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अप्रैल, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: ड्राइवर

छोटेलाल ड्राइवर को नगर निगम में नौकरी करते हुए पूरे सत्ताइस साल हो गए थे वो सबसे कुशल और समझदार ड्राइवर माने जाते थे निगम के आयुक्त ब्रजकिशोर सुमन की कार वे विगत पंद्रह वर्षों से चला रहे थे सुमन जी  का अगर कोई एकमात्र विश्वसनीय था तो वे थे छोटेलाल ड्राइवर छोटेलाल को रहने के लिए सुमन जी ने अपना निजी डुप्लेक्स दे दिया था जिसका किराया वे छोटेलाल जी से नहीं लेते थे। छोटेलाल जी ने जब सत्ताइस साल पहले दैनिक वेतन भोगी के रूप में निगम में ड्राइवर की नौकरी की शुरुआत की तब वे ड्राइविंग नहीं जानते थे ड्राइविंग लायसेंस जरूर उनके पास था जो उनके मित्र ने पैसे लेकर बनवा दिया था उनका दोस्त मुकेश आर टी ओ दलाली का काम करने लगा था। छोटेलाल को रोजगार कार्यालय के माध्यम से ये नौकरी मिली थी उन्हें निगम की जीप चलाने का कार्य दिया गया था। छोटेलाल साधारण परिवार से संबंधित थे उनके पिताजी हम्माल थे दो दिन बाद उन्हें नौकरी पर जाना था। दो दिन में उन्हें चार पहिया वाहन कौन सिखाता वो भी मुफ्त में आखिर एक दूर के रिश्तेदार अशोक का पता उन्हें लगा जो ट्रेक्टर चलाता था।  वे उसके पास गए उसने दो घंटे तक छोटे...

कहानी: फुरसत में

विवेक श्रीवास्तव जी को चालीस साल की सरकारी नौकरी से रिटायर हुए पूरे पाँच साल हो  गए थे। इन पाँच सालों में अब कहीं वे  अपनी सेवानिवृति को स्वीकार कर पाए थे। शुरू में तो काम के भारी बोझ से जो एकाएक उन्हें फुर्सत मिली उसे वो सहन नहीं कर पाए थे कई दिनों तक उनका मन अशाँत रहा था। श्रीवास्तव  जी एकाउण्टेण्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे आजकल वे चार्टड एकाउण्टेण्ट रोहित वर्मा के साथ काम कर रहे थे तब से वे अपने आप को बेहतर महसूस करने लगे थे।। पाँच वर्ष पूर्व जब श्रीवास्तव जी सेवानिवृत्त होने के बाद घर आए थे तो खुश थे कि काम के भारी बोझ से छुटकारा मिला कुछ दिन उनके अच्छे कटे उन रिश्तेदारों से भी मिले जिन्हें ये शिकायत रहती थी कि  वह आते ही नहीं हैं समाज के कार्यक्रम में भी शामिल हुए। लेकिन कब तक यह सब चलता  कुछ दिन बाद उनके पास फुरसत के सिवा और कुछ नहीं था वो फाइल भी नहीं थीं जिन्हेः वे घर लाकर देर रात निबटाते थे यह खाली समय उनका काटे से भी नहीं कट रहा था  एक दिन उनकी इच्छा ऑफिस जाने की हुई ऑफिस गए तो सभी ने उनका स्वागत किया साहब ने उनसे हाथ मिलाया बराबरी से बिठाया ये ...

