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कहानी: बिल्डर

सुदीप सिविल इंजीनियर था और महानगर के बड़े बिल्डर सुथीर जी के ऑफिस में अपनी नौकरी के सिलसिले में आया था। उनके यहाँ इंजीनियर का पद रिक्त था। यहाँ आने के बाद जब उसने सुधीर कन्सट्रक्शन के मालिक को देखा तो उसे बडी हैरत हुई क्योंकि वे उसके स्कूल के सहपाठी थे तथा बारहवीं पास करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। सुदीप ने उस वक्त सुधीर जी को खूब अपमानित किया था। बारहवीं पास करके कौनसी नौकरी मिलेगी तुम गरीब के गरीब ही रहोगे। सुदीप ने बारहवीं पास करने के बाद बी ई में एडमीशन ले लिया था। वो सुधीर को बड़ी हिकारत से देखता था। उससे बात करना तक उचित नहीं समझता था। आज उसी सुधीर से उसकी पूरे पच्चीस साल बाद भेंट हुई थी। सुधीर से मिलने के बाद उसे ऐसा लगा कि सुधीर उसे नौकरी पर नहीं रखेगा। वो उठकर जाने लगा तो सुधीर जी ने उसे रोक लिया तथा  अच्छे वेतन पर उसे नौकरी पर रख लिया। सुधीर की गिनती शहर के सबसे प्रभावी व्यक्ति के रूप में होती थी। उनकी ऊँची पहुँच थी तथा सभी उनका सम्मान करते थे जबकि सुदीप उनके मुकाबले जीरो था।
नौकरी पाकर सुदीप बहुत ख़ुश था। क्योंकि वो पिछले छः माह से खाली घर बैठा हुआ था। फाकाकशी की नौबत आ गई थी। ऐसे में सुधीर की इस नौकरी ने उसे और उसके परिवार को भूखे मरने से बचा लिया था। सुधीर और सुदीप दोनों हम उम्र थे। दोनों की उम्र तिरतालीस साल थी। एक तरफ सुधीर शहर के सबसे महँगे मकान में रह रहा था। दूसरी सुदीप के पास अब भी किराये का मकान था। पच्चीस साल पहले जब सुधीर ने हायर सेकेण्डरी पास की थी तब उसके पिताजी हरीश का एक बहुमंजिला बिल्डिंग से गिरने के कारण निधन हो गया था। सुधीर के सिर पूरे परिवार का बोझ आ गया था इसलिए उन्हें पढ़ाई छोड़ना पड़ी थी। सुधीर भवन निर्माण श्रमिक बन गया था। मजदूरी से अपने परिवार का पालन कर रहा था। उसका दिमाग तेज था वो जल्दी ही मिस्त्री का काम सीख गया था जिससे उसे अधिक मजदूरी मिलने लगी थी। इसके अलावा वे ठेके पर भी काम करने लगे थे। उसी दौरान उन्होंने एक हजार वर्गफीट का भूखण्ड खरीदा था। उस पर उन्होंने दो मकान बनवाए थे। वो दोनों उन्होंने सेल कर दिए इससे उन्हें दोगुना लाभ हुआ उस पैसे से उन्होंने दस हजार वर्ग फीट की जमीन खरीदी तथा बैंक लोन लेकर उस पर पैंसठ फ्लेट बनवाए वे सब बिक गए। उन पैसों से सुधीर जी ने दस एकड़ जमीन खरीदी उस पर उन्होंने पूरी कॉलोनी बनवाई। वे एक बार साइट देखने महानगर से बीस किलोमीटर दूर बालीपुर आए तो उसकी लोकेशन उन्हें अच्छी लगी। वहाँ जमीन बहुत सस्ती थी। उन्होंने वहाँ आसपास की पाँच हजार एकड़ जमीन खरीद ली। महाननगर के तीन तरफ तीस किलोमीटर दूर तक कोई जगह नहीं बची थी। इस तरफ ही जगह बची थी। वे समझ गए थे कि कुछ सालों में यहाँ जमीन के भाव आसमान पर पहुँच जाएँगे। उन्होंने वहाँ कॉलेज बनवाए आवासीय काॅलोनी भी बनवाई। उसी रोड पर पुलिस लाईन बन गई थी। बस का डिपो भी बन गया था। मेट्रो लाईन भी बालीपुर तक डाली जा रही थी। सुधीर का अनुमान सही निकला। दो साल में बालीपुर में जमीन के भाव आसमान पर पहुँच गए। सुधीर को उस पाँच एकड़ जमीन ने धनकुबेर बना दिया था। महानगर के करीबी शहरों में सुधीर जी कॉलोनियाँ डेवलप कर रहे थे। उनकी कंपनी अच्छी चल रही थी। पच्चीस साल में वे फर्श से अर्स तक पहुँच गए थे। दूसरी ओर सुधीर जिस त्रिमूर्ती कंसट्रक्शन में काम करता था उसके पास कोई जमीन नहीं थी न उन्होंने कोई नया प्रोजेक्ट शुरू किया था। उन्होंने सभी को नौकरी से निकाल दिया था जिससे सुदीप भी बेरोजगार हो गया था। तथा नौकरी की तलाश में यहाँ आया था जहाँ उसे नौकरी तो मिली ही मान सम्मान भी खूब मिला।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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