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कहानी: मंदी

पिछले दो महीने से जगदीश टेलर का धंधा बहुत मंदा चल रहा था। वो जेन्टस टेलर था रेडीमेड कपड़ों के चलन ने उस पर गहरा असर डाला था। पूरे एक हफ्ते में मात्र दो जोड़ी पेन्ट शर्ट उसके पास सिलने आए थे जिनसे उसे एक हजार रुपये मिलने वाले थे जिसमें से आज उसे पाँच सौ रुपये मिल गए थे। इससे उसके मन को बहुत संतोष मिला था जगदीश दुर्बल इंसान था। उससे और कोई काम बनता नहीं था। पचपन साल की उम्र हो गई थी इसलिए टेलर का काम कर रहा था।
शादी विवाह के सीजन में उसका काम कुछ अच्छा चला था। जिसमें उसने दो महीने का दुकान का बकाया किराया छः हज़ार रुपया अदा कर दिया था। अब फिर दो महीने का किराया फिर बाकी था। आय इतनी थी नहीं इसी बात की उसे चिंता थी। जगदीश पाँच साल पहले शहर के बड़े टेलर सोहन की दुकान पर काम करता था। लेकिन जब उसके यहाँ काम करने वाले अधिक और काम कम हो गया तो उसने कुछ कामगारों की छँटनी कर दी। उनमें जगदीश भी शामिल था। जगदीश ने अपनी खुद की टेलर की दुकान खोल ली थी। कुछ समय तक तो उसका काम ठीक चलता रहा। तब वो अपशी पत्नी और बच्चों को भी गाँव से शहर में ले आया था। बच्चों के एडमीशन उसने प्राइवेट स्कूल में करा दिए थे। लेकिन साल भर बाद जब धंधा मंदा पड़ गया तो वो अपनी पत्नी तथा बच्चों को वापस गाँव ले आया था। गाँव में आते ही उसकी पत्नी को गेहूँ कटाई का काम मिल गया था। जगदीश भी दुकान का मोह छोडकर गेहूँ काटने लगा था। कटाई के सात सौ रुपये रोज मिल रहे थे। पत्नी को भी इतने ही रुपये रोज के मिल रहे थे। एक महीने में उन्होंने इतने रुपये कमा लिए थे जिनसे उन्होंने साल भर का गेहूँ तथा अन्य आवश्यक मसाले दाल तथा चावल खरीद लिए थे।  जब गाँव में काम मिलना बंद हो गया तब उसने शहर की और रुख किया था पर शहर में भी काम की कमी थी।उन्होंने आखिर में उन्होंने शहर में काम करने का मन बना लिया था तबसे वो शहर में ही रह रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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