ओर किशोर को गोद लेने वाले माता पिता को उनके बेटे अभिनव ने बर्बाद कर दिया था वो अपराधी प्रवृत्ति का था। उसने घर मकान जमीन जायदाद सब बिकवा दिए थे। वे वृद्धाश्रम में रह रहे थे। किशोर को उनकी दशा देखकर बहुत दुख हो रहा था। वो उन्हें अपने साथ ले जाने को तैयार था पर वे नहीं आना चाहते थे। उनका बेटा अभिनव किसी अपराध से जेल की हवा खा रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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