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सितंबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: पुनर्मिलन

शीला ने रवि से तलाक के दस वर्ष बाद आज फिर उसी से शादी कर ली थी। इस बीच उसने रोहित से शादी की थी पर उसका दुखद निधन होने के बाद वो तीन साल से होस्टल में रह रही थी। शादी के बाद वो बहुत खुश दिखाई दे रही थी। जब वो रवि के साथ घर आई तो रवि के दोनों बच्चे अंकुर और अंकिता ने अपनी नई माँ के रूप में उसका स्वागत किया था।  शीला ने रवि से तलाक के पाँच वर्ष बाद रोहित से शादी की थी लेकिन रोहित से उसका साथ अधिक दिन नहीं रहा। शादी के दो साल बाद रोहित की ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हो गई थी। फिर तीन साल तक वो महिला होस्टल में रही। शहर के एक शॉपिंग मॉल में केशियर का काम करती रही। उसके कोई संतान नहीं हुई थी। वहीं उसकी पहले पति रवि से मुलाकात हुई तो पता चला कि उससे तलाक के बाद रवि ने निशा से शादी की थी। निशा से उसके दो बच्चे अंकुर और अंकिता हुए और वो एक दिन उसे और उसके दोनों बच्चों को छोड़कर चली गई। उसने रवि के दोस्त दिनेश से शादी कर ली थी। इससे रवि टूट गया था, उसे अपने दोस्त और पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। उसका भरोसा टूट गया था। अब उसके कंधे पर दोनों बच्चों की जिम्मेदारी थी। फिर खुद की भी नौकरी थी। किसी और ...

कहानी: गया में पिण्डदान

पिछले साल किशनलाल ने अपने स्वर्गीय माता पिता का गया में जाकर पिण्डदान श्राद्ध तर्पण कर तिलांजलि दी थी इस हेतु  उसने अपने गाँव दौलतपुर के साहूकार लालजीराम सै साठ हजार रुपये ब्याज पर कर्ज के रूप में लिए थे लालजीराम ने उस पर अहसान जताते हुए तब कहा था कि तुम गया जी जा रहे हो इसलिए पाँच फीसदी प्रतिमाह ब्याज पर कर्ज दे रहा हूँ । नहीं तो दस फीसदी से कम में मैं किसी को भी कर्ज नहीं देता कर्ज देते समय हिदायत भी दी थी जिस महीने ब्याज नहीं दिया अगले महीने उस ब्याज की राशि पर भी ब्याज देना होगा किशनलाल ने लालजी राम की शर्तें मान ली थीं आज वो साहूकार का पूरा हिसाब चुकता कर के आया था आज उसे बहुत सुकून मिला था। साल भर पहले की बात  है ।जब किशनलाल के गाँव से बीस लोगों का ग्रुप गया  जी  जा रहा था। उसे किसी जोशी ने बताया था कि तुम्हारे घर के पूर्वज तुमसे नाराज हैं तुम पुरखों के दिनों में गया जी में जाकर उनका पिण्डदान करके आओ तब कहीं तुम्हारी परेशानियाँ दूर होंगी । यह बात किशनलाल को भी जँची पर उसके पास इतने रुपये भी नहीं थे कि वो गया जी सके उसने अपने छोटे भाई गंगादीन से बात की तो  ...

कहानी: अफसरी का उतरा भूत

राजेन्द्र कुमार एडिशनल कलेक्टर के पद से तीन साल पहले रिटायर हुए थे लेकिन उनका अफसरी का भूत पूरी तरह से अब जाकर उतरा था। रिटायरमेन्ट बाद कुछ समय तक तो वे गहरे सदमें में रहे थे। अपनी बिगड़ी हुई बोली को सुधारने में काफी समय लगा था। परिवार में एडजस्ट होने में भी उन्हें बहुत परेशानी आई थी।रिटायरमेन्ट के बाद नौकर-चाकर, सरकारी बँगला-गाड़ी सब कुछ छिन गया था। अफसरी का रुतबा पूरी तरह खत्म हो गया था। सबसे अधिक हैरत उन्हें तब हुई थी जब उनसे उस बाबू ने रिश्वत ले ली जिसकी नौकरी उनकी बदौलत लगी थी। उसने अहसान मानना तो दूर ठीक से व्यवहार तक नहीं किया था। उस दिन वे आहत होकर घर आए थे। अब वे आम आदमी की तरह रहने के आदि हो गए थे। राजेन्द्र कुमार जी ने चौंतीस साल तक नौकरी की थी। उनकी पोस्टिंग नायब तहसीलदार के पद पर हुई थी पर प्रमोशन के जरिए वे एडिशनल कलेक्टर के पद तक पहुँचकर रिटायर हुए थे। वे एक अत्यंत साधारण गरीब परिवार से आए थे। वे खुद विद्यार्थी जीवन में अखबार बेचकर अपना खर्च निचालते थे। बी ए पास करने के बाद उन्होंने राज्य सेवा परीक्षा दी थी। तैयारी तो उन्होंने ऐसी की थी की उन्हें ...

कहानी: विमला अम्मा

आज विमला अम्मा जनकपुर बस्ती की सबसे अधिक सम्मानित महिला हैं मगर पाँच साल पहले बस्ती वाले उन्हें संदेह भरी नज़रों से देखते थे। माँएँ अपने छोटे बच्चों को उनके सामने नहीं लाती थीं। कोई कहता उनकी नजर बहुत खराब है, कोई कहता सुबह सुबह उनका मुँह नहीं देखना चाहिए वरना पूरा दिन खराब गुजरेगा। जबकि आज स्थिति बिल्कुल उलट थी, अब तो बस्ती में किसी के यहाँ का कोई शुभ काम उनके बिना नहीं होता था। पाँच वर्ष पूर्व जब विमला अम्मा इस बस्ती में मोगरा गाँव से रहने आईं थीं तब उन्हें रहने के लिए कमरा भी किराए से बड़ी मुश्किल से मिला था। विमला पति के देहान्त के बाद यहाँ आई थीं। जनकपुर में चल रहे घरेलु उद्योग में वे सुबह दस बजे काम करने जातीं और शाम को पाँच बजे घर आ जाती थीं। बस्ती का कोई बालक अकेले उनके सामने से निकलने से डरता था। यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चला। एक दिन विमला जी के बगल में रहने वाली श्रीमती मीना वर्मा को अचानक पेट में तीव्र दर्द हुआ तो विमला अम्मा वहाँ पहुँच गईं। उन्होंने उस महिला के सिर पर हाथ फेरा, पेट थोड़ा दबाया तथा पानी में कोई देशी दवा घोलकर पिला...

