सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: पेट्रोल का खर्च

नितिन के बड़े भाई रामेश्वर तीन महीने तक हार्ट की गंभीर बीमारी से जूझते रहे। उनका हार्ट की तीनों नलियों मे ब्लाकेज थे। उसमें उनकी सारी जमा पूँजी खर्च हो गई थी। उन्हें अपनी जाँच कराने जिस प्राइवेट अस्पताल में जाना था वो उनके घर से बारह किलोमीटर दूर था। रामेश्वर जी की ऐसी हालत नहीं थी कि वे स्कूटी चला के जा सकें इसलिए उनकी पत्नी रमा ने अपने देवर नितिन को फोन लगाकर कहा था कि वो अपनी कार लेकर आ जाए। तुम्हारे भैया को डॉक्टर को दिखाने ले जाना है। नितिन कार लेकर तो आ गया था लेकिन डॉक्टर को दिखाने के बाद उसने कार को पेट्रोल पंप लाकर खड़ी की तथा उसमें पाँच सौ रुपये का पेट्रोल तथा रमा भाभी से कहा कि वो पेट्रोल के पैसे का भुगतान करें। रमा भाभी ने सहजता से भुगतान कर दिया। बात आई गई हो गई पर यही बात जब उनके यहाँ काम करने वाली बाई राजुल ने जब कॉलोनो में और लोगों को बताई तब एक अलग ही सच सामने आया।
राजुल बता रही थी की जब रमा भाभी का फोन आया था तब नितिन की पत्नी निशा ने नितिन को कहा था कि वो साफ मना कर दे। वे कैब करके चले जाएँगे पेट्रोल तो जलेगा न पेट्रोल क्या मुफ्त में आता है। नितिन ने गिड़गिड़ाते हुए निशा से कहा था वो मेरे भैया हैं उनके मुझ पर बहुत अहसान हैं। आज मैं जो कुछ हूँ उनकी बदौलत हूँ। इस पर निशा उससे बोली मुझे इससे कोई मतलब नहीं है अपना रोना धोना अपने पास रखो अगर वो पाँच सौ रुपये का पेट्रोल भरवाएँ तो ले जाना नहीं तो साफ मना कर देना जाते ही पूछ लेने उनसे। नितिन ने जब हाँ कहा तब निशा ने उसे कार लेकर जाने दिया जबकि कुल डेढ़ सौ रुपये का पेट्रोल लगना था पर निशा ने पाँच सौ रुपये के पेट्रोल भरवाने की बात कही थी। नितिन में इतना साहस नहीं था कि वो निशा से यह बात कह सके। राजुल बोली की निशा रामेश्वर जी जैसे देवता स्वरूप इंसान से इतनी नफरत कर रही थी जबकि नितिन एक सरकारी कमाऊ विभाग में एकाउण्ट ऑफिसर था। हजारों रुपये रोज रिश्वत में कमाता था। रामेश्वर ने मजदूरी कर के नितिन की परीक्षा की फीस भरी थी और जब वे क्लर्क बन गए थे तब अपने वतन से नितिन की कोचिंग का खर्च उठाया था। आज उसी नितिन ने उनसे पेट्रोल के नाम से चार गुना पैसे वसूल कर लिए थे जबकि रामेश्वर जी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। फिर भी नितिन और निशा को तरस नहीं आया था। राजुल बता रही थी अभी पाँच दिन पहले निशा की छोटी बहन मीनल और बहनोई मनीष आए थे तो निशा ने और नितिन ने उनकी खूब आवभगत की थी। उनको इधर उधर घुमाने में हजारों रुपये का पेट्रोल जला डाला था। आठ हजार रुपये का होटल में डिनर कराया था। दो हजार रुपये तो एक बार की आइसक्रीम में खर्च कर दिए थे। मीनल को विदा करते समय उसको और बहनोई को पच्चीस हजार रुपये के कपड़े दिलवाए थे तथा दस हजार रुपये बहनोई के हाथ में शगुन के तौर पर रखे थे। उसके खर्च का निशा को कोई दुख नहीं था। हमेशा नितिन से कहती रहती थी कि उनके सामने अपना ओछापन मत दिखाना जिससे मुझे मायके में नीचा देखना पड़े और नितिन ने मुस्कुराते हुए इतना सारा रुपया उन पर खर्च किया था। राजुल की बात सुनकर कॉलोनी की सुजाता बोली तब तो रमा भाभी को बहुत दुख हुआ होगा। राजुल बोली रमा भाभी इतनी सीधी सरल हैं कि उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया कि पाँच सौ रुपये का पेट्रोल क्यों भरवाया। वो इसी बात से बहुत खुश थीं कि नितिन उनको अपनी कार से अस्पताल लेकर तो गया तथा फिर घर पर छोड़ा भी।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...