कहानी: हत्यारिन

पागलखाने में दो साल से रह रही तमसा की हालत देखकर डॉक्टर भी तरस खाते थे उसके मन को कभी चेन नहीं मिलता था कभी बड़बड़ाती रहती कभी जोर जोर से चीखती चिल्लाती कभी फूटफूटकर रोने लगती सोने के लिए उसे रोज ही नींद के इंजेक्शन दिए जाते थे वरना उसे नींद ही नहीं आती थी। जो उसे पागलखाने लेकर आए थे वे कभी कभार उसकी खबर लेने आ जाते थे। जिनमें एक दिनेश अंकल भी थे वे उसके फुफेरे भाई थे आज भी वे उसकी खोज ख़बर लेने आए थे। लेकिन वे उसकी दशा देखकर दुखी तो होते पर उन्हें तमसा पर गुस्सा भी बहुत आता कहते इसकी इस हालत की ये खुद जिम्मेदार है यह अपने पति आशुतोष और बेटे प्रखर की हत्यारिन है कानून के शिकंजे से तो यह बच गई पर ऊपरवाले की सजा से नहीं बच सकी। तमसा पर डॉक्टरों के इलाज का भी असर नहीं होता था। दिनेश अंकल जब तमसा को पागलखाने लाए थे तब डॉक्टरों ने परीक्षण कर कहा था कि ये छः महीने से ज़यादा नहीं जी पाएगी लेकिन अब तो दो साल हो गए थे न तमसा के दःख कम हुए थे न उसे मौत आई थी। दिनेश अंकल बता रहे थे कि तमसा कि दस वर्ष पूर्व अभिषेक से  जब शादी हुई थी  तब दोनों बड़ा खुशहाल जीवन जी रहे थे शादी के दो साल बाद ...

कहानी: जहर उतारने वाला

अंचल के गाँव पृथ्वीपुर के ओझा तांत्रिक  बाबा  देवधर को तीन दिन बाद होश आया था  अब उसकी हालत कुछ ठीक थी। उसे ग्राम विकास अधिकारी आलोक ने अस्पताल में भर्ती कराया था वो सर्पदंश का शिकार हो गया था अगर आलोक उसे एक घंटे पहले नहीं लाते तो उसका बचना मुश्किल था।  जब वह बात करने लायक हुआ तो आलोक के दोनों हाथ जोड़कर बोला अगर आप नहीं होते तो मुझे मरे हुए तीन दिन हो गए होते मैं आपका दुश्मन था फिर भी आपने मेरी जान बचाई आलोक बोले क्योंकि मुझमें इंसानियत थी अब वादा करो जब तक गाँव में रहोगे तब तक सीधे सादे गाँव वालों को तंत्र मंत्र जादू टोना टोटका के खेल में नहीं फँसाओगे न किसी के मेहनत से कमाए रुपयों को हड़पोगे, उसकी जान से खिलवाड़ा करोगे। देवधर ने  पक्का वादा कर लिया था। अब वह भी लोगों को जागरूक कर उनके अंधविश्वास दूर करेगा। आलोक की पृथ्वीपुर में ग्राम विकास अधिकारी पद पर छः महीने  पहले पोस्टिंग हुई थी शुरू में वे जब आए तो गाँव वालों को अंधविश्वास में जकड़ा देख उन्हें बड़ा दुख हुआ था। गाँव में देवधर का बड़ा सम्मान था गाँव के लोग हर समस्या के लिए देवधर के पास आते और द...

कहानी: मन के जीते जीत

बैजनाथ जी एक जन्मदिन पार्टी से देर रात को घर आए थे उस पार्टी में आर्केस्ट्रा में उन्होंने सिन्थेसाइजर बजाया तथा गायन किया था उन्हें तीन घंटे की प्रस्तुति के तीन हज़ार रुपये मिले थे वे रुपये उन्होंने अपनी पत्नी गीता को दे दिए गीता सोई नहीं थी जागकर बैजनाथ जी की प्रतीक्षा कर रही थी। दुर्घटना में दोनों पैर गँवाने के दो साल बाद  वे फिर से कमाने लायक हुए थे दो साल तक वे एक रूपया भी नहीं कमा पाए थे घर की आर्थिक स्थिति बुरी तरह डगमगा गई थी गीता ज्यादा पढ़ी लिखी थी नहीं तो दूसरों के घर झाड़ू पौंछा लगाकर गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह चला रही थी। दोनों पाँव गँवाने के बाद जो जमा पूँजी बची थीउससे  कुछ महीने तो घर का खर्च चलता रहा  कुछ महीने जेवर बेचकर खर्च चलाया। किसी ने कोई सहायता नहीं की कहीं से उधार भी नहीं मिला लोगों ने ये सोचकर उधार नहीं दिया कि  यह कमाता तो है नहीं अदा कैसे करेगा दोनों बच्चे राम और श्याम सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे गीता ने उनकी पढाई बंद नहीं कराई थी   बैजनाथ जी दो साल पूर्व अच्छे भले थे ठेले पर सब्जी रखकर बेचते थे और सात सौ से आठ सौ रूपये रोज कमा लेत...