कहानी: कबाड़े के भाव

पूर्व विधायक स्वर्गीय राधेलाल के दोनों बेटे हरिमोहन और जगमोहन में आज खूब तू-तू-मैं-मैं हुई थी। लोग तो यह समझ रहे थे कि हाथापाई की नौबत आने वाली है पर बात कहा-सुनी पर ही समाप्त हो गई। हुआ ये था कि जगमोहन ने पिताजी के दो बड़े बक्सों में रखी ट्राफियाँ, सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह आदि मात्र दस हज़ार रुपये में कबाड़ी को बेच दी थी। हरिमोहन ने पूछा कि दो बक्सों में पिताजी को दिए गए शाॅल रखे थे वो कहाँ हैं। इस पर जगमोहन ने कहा की वो तो मैं पचास रुपये नग से दुकानदार को बेच आया। पैसे कहाँ हैं- वो तो खर्च हो गए, जगमोहन बोला। इस पर हरिमोहन आग बबूला हो गया। हरिमोहन ने बोला- तूने दो लाख की शाॅल कौड़ियों के भाव बेच दी। कम से कम डेढ़ लाख के समृति चिन्ह और पीतल की मूर्तियाँ, उसमें एक चाँदी की तलवार भी थी वो सब भी मात्र दस हजार में बेच दी। इस पर जगमोहन ने कहा जब घर में खाने को अन्न का एक दाना तक न हो और जेब पूरी खाली हो तो सौ-पचास रुपये भी हजारों रुपयों के बराबर लगते हैं। हरिमोहन भी गरीबी में दिन काट रहा था। जगमोहन के पास वो भी कबाड़ को वही सामान बेचने आया था जो जगमोहन पहले से ही बेच चु...

कहानी: बुढ़ापे में कविता

शहर के चर्चित कवि राज वर्मा जी की उम्र सत्तर साल हो गई थी लेकिन कविता लिखते हुए अभी उन्हें दस साल हो गए थे इन दस सालों में उन्होंने बहुत कुछ हासिल कर लिया था ।बहुत कुछ हासिल कर नहीं पाए थे। उन्हें इसी बात का दुख था कि अगर उन्होंने तीस वर्ष पहले कविता लिखना शुरू किया होता तो आज हालात कुछ और होते।पर अब भी उनके पास बहुत कुछ था ।  दस वर्ष पहले जब वे रिटायर हुए थे। तो कुछ दिनों तक तो उन्हें बिल्कुल भो अच्छी नहीं लगा, । एक दिन शाम को जब अपने कुछ रिटायर्ड दोस्तों के साथ वे टहलने गए तब बातों के दौरान पता चला कि उनके साथ जो अभय तिवारी चल रहे हैं वे कवि भी हैं तथा कल वे टहलने नहीं जा सकेंगे कल वे कवि गोष्ठी में शामिल होगे।तब राज वर्मा ने कहा कि क्या मैं भी आपके साथ आयोजन में शामिल हो सकता हूँ। तो तिवारी जी बोले शौक से चलिए। राज वर्मा पूरे साढ़े चार घंटे कवि गोष्ठी में रुके सभी कवियों की कवितादए सुनी बड़े प्रभावित हुए। घर आकर उन्हें भी कविताएँ लिखने की प्रेरणा मिली । फिर क्य था वे भी कलम उठाकर लिखने बैठ गए अगली मासिक कवि गोष्टी के लिए उनके पास चार कविता हो गई थ...

कहानी: समय किसी का सगा नहीं

आज जिसका समय अच्छा चल रहा है कल उसका समय बुरे में बदल जाए ये कोई नहीं जानता। कभी नगर निगम के उपायुक्त आर के वर्मा जी ने बड़े बाबू रहे अशोक गुप्ता को बुरी तरह से लताड़ कर भगाया था उनकी एक नहीं सुनी थी। आज उन्हीं के कारण वो जेल की हवा खा रहे थे और गुप्ता जी का रुतबा बढ़ गया था। बात उस समय की है जब अशोक गुप्ता जी निगम के जोन कार्यालय में बड़े बाबू के पद पर पदस्थ थे। उनका रिटायरमेन्ट का समय नजदीक था। उनके पेंशन सहित अन्य सभी प्रकरण का निपटारा करने की जिसकी जवाबदारी थी वो बाबू उन्हें परेशान कर रहा था। रिश्वत के पैसे भी बहुत ज्यादा माँग रहा था। इसी सिलसिले में वो उपायुक्त आर के वर्मा साहब से मिलने उनके चैंबर में गए थे। आर के वर्मा उन्हें देखते ही भड़क गए बोले तुम तो साउथ जोन कार्यालय के बड़े बाबू हो न, वे बोले जी जनाब। कैसे मिलने आए - जब वो अपनी बात कहने लगे तो उपायुक्त ने टोकते हुए उनसे कहा - अपने जोन अधिकारी से मुझसे मिलने की परमीशन लेकर आए हो। गुप्ता जी बोले नहीं सर मैं आज की छुट्टी लेकर आया हूँ परमीशन उन्होंने दी नहीं। तो फि...

