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कहानी: शिक्षा मंत्री का साला

प्रदेश के शिक्षा मंत्री रामनरेश जी का साला जो मंत्री जी के नाम का दुरूपयोग कर कई प्रकार की अनियमितताएँ कर रहा था तथा अधिकारियों पर रौब जमाकर भ्रष्टाचार से धन कमा रहा था उससे मंत्री की छवि खराब हो रही थी। इस पर मंत्री जी अधिकारियों को उसके खिलाफ कार्यवाही के सख्त निर्देश दिए थे जिसके कारण आज उसे सस्पेण्ड कर दिया गया था। इसके साथ ही पुलिस की कार्यवाही में उसके मकान से सत्तर करोड़ रुपये जप्त किए गए थे। अब वो हवालात में बंद था।
छः महीने पूर्व जब विधानसभा चुनाव के बाद रामनरेश जी की पार्टी सत्ता में आई तब उन्हें राज्य का शिक्षा मंत्री बनाया गया था। उनके शिक्षा मंत्री बनते ही उनके साले  दीपक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दीपक एक सरकारी स्कूल में शिक्षक था। उनके मंत्री बनने के बाद दीपक का समय मंत्री जी के बंग्ले पर गुजरने लगा। वो दो महीने तक स्कूल नहीं गया फिर भी किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसके खिलाफ कोई कार्यवाही कर सके। उसको पूरा वेतन मिल रहा था। इन दो महीनों में उसने मंत्री जी के नाम से बहुत रुपया कमाया था। मंत्री जी की छवि एक ईमानदार नेता की थी पर उनका साला उनकी छवि खराब कर रहा था। इसकी शिकायत जब मंत्री जी तक पहुँची तो उन्होंने फौरन उसे बंग्ले से हटा दिया और उससे कहा कि वो अपने स्कूल में जाकर अपना काम ईमानदारी से करे। पर दीपक मंत्री जी के बंग्ले से हटाए जाने के बाद भी यहाँ आकर वो जिले के अधिकारियों पर रौब जमाने लगा था। उसके जीजा जी शिक्षा मंत्री रामनरेश जी बेदाग छवि वाले नेता थे। राजनीति में आने के पहले वे एक सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। उस पद पर भी वे ईमानदारी से काम करते थे। उनके स्कूल में एक मेडम थी मनोरमा वो अपना प्रभाव का दवाब बनाकर रामनरेश जी को परेशान करती थी तथा कहा करती थी की उसके बड़े अधिकारियों से अच्छे संबंध हैं। एक बार वो पूरे तीन महीने स्कूल नहीं आई। रामनरेश जी ने उपस्थिति पत्रक में पूरे तीन महीने तक उसकी अनुपस्थिति दर्ज कर संकुल केन्द्र पर भेजी फिर भी उसे पूरे तीन माह की तनख्वाह मिलती रही। एक दिन वो स्कूल में आकर रामनरेश जी से कहने लगी की वे शिक्षक उपस्थिति रजिस्टर बदल दें तथा उस पर उसके पूरे तीन महीने के दस्तखत करा लें। रामनरेश जी ने ऐसा करने से इंकार कर दिया तो उसने संकुल प्राचार्य से फोन लगवा दिया। प्राचार्य कह रहे थे मेडम जैसा कह रही है वैसा कर दो पर रामनरेश जी ने साफ इंकार कर दिया। इस पर मनोरमा झल्लाती हुई वहा से यह धमकी देते हुए निकल गई कि इसके आपको गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। रामनरेश बोले मैं धमकियों से डरकर गलत काम नहीं करूँगा। मनोरमा ने पुलिस में रामनरेश जी के खिलाफ छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाकर एफ आई आर दर्ज करा दी जिस पर पुलिस उन्हें फौरन गिरफ्तार कर के ले गई तथा उन्हें हवालात में बंद कर दिया। यह खबर गाँव के सरपंच मोहनलाल जी को मिली तो उन्हें लगा कि रामनरेश जी के साथ घोर अन्याय हुआ है। वे पुलिस थाने पहुँचे तथा उन्हें छोड़ने का आग्रह करने लगे। इस पर पुलिस बोली उनके खिलाफ एफ आई आर दर्ज हुई है। उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा वहाँ अगर उनकी जमानत हो खई तो छूट जाएँगे अन्यथा उन्हें जाँच के बाद सीधा जेल भेज दिया जाएगा। नगर के एक दैनिक अखबार का संवाददाता रितेश रामनरेश जी का स्टूडेन्ट रहा था। वह उन्हें अपना आदर्श मानता था। रामनरेश जी को विभाग ने निलंबित कर दिया था। जिस दिन उन्हें कोर्ट में पेश किया जाना था उसी दिन रितेश ने अपने अखबार में उनके पक्ष में खबर छापी जिसमें उनके बेगुनाही सिद्ध करने वाले सारे तथ्य थे। जिसे जज साहब ने भी पढ़ा था। इसका ये लाभ हुआ कि उन्हें कोर्ट से जमानत मिल गई। पुलिस को मनोरमा ने जो सबूत जुटाकर दिए वो झूठे थे। जिस दिन उसने छेड़छाड़ का आरोप लगाया था उस दिन उसकी शाला अभिलेख में अनुपस्थिति दर्ज थी। पूरे छः महीने तक केस चला जिसका परिणाम ये हुआ कि रामनरेश जी निर्दोष साबित होते चले गए तथा संकुल प्राचार्य, उनका एकाउण्टेन्ट, जन शिक्षक पूरी तरह फँस गए। रामनरेश जी तो बरी हो गए पर मनोरमा, संकुल प्राचार्य, एकाउण्टेन्ट को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इसकी अखबारों में खूब चर्चा हुई। रामनरेश जी को सब लोग जानने लगे। उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। रामनरेश जी का बुरे वक्त में न उनके साले ने साथ दिया था न उनके ससुर ने जो सत्ताधारी पार्टी का नेता था। इस्तीफा देने के बाद उन्हें विरोधी दल ने विधायक का टिकट दे दिया। चुनाव में विरोधी दल को बहुमत मिला रामनरेश जी भी भारी बहूमत से जीत गए और उन्हें प्रदेश का शिक्षा मंत्री बना दिया गया था। जिसका भरपूर लाभ दीपक ने उठाया था। जिसकी सजा वो हवालात में जाकर भुगत रहा था। दीपक के पिता तथा रामनरेश जी के ससुर में इतना साहस नहीं था कि वे रामनरेश जी से इस संबंध में बात कर सकें।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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