कहानी: जान गँवा दी पर सस्पेण्ड नहीं हुए उमेश सर

प्रधानाध्यापक उमेश सर की सेवानिवृति में छः महीने शेष थे और उनका चुनाव में ड्यूटी करते हुए हार्ट अटेक से दुखद निधन हो गया था गँभीर बीमार होने के बाद भी उनकी ड्यूटी लगाने से उन्हें जान गँवाना पड़ी थी उनके निधन के बाद जो जनआक्रोश का लावा फूटा उसने शासन प्रशासन को हिलाकर रख दिया था। कुछ दिनों से उमेश जी के हार्ट में ज्यादा तकलीफ हो रही थी स्थानीय डॉक्टर ने उन्हें एंजियोग्राफी की सलाह दी थी। चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी शासन ने अवकाश पर प्रतिबंध लगा दिया था इसलिए उनसे बन नहीं रही थी तब भी वे रोज स्कूल आ रहे थे चुनाव में उनकी ड्यूटी इसलिए नहीं लगी थी क्योंकि संकुल केन्द्र प्राचार्य ने उनकी हालत देखते हुए उनका नाम नहीं दिया था। लेकिन क्षेत्रीय आठवीं फेल विधायक का भतीजा जो सरकारी नौकरी करता था  उसका पत्नी के साथ मसूरी जाने का प्रोग्राम बन गया था। उसकी चुनाव में ड्यूटी लगी थी। विधायक जी के एक फोन से वो ड्यूटी कट गई और उसके स्थान पर उमेश जी की ड्यूटी लग गई जिस दिन उन्हें चेक अप कराने जाना था  उस दिन उनकी चुनाव ट्रेनिंग थी अगर चैक अप कराने जाते और ट्रनिंग में शामिल नहीं होते तो दूसरे दि...

कहानी: आतंक से मुक्ति

बिशन खेड़ा के नवागत युवा टी आई  शिवनारायण अवस्थी ने क्षेत्र के दुर्दाँत डाकू मंगल सिंह को उसकी गैंग सहित पुलिस एनकाउण्टर में मार गिराया था पहले तो लोगों को इस बात पर भरोसा ही नहीं हुआ कि मंगल सिंह ने एक दर्जन पुलिस कर्मियों की बेरहमी से हत्या की थी तथा दो पुलिस सब इंस्पेक्टरों को अगुवा कर उनके शस्त्र छीनकर जान से मारा था तथा उनके शव को थाने भिजवा दिया था। सरकार ने मंगलसिंह को जिंदा या मुर्दा पकड़कर लाने वाले को दस लाख के इनाम की घोषणा की  थी अन्य जो डाकू मारे गए थे वो सभी इनामी डकैत थे। मंगल सिंह के सफाए से सबको आतंक से मुक्ति मिली थी शिवनारायण की हर ओर प्रशंसा हो रही थी क्योंकि ऐस बड़े काम को अंजाम देने के लिए वे अपने साथ चुने हुए कुल आठ जाँबाज जवान ले गए थे। जिन्होंने डाकुओं को भागने का मौका दिए बगैर धराशायी कर दिया था। शिवनारायण अवस्थी जी की उम्र महज चौबीस साल की थी पुलिस विभाग आए उन्हें अभी दो वर्ष ही हुए थे। लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे दो वर्षों में ही उपनिरीक्षक से निरीक्षक पद पर पदोन्नत कर दिए गए थे राज्यपाल का वीरता पुरूस्कार भी उन्हें मिल चुका था। जब डाकू मंगल सिंह...