कहानी: स्पष्टीकरण

ऊजड़खेड़ा माध्यमिक शाला के शाला प्रभारी रमानाथ जी को डी पी सी सोहन राय से बहस करना बहुत मँहगा पड़ गया था। उनकी रिटायरमेन्ट के तीन महीने बचे थे। और डी पी सी ने तय कर लिया था कि मैं इनका रिटायरमेन्ट खराब कर दूँगा और उसने वो सब चालें चलना भी शुरू कर दी थीं। वो तो सौभाग्य से नव निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्ष श्री निवास उनका पढ़ाया हुआ शिष्य निकले और उन्होंने डी पी सी सोहन राय को इसका अच्छे से अहसास करा दिया कि अगर उसने रमानाथ जी को परेशान किया तो वो भी इस पद पर बना नहीं रह सकेगा और उसके भ्रष्टाचार की दबी फाईल खुलवा दी जाएगी। तब कहीं सोहन राय के तेवर नर्म पड़े थे नहीं तो पन्द्रह दिनों में वो उनसे तीन बार कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीटरण ले चुका था। जिससे रमानाथ जी मानसिक तनाव में रहने लगे थे। डी पी सी विवाद की शुरूआत तब से हुई थी जब रमानाथ सेमलखेड़ा की माथ्यमिक शाला में पदस्थ थे। तब वहाँ के बेईमान और भ्रष्ट शाला प्रभारी रितेश ने स्कूल निधि के पूरे एक लाख रुपये गोल कर दिए थे। ये पैसे वेन्डर जन शिक्षक संकुल प्राचार्य बी आर सी सी, डीपी सी तथा खुद उसने मि...

कहानी: रिटायरमेन्ट के बाद पागलखाने में बड़े साहब

कृष्ण मुरारी चौबे एक सरकारी विभाग के बड़े अधिकारी के पद से दस साल पहले सेवानिवृत्त हुए थे और उन्हें आज पागलखाने में रहते हुए नौ वर्ष हो गए थे। रिटायर होने के बाद एक साल में ही उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया था। और उन्हें पागलखाने में भर्ती करना पड़ा था। तबसे अब तक वे पागलखाने में ही भर्ती थे। कृष्ण मुरारी जब पद पर थे तब उनकी अच्छे अफ़सरों में गिनती नहीं होती थी। उनके अधीनस्थ उनसे हमेशा परेशान रहते थे। ऑफिस के चपरासी भी उनसे परेशान थे। वे सभी को बुरी तरह डाँटते थे और अपमानित भी करते थे। जरा सी गलती भी उन्हें बर्दाश्त नहीं होती थी। वे ऐसे लोगों में से थे जो ये समझते थे कि उनके बिना काम चल ही नहीं सकता, वो नहीं होंगे तो ऑफिस का भट्टा ही बैठ जाएगा। उनके अधीनस्थों में ऐसा कोई नहीं था जिसके खिलाफ उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की हो। किसी की वेतनवृद्धि रोक ली, तो किसी की तनख्वाह रोक ली और किसी को सस्पेण्ड कर दिया। वे किसी से अपनापन का भाव नहीं रखते थे। उनकी एक आदत और बहुत बुरी थी। दिन भर भले कुछ काम न करते हों पर ऑफिस बंद होने कुछ देर पहले बहुत सारा काम लेकर बैठ जाते थे। ...

कहानी: दोना पत्तल

हरि काका को जब से दोना पत्तल बनाने का काम मिला था तबसे उनके दिन बदल गए हैं आज भी वे दो हजार दोना और एक हज़ार पत्तल तैयार कर देशी होटल को देकर आए थे जिसके उन्हें अच्छे दाम मिल गए थे। हरि काका की उम्र सत्तर साल की थी और उनकी पत्नी सुगन काकी की उम्र अड़सठ वर्ष की थी दोना पत्तल बनाने का काम मिल जाने से उनका गुजारा आराम स हो रहा था।        बात दो वर्ष पूर्व की है तब उनकी माली हालत बहुत खराब थी दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो जाता था शुगन घास बेचती थी हरि काका गिने चुने घरों में दाढ़ी कटिंग बनाने जाते थे उनसे उनके हम उम्र ही कटिंग बनवाते थे इससे उन्हें दिन भर में पचास रुपये से ज्यादा नहीं मिलते पचास से साठ रुपये का घास सुगन बेच लेती थी इतने पैसों में जो रूखा सूखा मिलता उसी को खाकर दोनों अपना समय काट रहे थे तभी एक दिन उनके घर अनूप सक्सेना आए जिन्होंने हाइवे से लगा देशी होटल खोला था होटल में चूल्हे पर मिट्टी पी के बर्तनों में खाना बनता था और दोना पत्तल में परोसा जाता था मशीन से बने कागज के दोने पत्तल में वो भोजन खिलाने से बच रहे थे पर कोई उन्हें ढ...

कहानी: नई मोटर सायकिल

तकीपुर ग्राम के स्कूल के शाला प्रभारी रामदीन के सारे गिले शिकवे दूर हो गए थे ।आज उन्हें नई मोटर सायकिल मिल गई थी इसके साथ ही पुरानी खटारा मोटर सायकिल से उनका पीछा छूट गया था और ये सब क्षेत्रीय विधायक नवीन चन्द्र की बदौलत हुआ था जिन्हें वे गलत मानकर चल रहे थे। रामदीन के साथ पिछले एक महीने से जो घटनाएँ घटीं उन्होंने विचलित कर दिया था । लेकिन आज वे बहुत ख़ुश थे उन घटनाओं का उन्हें कोई मलाल नहीं था हुआ ये था कि एक महीने पहले उनका तबादला चालीस किलोमीटर दूर के गाँव बरखेड़ा में कर दिया गया था जबकि यहाँ से उनकी कोई शिकायत नहीं थी वे सबके चहेते शिक्षक थे अच्छा पढ़ाते थे शाला का संचालन भी ठीक से कर रहे थे । उनकी बिटिया के विवाह की भी उन्हें चिंता थी बूढ़े माँ बाप थे तकीपुर से शहर दस किलोमीटर दूर था सड़क पक्की थी गाँव भी बड़ा था यहाँ स्वास्थ्य केन्द्र भी था वे तबादले पर जाना नहीं चाहते थे पर उनके पास ऐसा कोई जरिया नहीं था जिससे वे अपना तबादला रुकवा सकें। वे स्कूल में बैठकर यही सब सोच रहे थे कि स्कूल परिसर की सफाई करने वाला राजू आ गया। राजू को वे पन्द्रह सौ रुपये महीने अपनी जेब से परिसर क...

