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कहानी: मनोरोग

आठ साल पहले जिस नवनीत की मानसिक स्थिति गंभीर हो गई थी तथा उसके पिता उसे प्रेत बाधा मानकर तांत्रिकों के पास ले जाकर उसकी हालत खराब कर रहे थे वहीनवनीत बड़े भाई जीतेन्द्र के द्वारा उसका समय पर उपचार कराने के कारण आज आई आई एम से एम बी ए करने के बाद एक कंपनी में मैनेजर बनकर डेढ़ लाख रुपये महीने का वेतन ले रहा था।
नवनीत के बड़े भाई जीतेन्द्र इन्दौर में कृषि शिभाग में उप संचालक के पद पर कार्यरत थे। आठ वर्ष पहले उनके छोटा भाई नवनीत ने हायर सेकेण्डरी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी पर नंबर कम आने के कारण वो दुखी था उसके बड़े ऊँचे सपने थे जिनके टूटने का उसे डर सता रहा था इस डर ने उसे डिप्रेशन में ला दिया था वो कुछ दिनों से बहकी बहकी बातें करने लगा था उसके पिताजी हरिप्रसाद जी जो किसान थे उनसे किसी ने कह दिया कि नवनीत पर प्रेत बाधा है किसी तांत्रिक के पास ले जाना पड़ेगा हरिप्रसाद उसे तांत्रिक के पास ले गए तांत्रिक ने उसे जंजीर से बाँधकर पीटा हरिप्रसाद यही समझे की वो भूत को पीट रहा है इससे नवनीत की मनोदशा और उधिक खराब हो गई वो तांत्रिक पर हमला करने के लिए आगे बड़ा तो उसने उसे जंजीर से बाँधे रखा उसने हरिप्रसाद से कहा इसे जंजीर से ही बाँधे रखना नहीं तो ये किसी की भी जान ले सकता है उसने भभूति की पुड़िया देकर कहा था पाँच दिन बाद इसे फिर,लेकर आना तीन बार में यह बिल्कुल,ठीक हो जाएगा इसकी प्रेतबाधा मैं दूर,कर दूँगा उसने साठ हजार रुपये इसके लिए माँगे थे जिसका इंतजाम वे कर रहे थे दूसरे दिन जीतेन्द्र,घर,आया तो उसने देखा कि उसका भाई नवनीत दिखाई नहीं दे रहा है उसने पिताजी से कहा तो पिताजी बोले वो कमरे में बंद है उसके,ऊपर खतरनाक प्रेत बाधा है । यह सुनकर जितेन्द्र चिंता में पड़ गए उन्होंने तुरंत भाई से मिलने की इच्छा प्रकट की जब हरिप्साद जी ने दरवाजा खोला तो नवनीत की दशा देखकर जीतेन्द्र का कलेजा काँप गया नवनीत ,को जंजीर से बाँधकर रखा गया था उसे ठीक से खाना भी नहीं दिया गया था उसकी आँखों में बेबसी थी भाई को वो उम्मीद भरी नजर से देख रहा था जीतेन्द्र ने अपने पिताजी से कहा इस पर कोई प्रेतबाधा नहीं है आपने इसे जबरन बाँध रखा है अगर इसके साथ यही बर्ताव किया तो ये कुछ दिन में मर जाएगा जीतेन्द्र ने उसे मुक्त करने के लिए जंजीर की चाबी माँगी हरिप्रसाद जी चाबी देने में आनाकानी करने लगे तो जीतेन्द्र ने सख्त लहजे में उनसे चाबी माँगी हरिप्रसाद जीतेन्द्र को चाबी देकर कमरे के बाहर चले गए जीतेन्द्र ने प्यार से अपने भाई के सिर पर हाथ फेरा तथा कहा कि तुम पूरी तरह ठीक हो जाओगे मैं तुम्हें इन्दौर ले जाकर तुम्हारा इलाज कराऊँगा। जब जीतेन्द्र ने उसे मुक्त किया तो वो बहुत देर,तक जीतेन्द्र के काँधे पर सिर रखकर रोता रहा जितेन्द्र ने उसे हिम्मत बँधाई दोनों भाईयों ने एक साथ खाना खाया यह देखकर माँ की आँखों में खुशी के आँसू आ गए दूसरे दिन जीतेन्द्र नवनीत को अपने साथ इन्दौर ले गया वहाँ उन्होंने नवनीत को मनोचिकित्सक को दिखाया मनोचिकित्सक ने कहा चिंता की कोई बात नहीं है मैं दवाएँ दे रहा हूँ तीन दिन में इनकी हालत में सुधार,आने लगेगा दवाओं के,असर से नवनीत ठीक दिखाई दे रहा था छः महीने के इलाज में नवनीय पूरी तरह ठीक हो गया था जीतेन्द्र ने उसकी पढ़ाई का जिम्मा उठा लिया था जीतेन्द्र के प्रयासों के कारण नवनीत आइ आई एम से एम बी ए कर पाया था एम बी ए करने के दौरान ही उसे अठारह लाख रुपये वार्षिक नौकरी का पैकेज मिल गया था एम बी ए करने के बाद उसने नौकरी ज्वाइन कर ली थी उसकी शादी मनीषा से हुई थी जो सरकारी विभाग में लेखाधिकारी थे वे खुशी के साथ जीवन यापन कर रहे थे।



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प्रदीप कश्यप

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