कहानी: खुद की दम पर

प्रदेश के सबसे ईमानदार आइ ए एस अधिकारी रहे बलवीर वर्मा सेवानिवृति के आम आदमी की तरह जीवन यापन कर रहे थे उनकी बातों तथा व्यवहार से कोई अंदाजा नही लगा सकता कि वे कभी प्रदेश के मुख्य सचिव रह चुके हैं। बचपने में जब बलवीर वर्मा स्कूल जाते तो कभी किसी की नकल नहीं करते परीक्षा में कुछ टीचर सब बच्चों को नकल कराते पर वर्मा जी अपना पेपर अकेले ही हल करते रहते। पाँचवी की बोर्ड परीक्षा में खुलकर नकल चली पर वर्मा जी ने एक शब्द की भी नकल नहीं की भले ही वे कक्षा में प्रथम न आए हों पर जितने नंबर मिले वे उनके अपने इस बात का उन्हें संतोष रहा। हर परीक्षा उन्होंने अपने दम पर पास की वे जब हायर सेकेण्डरी में आए तब पता चला कि ज्यादातर टीचर टूयूशनखोर हैं और इसी हिसाब से नंबर देते हैं। और तो और पैसे लेने पर वे लोकल परीक्षा की कॉपी तक बदल देते थे। नवीं की परीक्षा में नगरपालिका अध्यक्ष का लड़का विजयेन्द्र  भी शामिल हुआ था विजयेन्द्र के पिता ने कक्षा टीचर को बुलाकर कहा कुछ भी करो कैसे भी करो  मेरा लड़का प्रथम आना चाहिए और रुपये से भरा लिफाफा सर को दे दिया वो खुश हो गए। दूसरे दिन वे वर्मा जी की हल की हुई ...

कहानी: पटेल बा

गाँव रतनपुर के पटेल ग॔गाराम जी का निधन हुए दस वर्ष बीत गए थे पर आज भी गाँव के लोग उन्हूँ भूले नहीं थे उनकी नेकी भलाई के काम आज भी याद किए जाते थे। आसपास के चालीस गाँवो में जब भी कोई विवाद झगड़ा या समस्या आती तो उसे सुलझाने में पटेल बा की मुख्य भूमिका रहती थी जिससे जो वे कह देते वो उसे मानना ही पड़ता था पटेल बा  के पास सौ एकड़ जमीन थी दस हाली थे पच्चीस बैल थे एक घोड़ा था दस भैंस वा बीस गाएँ थीं पटेल बा के यहाँ लगभग पच्चीस नौकर काम करते थे। उनमें एक नौकर बृजलाल भी था जिसे वे बिरजू कहते थे।  बृजलाल जब बारह वर्ष का था तब उसके पिता  हरलाल मरते समय  पटेल बा के हवाले कर गए थे। पटेल बा ने बिरजू को आठवीं तक पढ़ाया था। वो पटेल बा के छोटे मोटे  काम कर देता था तथा दोनों समय वहीं खाना खाता पटलन माँ सुरती देवी नेकदिल दयालु महिला थीं वे बिरजू से पुत्रवत स्नेह करती थीं। बिरजू जब बाइस साल का हुआ था पटेल बा ने उसकी शादी ललिता से करा दी  थी तथा रहने को मकान दिया था और घर गृहस्थी का सारा सामान भी ललता और बिरजू पटेल बा के खेतों में काम करते और खुश रहते। बिरजू ने कभी पटेल बा से ...

कहानी: सब्जबाग

कभी ससुराल साल भर अपमान जनक समय गुजार कर आए देवनारायण आज सुखपूर्वक रह रहे थे कृषि विभाग में ग्रामीण कृषि विस्ता अधिकारी के पद पर कार्य करते हुए उन्हें दस वर्ष होने जा रहे थे इस बीच वे एक बार भी अपनी ससुराल नहीं गए थे उनका मन अभी तक उचटा हुआ था वे अपना ससुराल में गुजारा एक साल अपमान भरा समय आज तक भुला नहीं सके  थे।  देवनारायण जी ने बीस वर्ष पूर्व बारहवीं कृषि विषय से पास की थी। तथा सिया पुर नगर पालिका परिषद में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी बन गए थे उस समय रघुवर  प्रताप सिंह नगर पालिका अधिकारी थे। देवनारायण कर्मचारी नेता बन गए थे  वेतन बढ़ाने की माँग को लेकर सफाई कर्मी  लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे लेकिन सही नेतृत्व  के अभाव में कोई लाभ नहीं हो रहा था। लेकिन इस बार उनका नेतृत्व देवनारायण जी ने किया तथा आंदोलन छेड़ दिया। पूरे नगर की सफाई व्यवस्था ठप हो गई थी रघुवर प्रताप जी ने आँदोलन को खत्म करने की हर संभव कोशिशें की पर नाकाम रहे। आखिर हारकर उन्होंने देवनारायण को अकेले अपने पास बुलाया और डाँटते हुए बोले बहुत हो गया अब या तो हड़ताल खत्म कराओ या परिणाम भु...