कहानी: अवसर चूके

राजेश आज अपने उस मित्र शिवप्रसाद से बहुत दिनों बाद मिला था जो बयालीस साल पहले उसका क्लासफेलो रहा था। आज वो सरकारी माध्यमिक स्कूल का शाला प्रभारी था और उसकी तनख्वाह एक लाख पन्द्रह हजार रुपये प्रतिमाह थी। जबकि उसकी पत्नी गिरिजा प्राथमिक शिक्षक थी जिसे साठ हज़ार रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा था। उसकी बेटी निकिता डॉक्टर थी और बेटा चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट। उनके सामने वो ख़ुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था। राजेश जबसे उससे मिल कर आया था तभी से गुमसुम था। आज जो वो जिंदगी जी रहा था उसका वो स्वयं जिम्मेदार था। उसके पास सेकेण्ड हॅण्ड स्कूटर थी जबकि शिवप्रसाद के पास बाईस लाख रुपये की चमचमाती हाईब्रिड कार। अब तो वो उसके पासंग बराबर भी नहीं था। राजेश को चवालीस साल पहले का वो समय याद आया जब वे एक साथ हायर सेकेण्डरी में पढ़ते थे। राजेश पढ़ने में शिवप्रसाद से तेज था। हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद जब उन्होंने कॉलेज में एडमीशन लिया तब उनके सपने आइ ए एस ऑफिस्सर बनने के थे। शिवप्रसाद के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। वो पढ़ाई के साथ ही मजदूरी भी करता था। जब दोनों सेकेण्ड ईयर में पढ़ते ...

कहानी: दूषित लड्डू

सरकारी स्कूल के शाला प्रभारी राधेश्याम आठ दिन तक बहुत हैरान परेशान रहने के बाद आज कुछ राहत महसूस कर रहे थे। क्योंकि आज उनकी नौकरी पर आया संकट टल गया था वहीं कलंक लगने से भी बच गया। जाँच में साबित हो गया था कि स्कूल के बच्चे मध्यान्ह भोजन खाने से नहीं बल्कि दूषित लड्डू के सेवन से बीमार हुए थे।  तब कहीं जाकर लोगों का आक्रोश शाँत हुआ था। और वास्तविक आरोपी के खिलाफ एफ आई आर दर्ज हुई थी। पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया था। घटना आठ दिन पहले की है। राधेश्याम जी लखनपुर के प्राइमरी स्कूल के शाला प्रभारी थे। दूसरे शिक्षक दिनेश कलेक्ट्रेट में अटेच थे। रोज की तरह इस बार भी विद्यालय में मध्यान्ह भोजन बना था। उस दिन अठारह बच्चों ने मध्यान्ह भोजन किया था। राधेश्याम जी ने वही भोजन खाया था। चार बजे की छुट्टी के बाद जब बच्चे घर की ओर जा रहे थे तब रामप्रसाद की होटल से थाली में भरकर एक वेटर राजू लड्डू लेकर आया। उसने सभी बच्चों को वे लड्डू बाँट दिए सभी बच्चों ने वे लड्डू खा भी लिए। उनमें से कक्षा पाँच की छात्रा रोशनी ने किसी तरह दो लड्डू ले लिए एक तो उसने वहीं ख...

कहानी: बाबा के टिक्कड़

बिरजा बाबा शोभापुर गाँव के पास एक कुटिया में रहते थे। ठीक दोपहर दो बजे वे एक टिक्कड़ और उसके साथ सब्जी या चटनी का प्रसाद पाते थे। चौबीस घंटे में वे इतना ही भोजन करते थे लेकिन उनके टिक्कड़ का एक टुकड़ा पाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। डेढ़ पाव आटे का टिक्कड़ बनाते थे और उसी को दो या चार लोगों में बाँटकर फिर बाकी का वे खाते थे। लेकिन आज की स्थिति में उन्होंने दो क्विंटल आटे के टिक्कड़ बनवाए थे और सब बँट गए थे। बिरजा बाबा ने आज भी सबको खिलाने के बाद आधा टिक्कड़ खाया था। और वो बड़े संतुष्ट दिखाई दे रहे थे। बिरजा बाबा विगत बीस वर्षों से यहाँ रह रहे थे। उनकी उम्र पिच्यासी वर्ष थी। मगर कोई उन्हें देखकर यही समझता था कि बाबा की उम्र पचास से ज्यादा नहीं होगी। बिरजा बाबा कभी बीमार नहीं पड़े थे। लोग समझते बाबा के टिक्कड़ में ही ऐसा कुछ है जिस से वे स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। कई तो इसलिए भी बाबा से प्रसाद के रूप में टिक्कड़ का एक टुकड़ा लेने आते थे कि इसके खाने से वे भी बाबा जैसे निरोगी स्वस्थ और प्रसन्न चित्त रहेंगे। रोज उनके आश्रम में पाँच सौ से ऊपर...

कहानी: रिश्वत का लोभ

विकास शुक्ला जब फूड इंस्पेक्टर थे तब रिट्यरमेन्ट के तीन महीने पहले रिश्वत लेते रँगे हाथों पकड़े गए जिसका पूरे आठ साल तक अदालत में केस चला था। इतने समय तक न तो उन्हें पेन्शन मिली थी और न ही अपना फन्ड और ग्रेच्यूटी ही। यह समय उन्होंने बहुत बुरा गुजारा था। आज उन्हें सारा बकाया पैसा मिल गया था तथा पेन्शन भी निर्धारित हो गई थी। आज वे बहुत खुश थे। उनकी पत्नी ममता भी खुश दिखाई दे रही थी। आज जब वह घर आए तो अपने बेटे नितिन और बहू नीता को देखकर चौंक गए। आठ साल तक जिसने उनकी कोई खोज ख़बर नहीं ली थी वो अचानक आज कैसे उन पर मेहरबान हो गया था। उनकी पत्नी नीता तो सारे गिले शिकवे भूलकर उनसे अच्छे से बात कर रही थी। और बेटे बहू भी खूब उनकी ख़ुशामद कर रहे थे। लेकिन विकास शुक्ल सारी बात समझ गए थे। थोड़ी देर बात करने के बाद नीता के इशारे पर नितिन मुद्दे पर आ गया। बोला पापा एक मौके का प्लॉट है उसे खरीदने के लिए पच्चीस लाख रुपये की जरूरत है। आपका तो कोई खर्च है नहीं आपको जो पैसा मिला है वो अगर हमें दे दो तो हमारा काम बन जाएगा। बेटे की बात सुनकर विकास जी को गुस्सा तो बहुत आया पर उन्होंने उसे काबू में करते हुए ...

