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कहानी: चरित्र अभिनेता

चरित्र अभिनेता दिनेश मोहन ने पचपन साल की उम्र में पहली बार फीचर फिल्म में अभिनय किया था। फिल्म के रीलिज होने के बाद फिल्म जहाँ सुपर हिट साबित हुई वहीं दिनेश मोहन का अभिनय भी कमाल का रहा। इसके बाद तो उनके पास दो दर्जन फिल्में आ गई जिनमें उन्हें चरित्र अभिनेता का रोल मिल गया था। आज उन्हें फिल्म फेयर पुरुस्कार मिला था और वे बहुत ख़ुश थे। दिनेश मोहन जी पाँच साल पहले तक राज मिस्त्री का काम करते थे। भैपाल में जिस घर में वे काम कर रहे थे वो नाट्य निर्देशक विनोद कुमार जी का घर था। उनके घर रंगकर्मियों का आना जाना लगा रहता था। कभी कभी नाटक की रिहर्सल भी होती थी। विनोद कुमार जी पिछले कुछ दिनों से परेशान थे। अगले महीने उनके नाटक का राजधानी के नाट्य गृह में मंचन होना था और नाटक का मुख्य किरदार निभाने वाला कोई उन्हें नहीं मिल रहा था। रोज वे कितनों का ऑडिशन लेते पर निराशा हाथ लगती। एक दिन लंच में जब विनोद कुमार जी कुछ सोचते हुए बाहर टहल रहे थे तब दिनेश जी ने उनसे बात करने की हिम्मत की। विनोद कुमार जी यही समझे की यह निर्माण कार्य के संबंध में बात कर रहा होगा लेकिन जब दिनेश ने साफ उर्दू जबान में विनोद कुमार जी से बात करते हुए कहा कि आपके नाटक के मुख्य किरदार के लिए आप मेरा ऑडिशन ले सकेंगे क्या? यह सुनकर विनोद कुमार जी ने दिनेश को गौर से देखा फिजिकल रूप से तो वो ठीक लगे पर अभिनय करना भी तो आना चाहिए। उन्होंने दिनेश से कहा कि तुम एक राज मिस्त्री हो तुम्हें अभिनय से क्या लेना देना। दिनेश बोले ऐसी बात नहीं है साहब अभिनय से मेरा ताल्लुक बचपन से ही है। बयालीस साल पहले मैंने आठ वर्ष की उम्र में पहली बार नाटक में अभिनय किया था। बारह साल तक मैंने नाटक में हर तरह के किरदार किए। जब में आठ साल का था तब हमारे गाँव में एक नाटक मंडली आई थी। वे जहाँ ठहरे हुए थे वो मेरे घर के बगला का मकान था। रात में मैं जो नाटक देखता उसका अभिनय दिन में बखूबी करता था। कई गाँव वाले मुझसे अभिनय कराते थे और खुश होते। एक बार जब में अभिनय कर रहा था तो मंडली के संचालक मुझे गौर से देख रहे थे। वे मेरे पास आए और बोले बेटा नाटक में काम करोगे। मेरा तो यह सपना था मैंने फौरन हाँ कर दी थी। पिताजी से इजाजत लेने के बाद वे मुझे अपने साथ ले आए। दिनभर मुझसे रिहर्सल कराई और रात को मुझे बच्चे के कारदार में मंच पर उतार दिया। मेरे पहले अभिनय ने दर्शकों के दिल को जीत लिया। ये वो दौर था जब टी वी मोबाल का इतना चलन नहीं था। कंप्यूटर से आम आदमी परिचित नहीं था। उस समय नाटक मंडलियों का बड़ा महत्व था। वो नाटक मंडली चालीस दिनों तक हमारे गाँव में रही जिसमें रोज ही मुझे काम करने का मौका मिला। मेरा हर तरफ नाम हो गया। जब वो मंडली हमारे गाँव से गई तब मुझे भी अपने साथ ले गई। उस मंडली में मैं पूरे बारह साल रहा। बाद में नाटकों का दौर रहा नहीं। मंडली के संचालक का भी निधन हो गया था। दिनेश मोहन भी मंडली के टूटने के बाद घर आ गए थे लेकिन वंदना के रूप में अपनी पत्नी को साथ लेकर। वंदना मंडली के संचालक की बेटी थी। हमने साथ साथ नाटकों में अभिनय किया था। हमारा आपसे मैं खूब लगाव था। वंदना के पिताजी ने चलते चलते मेरी शादी वंदना से करा दी थी और फिर दुनिया छोड़कर चले गए थे। पिताजी माँ ने वंदना को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था। हमारे पास जमीन जायदाद तो थी नहीं इसलिए मजदूरी कर गुजर बसर करना शुरू कर दिया था। फिर मिस्त्री का काम करने लगे थे। तब से दिनेश यही काम कर रहे थे। विनोद जी दिनेश जी के अभिनय से खुश हुए थे और उन्हें इस नाटक का मुख्य रोल दे दिया था और वे विनोद कुमार जी की अपेक्षाओं कौ पूरा कर रहे थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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