आज बिशनपुर ग्राम की माध्यमिक शाला के शिक्षक रामकिशन शर्मा जी का रिटायरमेन्ट का दिन था वे स्कूल के सबसे अच्छे शिक्षक थे शाला के सभी छात्र छात्रा इस अवसर पर लुखी थे क्योंकि उनके बीच से एक अच्छे और आदर्श शिक्षक सेवानिवृत होकर जा रहे थे विद्यालयद्य में आज उनका विदाई समारोह था जिसमें सभी छात्र छात्राओं ने उन्हें भाव भीनी विदाई दी थी विद्यालय के वर्तमान में पदस्थ शिक्षक तथा पूर्व शिक्षक एवं छात्र भी शामिल हुए थे दुख की बात यह थी कि ग्राम का सरपंच सुथीर तथा पंच एवं सचिव बार बार फोन कॉल करने पर भी आयोजन में शामिल नहीं हुए थे जबकि एक माह पहले बिशनपुर के लोकल शिक्षक रामदास की सेवानिवृत्ति के अवसर पर सरपंच पंच सचिव सब शामिल हुए थे तथा उनका सम्मान भी किया था। सरपंच के द्वारा जो यह भेदभाव किया गया था उससे वे बहुत दुखी थे।
रामकिशन सेवानिवृति के कार्यक्रम के बाद घर आए घर पर भी उनसे बहुत लोग मिलने और उनका सम्मान करने आए थे। आज रामकिशन सर सोच रहे थे गतमाह जब रामदास जी का रिदायरमेन्ट हुआ था तब उन्होंने उनके समारोह के सफल आयोजन में अपनी अच्छी भूमिका निभाई थी पर आज वे भी घर में मौजूद रहते हुए भी उनके विदाई समारोह में शामिल नहीं हुए थे रामदास कोई अच्छे शिक्षक नहीं थे बच्चों के प्रति भी उनका व्यवहार ठीक नहीं था साढे दस बजे का स्कूल था पर वे कभी बारह बजे से पहले नहीं आते थे कई बार तो ऐसा होता कि वे स्कूल में आते तो पर अपनी मोटर सायकिल से उतरते तक नहीं थे न मोटर सायकिल बंद करते बस किसी से उपस्थिति रजिस्टर मँगवाते उस पर दस्तखत करके चले जाते थे फिर उस दिन वे स्कूल नहीं आते थे। फिर भी उन्हें कोई कुछ कहने वाला नहीं थे क्योंकि बिशनपुर के निवासी थे उनके परिवार के पन्द्रह वोट थे सरपंच के चहेते थे इसलिए उनसे कोई कुछ कहने वाला नहीं था वे कभी आएँ और कभी भी जाएँ जबकि रामकिशन सर रोज दस बजे स्कूल आ जाते थे फिर विद्यालय की सफाई कराते थे पेड़ पौधों को पानी देते फिर प्रार्थना कराते बाकी सभी शिक्षक देर से आते थे जब तक रामकिशन सर प्रार्थना और पीटी कराकर कक्षा में बिठा देते थे सबसे बाद में शिक्षक रामदास जी आते थे रामकिशन जी के जिम्मे मध्यान्ह भोजन तैयार कराने की जवाबदारी थी वे वो काम भी ईमानदारी से करते थे। इसके बाद भी उनको गाँव वालों से अपनापन नहीं मिलता था। इसका यह भी एक कारण था कि वे बाहर से आते थे इस गाँव में उनका परिवार नहीं रहता था न ही उनका वोटर लिस्ट में नाम था। रामदास जी को तो सरपंच ने पगड़ी तक अपने हाथों से बाँधी थी रामकिशन जी को इसी बात का संतोष था कि उन्होंने चालीस साल की नौकरी बेदाग होकर की थी और वे सेवानिवृति पर पूरी तरह से स्वस्थ थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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