कहानी: कहानीकार की मौत के बाद

कहानी: कहानीकार की मौत के बाद लखनलाल हिनोतिया कस्बे के मिस्त्री थे इसके साथ ही अच्छे कहानीकार भी। पूरे जिंदगी भर उन्हें कहानीकार के रूप में कभी पहचान नहीं मिली। कुछ छंदमुक्त कविताएँ जो उन्होंने लिखी थीं उनको लेकर कभी कभार कविगोष्ठियों में चले जाते थे। उनके निधन के तीन वर्ष बाद उनके बेटे शेखर तथा पत्नी सरिता को उनकी एक कहानी की जो रायल्टी मिली उससे उनकी जीवन भर की गरीबी दूर हो गई। उन्हें पूरे दस करोड़ रुपये मिले थे जिसे पाकर दोनों माँ बेटों की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ गए थे। असल में हुआ ये था कि लखनलाल जी की एक कहानी लोकल मेगजीन मुखर वाणी में दस वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी। जिसका पारिश्रमिक उन्हें कुछ नहीं मिला था। वे यही सोचकर ख़ुश थे कि कम से कम कहानी तो प्रकाशित हुई ये भी कम नहीं था। बाद में वो पत्रिका भी बंद हो गई थी। उस पत्रिका का वो अंक जो रद्दी में बेचा गया था वो किसी तरह फिल्म निर्माता निर्देशक नवरतन जी को मिल गया। उसमें उन्होंने लखनलाल जी की कहानी पढ़ी पढ़कर वे मंत्र मुग्ध हो गए। जैसी कहानी की वे खोज में थे वैसी ही ...

कहानी: चहेते मुख्य नगर पालिका अधिकारी

जागेश्वर पिछले दस वर्षों से सोहनपुर के प्रभारी मुख्य नगर पालिका अधिकारी थे। उनके कार्यकाल में वे तीसरे नगर पालिका अध्यक्ष के साथ काम कर रहे थे। पिछले दो अध्यक्षों के भी वे चहेते रहे और अब तीसरे न॰पा॰अध्यक्ष विवेक प्रधान के भी चहेते हो गए थे। उनके साथ कार्य करते हुए भी उनको साल भर होने जा रहा था। सोहनपुर राजधानी से बाइस किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बा था जिसकी आबादी तीस हजार थी। वे चहेते इसलिए थे कि  जिसके साथ वे काम करते उसके साथ पूरी निष्ठा से काम करते थे। दस वर्ष पहले जब मु॰न॰पा॰अ॰ मनीष वर्मा का तबादला हुआ था। तब न॰पा॰ के सबसे सीनियर कर्मचारी होने के कारण उन्हें प्रभार सौंपा गया था। इसके बाद तो यह पद उन्हें इतना रास आया कि वो दस वर्ष बाद भी ये दायित्व सम्हाल रहे थे। उनके कार्यकाल में पहले न॰पा॰अध्यक्ष देवकरण जी थे। वे चार साल तक उनके साथ रहे। इस बीच देवकरण जी पर खूब भ्रष्टाचार के आरोप लगे और वे सही भी थे। जागेश्वर भी कोई साफ सुथरे ईमानदार अधिकारी तो थे नहीं। हाँ वे रिश्वत खाना खिलाना और उसे पचाना अच्छी तरह जानते थे। चार साल तक देवकरण जी ने...

कहानी: अपनों का दिया दर्द

रवि बाबू को अपनी पुत्रवधू सरला के कारण ऐच्छिक रिटायरमेन्ट लेना पड़ा था। जबकि उनकी पूरी दस साल की नौकरी बाकी थी उन्हें सेवानिवृत हुए पूरे दस साल हो गए थे। उनके हम उम्र तथा एक साथ नौकरी पर लगे कमल बाबू पिछले महीने सेवानिवृत हुए थे। आज रवि बाबू उनसे ही मिलकर आ रहे थे। वे कह रहे थे उनकी पैंसठ हजार रूपये पेन्शन बनी है वे सेक्शन आफिसर के पद से रिटायर हुए थे आज रवि बाबू भी अगर नौकरी कर रहे होते तो वे बड़े बाबू के पद से रिटायर नहीं होते। वे भी सेक्शन ऑफिसर के पद से रिटायर हुए होते और उनको भी बाईस लाख रुपये ग्रेच्युटी के मिले होते। अभी रवि बाबू को अठ्ठाइस हजार रुपये पेन्शन मिल रही थी।  रिटायरमेन्ट के समय उन्हें बारह लाख रुपये मिले थे। जबकि कमल बाबू को सब मिलाकर पचास लाख रुपये मिले थे। वे घर आए तो कुछ दुखी थे। पुत्रवधू सरला ने पूछा बाबूजी आज इतने दुखी क्यों हो। तब उन्होंने सरला को अपने दुख के विषय में बताया जिसकी जिम्मेदार सरला थी। सरला भी सुनकर अफसोस करने लगी। जो गलती हो गई थी उसी का नतीजा भोगना पड़ रहा था। और कुछ किया भी नहीं जा सकता था। दस...

कहानी: ऐसी भी दबंगई

जगदीप राघवपुर गाँव का ऐसा दबंग था जिसके ऊपर आज तक एक भी पुलिस केस नहीं था उसके कारण राघवपुर में कोई अपराध नहीं होता था लोग घरों में ताला तक नहीं लगाते थे बहन बेटियाँ सुरक्षित थीं कोई सरकारी ठेकेदार गाँव में हुए निर्माण कार्यों में आज तक एक रुपये का भी भ्रष्टाचार नहीं कर सका था । जगदीप किसी से हफ्ता वसूल नहीं करता था बल्कि सबको ब्याज मुक्त कर्ज देता था और किसी की बेबसी देखकर कर्ज माफ भी कर देता था। आसपास के सभी गाँवों में उसका बड़ा सम्मान था ऐसा कोई नहीं था जो उसके अहसानों के बोझ से न दबा हो। जगदीप ने शादी नहीं की थी उसका कोई सगा रिश्तेदार नहीं था वो गाँव में अकेला ही रहता था साथ में कोई हथियार नहीं रखता था मगर किसी की भी मजाल नहीं थी जो उसके सामने कभी ऊँची आवाज में बात कर सके लोग उसका सम्मान ही इतना करते थे। यह सब दस वर्षों में हुआ था दस वर्ष पहले वह एक साधारण इंसान था। बात उस समय की है जब जगदीप पढ़ने के लिए शहर गया था तीन साल में उसने बी एस सी कर ली थी और नौकरी की तलाश कर रहा था उसकी इच्छा पुलिस अधिकारी बनने की थी उसी की वो तैयारी भी कर रहा था जगदीप उस वक्त तक साधारण युवक ही ...