कहानी: सिर चढ़ी अफसरी

सेन्ट्रल जेल के कैदी नंबर चार सौ तीन चंदर सिंह को शायद ही किसी ने हँसते हुए या किसी से बात करते हुए देखा हो। वो ज्यादातर समय गुमसुम रहते थे कोई बात करने की कोशिश भी करता तो जवाब भी नहीं देते कभी प्रदेश के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे चंदर सिंह अपराध सिद्ध होने पर जेल की सजा भुगत रहे थे। अभी भी वे अपने आपको अफसर ही मानते थे और किसी को अपने लेबल का नहीं समझते थे सभी को हेय नजरों से देखते थे इस जेल में आए हुए उन्हें तीन वर्ष हो गए थे उनकी आयू तिरेपन वर्ष की हो गई थी अलग अलग मामलों में उन्हें कुल पैंसठ वर्ष को सजा हुई थी और अभी कुछ केस ऐसे उन पर चल रहे थे जिनका फैसला होना बाकी था। वे अच्छी तरह समझ गए थे कि उनकी  बाकी जिंदगी जेल में ही कटना है। चंदर सिंह प्रशासनिक अधिकारी होने से पहले एक बिल्डर के यहाँ साइट सुपर वाइजर थे बहुत कम तनख्वाह थी और साधारण जीवन जी रहे थे। उनकी पत्नी रोशनी  भी निर्माण श्रमिक थी पिताजी प्रहलाद जी रिक्शा चलाते थे। चंदर सिंह को अफसर बनने की प्रेरणा रोशनी ने दी थी। उसी ने उनकी सुपरवाइजर की नौकरी छुड़वाई थी शहर में अलग कमरा दिलवाया था। तथा उनका पूरे चार साल तक ...

कहानी: जनता के बीच का सृजनकार

आज राजेन्द्र जाने माने अभिनेता गायक कलाकार, गीतकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। अच्छे संगीत की रचना भी उन्होंने की। कमाल की शायरी करते हैं लेकिन वे जब एक सरकारी विभाग में चपरासी थे तब उन्हें अपमान के कड़वे घूँट पीने पड़े थे।  दस वर्ष पूर्व उन्होंने बी म्यूज किया था रंगमंच पर कई नाटकों में अपने किरदार में अपने अभिनय से जान डालकर दर्शकों को प्रभावित भी किया था। तभी उनके पिताजी परसराम जो तहसील में चपरासी थे कैंसर की बीमारी से हारकर मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।  उनकी मौत पर राजेन्द्र को अनुकंपा नौकरी तो मिली पर पद उनको चपरासी का मिला। सबके समझाने पर की आज के ज़माने में सरकारी नौकरी मिलना बड़ी बात है। राजेन्द्र जी ने वो नौकरी स्वीकार कर ली वह अच्छे कवि  तथा शायर भी थे। लेकिन ऑफिस में उनकी कला की कद्र करने वाला कोई नहीं था। सब उन्हें चपरासी ही समझते थे वे भी ये सोचकर नौकरी कर रहे थे कि हर महीने उन्हें वेतन तो मिल जाता है। अभी उनकी बहन अंजू कुँवारी थी भाई नीरज पढ़ रहा था। इसलिए नौकरी करना उनके लिए बहुत जरूरी था। ऑफिस में नए साहब आर पी  तिवारी जी  की पोस्टिंग हुई थी उनके विष...

