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कहानी: विश्वासघात

पन्द्रह साल पहले अपने साढू के विश्वास घात के कारण जो डुप्लेक्स दीपेन्द्र नहीं खरीद पाया था उसकी आज कीमत सत्तर लाखा रुपये थी। वो प्रापर्टी बैंक नीलामी में बिक रही थी और पन्द्रह डूप्लेक्स थे। दीपेन्द्र चाहता था कि  साढ़ू और वो दो डुप्लेक्स खरीद लें लेकिन वो प्रापर्टी हाथ से निकल गई थी। आज दीपेन्द्र ने मुख्य शहर से अठारह किलोमीटर दूर पचपन लाख रुपये में एक डुप्लेक्स खरीदा था जिसमें उसका रिटायरमेन्ट में मिला सारा रुपया खर्च हो गया था।
बात पन्द्रह साल पुरानी है जब दीपेन्द्र महानगर में एक मकान में किराये से रहता था। मकान का किराया बहुत अधिक था। दीपेन्द्र के तीनों बच्चे पढ़ रहे थे। दीपेन्द्र महानगर से सत्तर किलोमीटर दूर के गाँव इमली खेड़ा की शासकीय माध्यमिक शाला में शिक्षक के पद पर कार्यरत था। बच्चे और उसकी पत्नी प्रभा महानगर में रह रहे थे। दो कमरे का छोटा सा मकान था उसमें ही साढ़ू की लड़की सरिता भी रहने आ गई थी। उसने बी एड में एडमीशन ले लिया था। दीपेन्द्र का साढ़ू एक कमाऊ विभाग में सब इंजीनियर था। उसकी रिश्वत से अच्छी कमाई हो जाती थी। उसके पास बहुत पैसा था। उसी दौरान उसके ससुर के भाई का लड़का एक आवासीय भूखण्ड बेच रहा था। पचास हजार रुपये में दीपेन्द्र ने जब उसे खरीदने की बात कही थी वो बोला कि आपको मैं पैतालीस हजार रुपये में बेच दूँगा। दीपेन्द्र ने अपनी एफ डी तुड़वाकर तथा किसी से रुपये उधार लेकर पैंतालीस हजार रुपये जुटाए और प्लॉट खरीदने पहुँचा तो साला बोला उसके तो साठ हजार रुपये लग चुके हैं तो मैं पैंतालीस हजार में कैसे बेच सकता हूँ। दीपेन्द्र ने कहा ठीक है उसने साढ़ू से पैसे माँगे तो वो आना-कानी करने लगा तब दीपेन्द्र ने सोने के जेवर गिरवी रख साठ हजार रुपये जुटाए और फिर साले के पास पहुँचा तो साला बोला वो प्लॉट तो हमने बेच दिया। यह सुनकर दीपेन्द्र को बहुत दुख हुआ उसे अपने साले से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इधर मकान का किराया बहुत ज्यादा था। तभी बैंक का विज्ञापन निकला जिसमें बैंक द्वारा लोन अदा न कर पाने अधिगृहित मकानों के नीलामी की जानकारी थी। दीपेन्द्र वे मकान भी देख आया। डूप्लेक्स की कीमत साढ़े तीन लाख रुपये थी और वे मकान हाइवे से दो सौ फीट अंदर थे। उसके बीच साठ फीट की रोड थी। दीपेन्द्र ने अपने साढ़ू से दो लाख रुपये एक महीने के लिए उधार माँगे। डेढ लाख रुपये उसके पास थे साढ़ू ने कह भी दिया कि एक डुप्लेक्स मुझे भी खरीदना है और में आ रहा हूँ। पन्द्रह साल पहले ऑनलाइन बैंकिंग नहीं थी। लेनदेन चैक से अथवा नगद होता था। जिस दिन नीलामी थी उस दिन उसे अपने साढ़ू का बेसब्री से इंतजार था। उसका साढू आया तो वो उसे प्रापर्टी दिखाने ले गया। प्रापर्टी साढ़ू को भी पसंद आई। जब वे बैंक में गए तो बैंक मैनेजर ने कहा हाँ अभी कुछ डुप्लेक्स बचे हैं पैसे लाए हो या चैक लाए हो तो जमा कर दो। दीपेन्द्र ने साढ़ू की तरफ देखा तो वो बोला कि रुपये तो मैं लाया नहीं। यह सुनकर दीपेन्द्र बहुत दुखी हुआ। थोड़ी देर में सारे डुप्लेक्स बिक गए थे। एक सरदार जी ने उन्हें खरीद लिया था। उसके पास बहुत से कॉलेज थे। सरदार जी उनमें होस्टल बनाना चाहते थे। साढ़ू बोला मुझे रेल्वे स्टेशन छोड़ आओ। दीपेन्द्र बुझे मन से उसे रेल्वे स्टेशन छोड़ कर आ गया। साले के बाद साढ़ू ने उसके साथ विश्वासघात किया था। जिसके कारण वो खुद का मकान नहीं ले पाया था। इसके बाद पूरे पन्द्रह साल दीपेन्द्र ने किराये के मकान में रहकर बिताए थे। रिटायरमेन्ट के बाद अब वो पचपन लाख रुपये में डुप्लेक्स खरीद पाया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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