कहानी: उल्टी पड़ी चाल

स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ बहुउद्देशीय कार्यकरता नीरज कुमार का निलंबन बड़ी मुश्किल से टला था। अगर उस से थोड़ी सी चूक हो गई होती तो उसे निलंबित होने से कोई नहीं रोक सकता था। कुछ उसकी किस्मत ने भी साथ दिया आज जो सी एम ओ डॉ सुमित उससे नर्म लहजे में बात कर रहे हैं कभी उसने उनकी खूब डाँट खाई है। वो जब उनकी चाल उल्टी पड़ गई खुद उनके निलंबित होने की नौबत आ गई तब। बात दो वर्ष पूर्व की है तब सी एम ओ डॉ सुमित कुमार शहर के जिला अस्पताल में नए नए आए थे। तब वो भी उनका स्वागत करने गया था। लेकिन इसके बाद घटनाएँ कुछ इस तरह घटीं की सी एम ओ साहब उससे खफा होते चले गए। यह तो स्वास्थ्य विभाग का छोटा से छोटा कर्मचारी अच्छी तरह जानता था कि कोई काम बिना लेनदेन के नहीं होता है। सी एम ओ मैदानी कर्मचारियों से सामान मँगाते रहते थे। किसी से पचास किलो शक्कर तो किसी से दो टिन तेल। सी एम ओ साहब के बेटे सौम्य का जन्मदिन था। सी एम ओ साहब ने नीरज से दस किलो मावा मँगवाया था जिसकी व्यवस्था नीरज ने कर दी थी। एक बार बीस लीटर दूध मँगवाया था वो भी उसने दे दिया था। तब तक सब कुछ स...

कहानी: सर्विस बुक का वेरीफिकेशन

शिक्षक राम कृष्ण जी का रिटार मेन्ट का समय नजदीक था छः महीने रिटार मेन्ट में बचे थे लेकिन संकुल केन्द्र के बाबू ने उनकी सर्विस बुक का ट्रेजरी से वेरीफिकेशन नहीं कराया था जिस के कारण  दो साल से उनके डी ए का एरियर नहीं मिला  था दो वर्ष के   वेतन का दुबारा फिक्सेशन होना था वो नहीं हुआ था वेतन में उन्हें आठ हज़ार रुपये प्रतिमाह का नुक्सान हो रहा  था वो तो जब वे एक बार  मंदिर गए तो वहाँ पर जिला ट्रेजरी ऑफिसर राकेश वर्मा मिल गए उन्होंने सर को पहचान लिया पैर छूकर बोले सर में आपका शिष्य हूँ आपने मुझे पढ़ाया है आपकी पढ़ाई गणित के कारण मैं आज ट्रेजरी ऑफिसर हूँ।  आपके रिटायर मेन्ट में कितना समय है वे बोले छः महीने बचे हैं । और अभी तक सर्विसबुक का वेरीफिकेशन नहीं हुआ है फिक्ससेशन नहीं हुआ  है सब मिलाकर पाँच लाख रुपये का एरियर बकाया है । इस पर  वर्मा जी ने संकुल केन्द्र का नाम पूछा और कहा दस दिन में आपका पूरा काम हो जाएगा। और वर्मा जी ने अपना वादा निभाया आज उन्हें पूरे सात लाख रुपये  ऐरियर के मिल गए थे तथा बढी हुई तन्ख्वाह आई थी  आठ हजार रुपये वेतन मे...

कहानी: झूठा इल्जाम

कुसुम अपने पति परेश की हत्या के झूठे इल्जाम में झूठी गवाही के कारण आजीवन कारावास की सेन्ट्रल जेल में सजा भुगत रही थी आठ साल पूरे हो गए थे और वो यह मान चुकी थी की अब उसे मरते दम तक जेल में ही रहना है ।पर अचानक इन छः महीने में झूठ की बुनियाद हिल गई जिसने झूठी गवाही दी थी उसने सच बता दिया और जो सबूत छिपाए थे वो भी बता दिए जिस से कुसुम को कारावास से मुक्ति मिल गई थी जो वास्तविक दोषी थे वे जेल की हवा खा रहे थे। वह जेल से सीधे मायके आ गई थी अदालत ने उसे दोषमुक्त कर दिया था उसकी सजा विलोपित कर दी गई थी याने उसे सजायाफ्ता नहीं माना गया था सजा के समय उसका बेटा ऋतिक तीन साल था जो अब ग्यारह साल का हो गया था कुसुम की उम्र भी बयालीस साल की हो गई थी।अब उसका एक मात्र लक्ष्य अपने बेटे ऋतिक को कामयाब बनाना था। बात आठ साल पहले की है उसके घर उसकी सौतैली ननद मानसीआई हुई थी मानसी शादीशुदा थी पर उसका पति राजीव लापरवाह इंसान था उसे जुए की लत भी थी। कुसुम के पति परेश का ऑटोमोबाइल का शोरूम था शोरूम कुसुम के नाम था परेश से मानसी ने बारह लाख रुपये का कर्ज लिया था और कहा था कि वो ब्याज सह...

