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कहानी: प्रापर्टी

अनिमेष ने आखिरी मकान भी आज बेच दिया था अब एक छोटा सा मकान बचा था जिसमें वो रहने के लिए आ गया था उसकी उम्र पैंतालीस वर्ष की थी दस साल पहले जब उसके पिताजी रामविलास जी का निधन हुआ था तब उनके शहर में एक दर्जन मकान थे चार दुकाने थी वे प्रापर्टी डीलिंग का काम करते थे तथा मकान निर्माण का ठेका भी लेते थे उससे भी उनकी अच्छी आमदानी होती थी । अनिमेष की अपने पिताजी से बिल्कुल नहीं बनती थी वो अपने पिताजी का सबसे बड़ा आलोचक था वो हमेशा पिताजी के विपरीत चलता था।
अनिमेष को ऐसा बनाने में उसकी माँ निशा का भी हाथ था । वो अपने बेटे को रामविलास जी के खिलाफ भडकाती थी वो कहती ये आदमी हद दर्जे का कंजूस है इससे मैं परेशान रहती हूँ क्या फायदा इतना रुपया कमाने से जबकि ठीक से रह भी न सको अनिमेष से कहती बेटा तू अपने पिता के जैसा मत बनना खूब दिल खोलकर के खर्च करना अनिमेष माँ के कहे अनुसार चलता था पिताजी कुछ कहते तो उनकी ह॔सी उड़ाता था राम विलास जी जब काम पर जाते तो पीने का पानी एवं लंच घर से ले जाते थे जबकि अनिमेष को बाहर जब भी प्यास लगती वो मिनरल वाटर की बॅटल खरीद लेता था भूख लगती तो मँहगी होटल मे खाना खा लेता था दोस्तों में भी खूब पैसा उडाता था उसे उसकी माँ निशा खूब पैसा देती थी तथा उससे कभी हिसाब नहीं पूछती थी जबकि रामविलास जी अपने ऊपर किए गए खर्च का पूरा हिसाब रखते थे रामविलास जी कभी निशा से कहते कि यह पच्चीस साल का हो गया आज तक इसने एक रुपया भी नहीं कमाया ऐसे कैसे चलेगा खर्च अनाप शनाप करता है । इस पर निशा कहती उसे कमाने की ज़रूरत ही क्या है उसके पिता के पास बहुत पैसा है। रामविलास जी बात को आगे न बढ़ाकर चुप हो जाते थे।
अनिमेष की शादी उन्होंने यह सोचकर कर दी कि जब इसे जिम्मेदारी का अहसास होगा तब अपने आप काम करने लगेगा सरिता ने अनिमेष से शादी उसकी दौलत देखकर की थी वो भी निशा के ग्रुप में शामिल होकर खूब पैसे उड़ाने लगी थी अनिमेष के जो बच्चे हुए उनका सारा खर्च भी रामविलास जी ही उठा रहे थे पचपन साल की उम्र में रामविलास जी का हार्ट अटेक से निधन हो गया उनके निधन पर किसी ने ज्यादा दुख नहीं मनाया बेटा बहू और उनकी पत्नी मन ही मन खुश हो रहे थे कि अब वे जी खोलकर खर्च करेंगे अब उन्हें किसी का भी डर नहीं है। रामविलास जी इतनी संपत्ति छोड़कर गए थे कि अगर उनके परिजन ठीक से खर्च करते तो कई पीढ़ियों तक खर्च नहीं होती मगर हद पार की फिजूल खर्ची ने वो सारी दौलत दस साल में ही खत्म कर दी थी । जब सब दौलत खत्म हो गई तो सरिता अपने दोनों बच्चों को लेकर मायके चली गई उसने जो हेराफेरी से रुपया जमा किया था उसके सहारे से रहने लगी थी। निशा को अनिमेष वृद्धाश्रम छोड़ आया था आज उसकी आखिरी प्राप्रटी बिकी थी इस खुशी में वो बहुत मँहगी शराब लाया था ।जिसका वो सेवन कर रहा था उसे इस बात की भी चिन्ता नहीं थी कि अगर ये रुपये पूरे खर्च हो जाएँगे तो उसका होगा क्या उसकी उम्र पैंतालीस वर्ष की हो गई थी इस उम्र में वो कैसे काम करेगा जिसने कभी आज तक एक रुपया भी न कमाया हो फिर भी उसे अपने भविष्य की जरा भी चिंता नहीं थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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