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कहानी: रेस्टोरेन्ट

तृप्ति रेस्टोरेन्ट के मालिक सुनील आज एक सफल व्यवसायी थे। उनका रेस्टोरेन्ट खूब चलता था। जिससे उनकी खूब कमाई हो रही थी। तीन साल पहले सुनील की पत्नी मात्र दो छात्रों के लिए खाना बनाकर खिलाने से इसकी शुरूआत की थी और आज वो तृप्ति रेस्टोरेन्ट के नाम से विख्यात हो गया था।
सुनील तीन साल पहले तक सोयाबीन प्लान्ट में सुपरवाइजर थे। वेतन अच्छा था लेकिन तीन साल पहले प्लान्ट बंद हो जाने के कारण उसकी नौकरी छूट गई थी। उनके पास घर का मकान था। जिस जगह उनका मकान था उसके आसपास पचास स्कूल कॉलेज और इंस्टीट्यूट थे। सुनील ने आठ साल पहले जब यहाँ यह प्लाट खरीदा था तब यहाँ चारों ओर जंगल ही जंगल था। यह जगह शहर से बारह किलोमीटर दूर थी। सुनील ने तब दो हजार वर्ग फीट का प्लाट मात्र चालीस हजार रुपये में खरीदा था। आज यहाँ तीस हजार रुपये वर्ग फीट जमीन का रेट चल रहा था। सुनील के प्लाॅट खरीदने के बाद इस क्षेत्र का विकास होना शुरू हो गया। यहाँ एक बड़ा इंजीनियरिंग कॉलेज खुला। फिर धीरे धीरे महानगर के बहुत से शिक्षण संस्थान यहाँ खुल गए। सरकार ने यहाँ सत्तर फीट चौड़ी सड़क बना दी। सुनील का घर रोड के सामने था। घर का फ्रन्ट चालीस फीट चौड़ा था जो सड़क की ओर था। देखते ही देखते उस जगह की कीमत बढ़ने लगी। खूब मकान बनने लगे, दुकानें खुलने लगीं। आसपास के कॉलेजों में चालीस हजार विद्यार्थी वहाँ पढ़ते थे। सड़क के दोनों ओर दुकाने ही दुकाने खुल गई थीं। यह देखकर सुनील की पत्नी तृप्ति ने घर में ही भोजनालय खोल लिया था। शुरू में उनके यहाँ मात्र दो ग्राहक ही थे। दो से चार हुए और दो महीने में ही उनके यहाँ दो सौ छात्र नियमित रूप से भोजन करने लगे थे। तब तृप्ति ने तृप्ति रेस्टोरेन्ट खोल लिया था। उसमें आठ सौ वर्ग फीट का एरिया था। सुनील की नौकरी छूट गई थी। उसने भी रेस्टोरेंट में बैठकर सहयोग करना शुरू कर दिया था और आज वो तृप्ति रेस्टोरेन्ट का भली भाँति संचालन कर रहे थे और उससे खूब धन भी कमा रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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