कहानी: अपनापन

राधेश्याम जी ने पच्चीस साल पहले जिस विधवा नीरजा से शादी की थी वो जुड़वाँ बच्चों की माँ थी आज वे दोनों बच्चे नीलेश और गीतेश उसे अपने सगे पिता से भी अधिक बढ़कर मानते थे दोनों की शादी जुड़वाँ बहनो कविता एवं सविता के साथ हुई थी दोनों बेटे कपड़े के व्यापारी थे उनकी बड़ी दुकान थी ये दुकान राधेश्याम जी ने उनको सौंप दी थी दोनों बच्चों की शादी के बाद वे अब घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए थे दोनों बेटों ने सब कुछ अच्छे से सम्हाल लिया था जो अपनापन उन्होंने अपने बच्चों को दिया था वही अपनापन उन्हें अपनी वृद्धावस्था में मिल रहा था इस से वे बड़े खुश रहते थे उनके हम उम्र उन्हें खुशनसीब समझते थे। जब राधेश्याम जी ने नीरजा से शादी की तब उनकी उम्र पैंतालीस वर्ष की थी नीरजा चालीस वर्ष की थी उसके जुड़वाँ बेटे नीलेश गीतेश पाँच वर्ष के थे नीरजा एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी तब वे फेरी लगाकर कपड़ा बेचते थे नीरजा उनसे कपड़े खरीदती रहती थी कभी उधार भी कर लेती थी फिर किश्त में अदा भी करती रहती थी नीरजा के पति किशन टेक्सी ड्राइवर थे एक दिन वे टेक्सी लेकर रामेश्वर गए थे उनके साथ ए...

कहानी: किराये के मकान की दुकान

सुरेश ने एक साल पहले जो किराये के मकान में दुकान खोली थी वो अब खूब चल निकली तो मकान मालिक राजेश के मन में लोभ आ गया पहले तो उसने किराया बढ़ाया फिर उससे भी संतोष हुआ तो उसने सुरेश से वो मकान खाली करवा लिया और वो दुकान अपने बेटे को सौंप दी थी। सुरेश ने पास में ही दूसरा मकान किराये से ले लिया था परंतु उसमें दुकान खोलने की उसने गलती नहीं की थी बल्कि एक पुराना लोडिंग ऑटो खरीदकर उसी में फल सब्जी की दुकान की सेटिंग कर ली थी। उसकी यह दुकान भी उसे अच्छा मुनाफा दे रही थी। चलित दुकान खोले हुए सतीश को पूरे चार महीने हो गए थे। साल भर पहले की बात है जब सुरेश ने मकान में सब्जी की दुकान खोली थी। वह सब्जी का ठैला लगाता था लेकिन अचानक उसे हार्ट अटेक आ गया तो तीन छल्ले उसकी हृदय की नसों में डाले गए थे। सतीश बहुत कमजोर हो गया था डॉक्टरों ने उसे भारी काम करने को मना किया था। अब वो चार क्विंटल सब्जी ठेले में भरकर उसे धकाते हुए बेच नहीं सकता था। काम धंधा करे बिना काम कैसे चलता वैसे भी बीमारी में उसकी जमा पूँजी सब खर्च हो गई थी। तभी उसके मन में विचार आया कि क्यों न वो घर में ही सब्जी की दुकान खोल ले उसका घर क...

कहानी: पोते की करतूत

दादी सौरम देवी पूरे दस साल बाद अपने बड़े बेटे ओम प्रकाश के पास अपने पोते उमेश की करतूत के कारण  गई थी और वहाँ से अपमानित होकर लौटीं थीं उमेश उनके दो लाख रुपये रकम जेवरात तथा अन्य कीमती सामान  चुरा कर चंपत हो गया था उसी सिलसिले में वे वहाँ गईं थीं उनके पैसे तो वापस मिले नहीं अपमान  और सहना पड़ा उमेश ने तो उन पर हाथ तक उठा दिया उनके गाल में थप्पड़ मारे पर  उनके बेटे और बहू ने न उमेश को रोका न डाँटा वे  अपमानित होकर लौट आईं  यह पैसे उन्होंने पाई पाई कर जोड़े थे उनकी कई वर्षों की बचत पर उनके ही पोते ने हाथ साफ कर दिया था।  सौरम देवी के पति का निधन हुए  चालीस वर्ष हो गए थे तब उनका बड़ा बेटा ओम प्रकाश दस वर्ष का था छोटा बेटा  दिनेश सात वर्ष का और बेटी सुरेखा चार वर्ष की थी  उस समय उनकी उम्र तीस वर्ष की थी।  उन्हे सभी ने कहा कि  वे दूसरी शादी कर लें बच्चों को उनके मायके वाले रखने को तैयार थे पर उन्होंने दूसरी शादी नही  की  उनके पति श्री किशन रात में जैन धर्मशाला की चौकीदारी करते थे तथा दिन में किराने की दुकान पर काम करते थे ...

कहानी: भुट्टे बेचने वाला

डेम के पास मक्का के भुट्टे आग में सेंक कर बेचने वाला किशोर सिंह आजकल अच्छा लाभ कमा रहा था उसका ठेला मौके की जगह पर लगा था और यह सब हुआ था ए एस आई गिरवर सिंह के कारण वे जबसे चौकी प्रभारी बनकर आए थे तब से ही किशोरसिंह का धंधा चमक उठा था और तभी से वो खुश रहने लगा था। जबकि दो महीने पहले उससा दुखी संसार में उसे और कोई नज़र नहीं आता था । लेकिन ए एस आई गिरवर सिंह के आने से उसके दिन सुधर गए थे। ढाई महीने पूर्व वो बीमार पड़ा था जब ठीक हुआ था तो भुट्टे का ठेला लेकर वो डेम पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ कोई और ठेला लगाकर भुटटू सेंक कर बेच रहा है उसने जब उस से कहा कि ये मेरी जगह है तुम यहाँ से हट जाओ अपना ठेला कहीं और लगाओ को उस पर उसने हेडक॔स्टेबल राकेश धनगर को बुला लिया धनगर ने उस आदमी से पैसे लेकर ठेला लगाने की अनुमति दी थी। धनगर ने आते ही दो तीन लाठी के उस पर हल्के से प्रहार किए ठेले पर लाठी फटकारते हुए सख्त लहजे में कहा कि ये क्या तेरी बपौती है जो तू इस पर हक जता रहा है सरकारी जगह है जल्दी से हट जा यहाँ से अन्यथा तेरा पूरा ठेला सामान सहित जब्त कर लूँगा राकेश धनगर की फटकार से क...

