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कहानी: विपदा

हरीश चार माह पूर्व तीन दिन के लिए अपने गाँव नींबू खेड़ा गया था साथ में पत्नी और बच्चों को भी ले गया था उसके गाँव में उसके भतीजे की शादी थी वो गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था चार महीने बाद जब गाँव से वापस शहर आया तो सब कुछ बदला हुआ था वो जिस धर्मशाला में रात में चौकीदारी की नौकरी करता वहाँ कोई और ये काम कर रहा था शहर में जहाँ उसकी चाय की छोटी सी गुमठी थी वहाँ किसी ओर की दुकान लगी थी उसकी गुमठी गायब थी। उसने अपनी गुमठी की तलाश की तो गुमठी नाले किनारे मिल तो गई पर वो पूरी तरह कबाड़े में बदल चुकी थी यह विपदा उसके लिए बीमारी से भी भारी पड़ गई थी।
आज दोपहर को जब वो घर आया तो बहुत उदास था पत्नी को जब उसने सारी बात बताई तो वो भी दुखी हो गई फिर बोली मकान मालिक तीन चक्कर लगा चुका है । पाँच महीने का बकाया किराया माँग रहा है। सुनकर हरीश सोच में पड़ गया उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो पाँच महीने का किराया दे सके उसकी पत्नी निर्मला बोलो अब क्या करेंगे । गाँव जाएँ तो वहाँ कोई रोजगार धंधा नहीं है और शहर में भी रोजी रोटी छिन गई है ।इस पर हरीश ने कहा एक जगह हम्माली का काम मिला है बोरे ट्रक पर बोरे चढ़ाने उतारने का काम है मजदूरी भी अच्छी मिल रही है यह सुनकर निर्मला घबरा गई। बोली अभी बीमारी से उठे हो शरीर में इतनी ताकत है नहीं कि एक क्विंटल की बोरी उठा सके । हरीश भी इस बात को समझ रहा था । पर और कोई चारा भी तो नहीं था। पर निर्मला कुछ और ही सोच रही थी वो चाँदी की करधनी लेकर आई जो चार सौ ग्राम वजनी थी बोली इसको बेच आओ और जो पैसे मिलें उससे कोई काम धंधा शुरू कर देना हरीश को निर्मला की यह बात ठीक लगी उसकी वो करधनी छब्बीस हजार रूपये में बिकी थी जबकि उस जैसी करधनी को वो दुकानदार छत्तीस हजार रुपये में बेच रहा था।पर हरीश मजबूर था । हरीश ने उन पैसों से ठेला खरीदने तथा उस पर मनिहारी का सामान रखकर बेचने का विचार किया । उसे पूरी उम्मीद थी कि उसका धंधा अच्छा चलेगा वो देर रात को जब घर आया तो ठेला साथ लेकर?तथा उसमें सामान भर कर लाया था। आज हरीश को अपने शुरू के दिन याद आ रहे थे। हरीश ने पन्द्रह वर्ष पहले आठवीं पास की थी तथा आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर में आ गया था । पिताजी ने मना किया था पर वो अपनी जिद से आया था । और अपने हम उम्र?दोस्त उमेश के कमरे पर कुछ दिन रुका फिर धर्मशाला में चौकीदार का काम मिलने के कारण धर्मशाला में आकर रहने लगा था पढ़ाई तो उसकी नवमीं में लगातार दो साल फेल होने के कारण छूट गई थी अठारह साल का होने पर हरीश ने गुमठी पर चाय की दुकान खोल ली थी निर्मला से उसकी बात धर्मशाला में हुई थी वो वहाँ खाना बनाने के लिए आती थी यही से दोनों में प्यार हुआ और यह प्यार शादी में बदल गया था इस शादी से हरीश के पिताजी नाराज हो गए थे तभी से हरीश गाँव नहीं गया था जब पिताजी का निधन हुआ तब उनकी तेरहवीं में एक बार गया था । माँ को निर्मला से कोई ऐतराज नहीं था । हरीश माँ को अपने साथ ले आया था दो वर्ष पूर्व उनका भी निधन हो गया था। इसके बाद अभी पाँच महीने। हरीश बच्चों सहित गाँव गया था । जहाँ उसे पहले तो मलेरिया हु आ फिर पीलिया हो गया था । ठीक होने के बाद चार माह बाद वो आज इस शहर में रहने के लिए आया था। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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