डॉक्टर आर के गुप्ता नगर के सबसे लोकप्रिय डॉक्टर थे पच्चीस साल पहले जब वे जिला अस्पताल में पदस्थ होकर आए थे तब वे एक एम बी बी एस डॉक्टर थे फिर उन्होंने सर्जरी में मास्टर ढिग्री हासिल की और आज उनकी सर्जरी के इतने चर्चे थे कि दूर दूर से मरीज उनके पास आते थे और स्वस्थ होकर जाते थे वे जिला अस्पताल में सिविल सर्जन के पद पर कार्यरत थे जिला मेडिकल ऑफिसर होने के बाद भी उनका व्यवहार सबके प्रति सहज सरल था उन्होंने ऐसे कई मरीजों को ठीक किया था जो इलाज कराकर हार गए थे फिर भी उनकी बीमारी ठीक नहीं हुई थी ताज्जुब की बात तो यह थी आज प्रदेश के मुख्यमंत्री खुद उनके पास इलाज के लिए आए थे गुप्ता जी ने उनसे वही सहज सरल व्यवहार किया था। मुख्यमंत्री जी ने कहा था आपकी बहुत प्रशंसा सुन रखी थी आज वैसा ही आपको पाया आज के इस धन केन्द्रत युग में आपके जैसे सेवाभावी बहुत ही कम मिलते हैं।
डॉक्टर गुप्ता जी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था उनके पिता अमीर चंद गुप्ता की किराने की दुकान थी जब वे दस साल के थे तब उनकी माँ शाँति देवी का सही इलाज नहीं होने के कारण दुखद शिधन हो गया था डॉक्टर उनका ऑपरेशन ठीक से नहीं कर पाए थे और उन्होंने ऑपरेशन की टेबिल पर ही दम तोड दिया था इसका उनके मन पर बहुत गहरा असर पढ़ा था पिताजी ने उनके इलाज में पानी कीतरह पैसा बहाया था फिर बी वे माँ को बचा नही सके थे जबकि वे गले गले तक कर्ज में डूब गए थे गुप्ता जी उस समय पाँचवी कक्षा में पढ़ रहे थे उन्हें इतना तो अहसास हो गया था कि माँ का इलाज ठीक से नहीं हुआ है। माँ के पेट में कभी तेज दर्द उठता था पिताजी कई डॉक्टरों को दिखा चुके थे जब दर्द असहनीय हो गया तब उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया जब स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई तब डॉक्टरों की समझ में आया कि इनका तो ऑपरेशन किया जाना था आखिर,न के बराबर उनके बचने की उम्मीद होते हुए भी उनका ऑपरेशन किया गया और वे बच नहीं सकी लेकिन पिताजी से ऑपरेशन का पूरा खर्च वसूल लिया गया ।तब से उन्होंने तय,कर,लिया था कि वे बड़े होकर डॉक्टर बनेंगे तथा सर्जन की डिग्री प्राप्त कर सर्जरी करेंगे। और उन्होंने प्रथम प्रयास में ही प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी बाइस साल की उम्र में वे एम बी बी एस कर,चुके थे प्रदेश में वे उस साल सबसे कम उम्र में डॉक्टर बने थे और उनकी प्रथम पदस्थापना इसी नगर में हुई थी । वे यहाँ कुछ समय में ही लोकप्रिय हो गए थे एम एस करने के बाद तो वे कमाल के सर्जन बन गए थे उनके हाथ से कभी कोई ऑपरेशन नहीं बिगड़ा था उन्हें एक निजी सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल ने पन्द्रह लाख रुपये प्रतिमाह के वेतन का ऑफर दिया था वो भी उन्होंने ठुकरा दिया था एक बार उनके पास,विदेश से एक धनवान इलाज कराने आया था वो ठीक होने के बाद उन्हें पचास लाख रुपये का चेक दे गया था जो उन्होंने रोगी कल्याण समिति के खाते में जमा करा दिया था । उनके पास जो दौलतमंद इलाज कराने आते और,ठीक होने के बाद उन्हें पैसा देना चाहते तो वे उनसे रोगी कल्याण समिति में पैसा जमा करा दिया करते थे। उनकी लोकप्रियता का यह भी एक कारण था उनका सभी सम्मान करते थे उनका कोई शत्रु नहीं था उनसे जूनियर तो उनसे मशवरा करते ही थे सीनियर भी उनसे सलाह लेने में संकोच नहीं करते थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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