कहानी: मरा हुआ साँप

एस डी एम विवेक वर्मा जी के कार के ड्राइवर मोहन लाल को मरे हुए साँप ने डँस लिया था जिसे समय पर अस्पताल तक पहुँचाकर विवेक जी ने उसकी जान बचा ली थी। उनकी तत्परता और समझदारी से जहाँ मोहनलाल की जान बची थी वहीं उनका पूरा परिवार उनका बार बार शुक्रिया अदा कर रहा था। मोहनलाल की बूढ़ी माँ उन्हें दिन रात दुआएँ दे रहीं थीं और मोहनलाल  तो होश आने के बाद एस डी एम को अधिकारी के साथ अपने सगे भाई से बढ़कर मानने लगा था। अगले माह मोहन की बिटिया की शादी होने वाली थी। मोहनलाल परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य था। घर की सारी जिम्मेदारी उसके कँधे पर थी। आज मोहनलाल को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। मोहनलाल के इलाज का सारा खर्च एस डी एम साहब ने उठाया था। घटना कुछ इस प्रकार घटी थी कि जब एस डी एम साहब सघन जंगल के मध्य स्थित ग्राम मगजपुर का दौरा करने गए थे तथा वहाँ से लौटते समय रात कुछ ज्यादा हो गई थी। कार में वे थे और मोहनलाल गाड़ी चला रहा था। गाड़ी जंगल के बीच से गुजर रही थी गाड़ी तेज स्पीड में थी तभी सड़क पर पड़े एक नुकीले पत्थर से टकराकर बंद हो गई। मोहनलाल गाड़ी ...

कहानी: अमर प्रीत

रोहित  और रजनी की शादी को  बीस वर्ष हो गए थे जबकि  रोहित साठ वर्ष के हो गए थे और रजनी अठ्ठावन  वर्ष की हालात अकर साथ देते तो  उनकी  शादी अड़तीस  वर्ष पूर्ण  हो चुके होते लेकिन   बेबसी के कारण  उनकी शादी में अठारह वर्ष का  विलंब हुआ उनके एक बेटी मोनिका तथा बेटा मनीष थे ।  दोनों की उम्र अठारह वर्ष थी दोनों जुड़वा थे और इस साल  कॉलेज के प्रथम वर्ष में थे। रोहित और रजनी के बीच चालीस वर्ष पूर्व प्रेम पनपा था दो साल तक उनके प्रेम का सिल सिला चलता रहा  दोनों के माता पिता उनकी शादी के लिए राजी भी थे  रोहित ने बी टेक किया था उसकी नौकरी भी अच्छी सैलरी वाली थी  रजनी  ने बी ए पास कर लिया था।  शादी की तिथि भी तय हो चुकी थी लेकिन एक दिन में रोहित की सुख भरी दुनिया उजड़ गई थी  रजनी को उस इलाके का नामी गुंडा  जगन जबरन शादी कर के ले गया था बिना बताए वो बारात लेकर रजनी के घर आया रजनी के माता पिता को बाँध दिया भाई के भी हाथ पैर बाँध दिए  पंडित वो  अपने साथ ही लाया था  उसने वहीं पर रजनी स...

कहानी: बेक़सूर

शासकीय प्राथमिक शाला बिसनखेड़ी ग्राम के दलित शिक्षक घीसीलाल जी पर झूठे आरोप लगाकर उनकी बेरहमी से पिटाई करने वाले गाँव के पन्द्रह दबंगों को कड़ी सज़ा मिली थी और वे सब जेल की हवा खा रहे थे इसका पूरे गाँव पर असर पड़ा था घीसीलाल जी की जान पर खतरा को ध्यान में रख उनका तबादला शहर के स्कूल में कर दिया गया था जहाँ उन से कोई भेदभाव नहीं किया जाता था वह अब बड़े खुश थे बिसन खेड़ी के डर और आतंक से उन्हें मुक्ति मिल गई थी। घीसीलाल जी पाँच साल पहले इस गाँव में प्राथमिक शिक्षक बनकर आए थे । वे एक ईमानदार और अच्छे शिक्षक थे बच्चों को पढ़ाते भी अच्छा थे लेकिन उनका दलित होना गाँव वालों को सहन नहीं हो पा रहा था गाँव उँची कही जाने वाली जाति के लोगों का था वे सब दबंग थे किसी दलित का शिक्षक होना वे सहन नहीं कर पा रहे थे साल भर तक को किसी को उनकी जाति के विषय में ज्यादा जानकारी नहीं थी वो तो उसी गाँव के रहने वाले एक शिक्षक ओम प्रकाश जो दबंगों की जाति से थे वो खुद उस स्कूल में आना चाहते थे जो घीसीलाल जी को हटाए बिना संभव नहीं था स्कूल में एक मेडम प्रियंचा भी पदस्थ थीं वे दलित नहीं थी इससे गाँव...

कहानी: पक्षपात

सौतेली माँ रेशम बाई के द्वारा किए गए पक्षपात से हुए अन्याय के शिकार राकेश पाँच साल में अपने सौतेले भाईयों से अधिक सक्षम और संपन्न हो गए थे। शहर में उन्होंने बहुत शानदार मकान बनवाया था। और परिवार सहित इमलिया गाँव से शहर में शिफ्ट हो गए थे। और अच्छा जीवन जी रहे थे। सब्जी मंडी आढ़त का काम उनका अच्छा चल रहा था खेती और डेरी से भी अच्छी आमदानी हो रही थी। जबकि उनके दोनों सौतैले भाई सारी संपत्ति और जमापूँजी मिटाने के बाद प्राइवेट नौकरी कर अपनी गुजर बसर कर रहे थे। आज राकेश की सौतैली माँ राकेश का मकान और वैभव देखकर ईर्ष्या की आग में जलने लगी थी। वो कुछ कहने की स्थिति मैं भी नहीं रही थी अनमनी होकर अपने घर आई थी। राकेश जब दस साल के थे तब उनकी माँ निर्मला का कैंसर से निधन हो गया था राकेश के पिता संतोश ने दूसरी शादी कर ली थी। रेशम बाई राकेश की सौतैली माँ बनकर आ गई थी रेशम बाई का कुछ दिनों तक तो राकेश के प्रति ठीक बर्ताव रहा लेकिन जब उसके बेटे राहुल का जन्म हुआ तो उसके व्यवहार में परिवर्तन आ गया। दूसरे बेटे रितेश के जन्म के बाद उसका पूरा ध्यान अपने बच्चों की तरफ चला गया। राकेश ने हायर सेकेण्डरी तक पढ...