कहानी: कलाकार

बंशीलाल की पत्थर की कलाकृति पूरे ढाई करोड़ रुपये में बिकी थी। यह खबर सुनकर  रोशन पुर  के कलाकारों में खलबली मच गई थी।बंशीलाल पत्थर की मूर्ति बनाने में माहिर तो था ही मिट्टी की मूर्तियाँ भी बहुत अच्छी बनाता था इसके अलावा वो काँसा पीतल एवं अष्ट धातु की मूर्तियाँ भी अच्छी बना लेता था यही कारण था कि वो रोशनपुर के कलाकारों में  सबसे समृद्ध था वह एक महलनुमा मकान में रहता था उसे कई बड़े छोटे सम्मान प्राप्त हो चुके थे। जब बंशीलाल की कलाकृति ढाई करोढ़ रुपये में बिकी तो  उसके  प्रतिद्वंदी विद्याधर के कलेजे  पर साँप लौट गया। उसे जलन के मारे चैन नहीं पड़ रहा था। बंशीलाल और विद्याधर के बीच मनमुटाव तबसे चल रहा था जब बंशीलाल  मजदूर की हैसियत से विद्याधर के पिताजी रामनिवास के साथ काम करता था रामनिवास  उस वक्त रोशनपुर के सबसे अच्छे  मूर्तिकार थे। विद्याधर को वे अपनी कला सिखा रहे थे उसी दौरान उन्हें सहायक की जरूरत पड़ी बंशीलाल तब भवन निर्माण  के काम में मजदूरी किया करता था उसे तो मजदूरी से मतलब था इसलिए वो रामनिवास के साथ  काम करने लगा विद्याधर उससे ...

कहानी: भेदभाव

अपनी मम्मी के द्वारा बहू बेटी के साथ भेदभाव से परेशान होकर घर से अलग हुए नरेन्द्र  को पाँच साल हो गए थे अब उसका बेटा प्रतीक स्कूल जाने लगा था इन पाँच सालों में  नरेन्द्र ने शून्य से शुरुआत कर  शिखर को छुआ था। उसकी पत्नी निर्मला भी काफी ख़ुश रहा करती थी निर्मला संयुक्त परिवार में डेढ़ साल रही थी।इन डेढ़ सालों में उसके साथ जो यातनाजनक बर्ताव हुआ था उसे जो  सुने उसके  सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ। निर्मला सुंदर सुशील सीधी सरल और पढ़ी लिखी थी जब उसकी नरेन्द्र से शादी हुई तब  नरेन्द्र की बहन नीता कुँवारी थी वह भी विवाह योग्य थी छोटा भाई नितेश कॉलेज में पढ़ रहा था। नरेन्द्र की मम्मी निकिता एक अहंकारी महिला थी । नरेन्द्र के पिता सुजान  सिंह घर के मामलों में दखल नहीं देते थे परिवार की आय का साधन किराने की दुकान थो जो अच्छी चलती थी नरेन्द्र ही दुकान चलाता था पिता और भाई तो बहुत कम दुकान पर ध्यान देते थे  नरेन्द् एक ईमानदार इंसान था जिससे घर का खर्च आराम से चल रहा था। निर्मला से शादी होने के बाद नरेन्द्र बहुत खुश था। उसकी ये खुशी उसकी माँ निकिता और बहन नीता बर...

लघुकथा- दुश्मन से मुहब्बत

सोमेशराजेश और प्रखसोमेशर के बीच विगत बीस वर्षों से दुश्मनी चली आ रही थी दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने के एक भी अवसर को नहीं गँवाते थे। कोई दुखी परेशान होता तो दूसरे को खूब मज़ा आता उसी राजेश के कारण प्रखर तथा उसके बेटे कुलदीप की जान बची थी और मुजरिमों को जेल हुई थी। जिनको बत्तीस साल की जेल हुई थी वो प्रखर की पत्नी प्राची तथा दोस्त सोमेश था। यह घटना दस वर्ष पुरानी है। जब सोमेश प्रखर का गहरा दोस्त हुआ करता था उसका घर में आनाजाना था प्राची से उसकी खूब बनती थी। राजेश की तब भी प्रखर से दुश्मनी थी। दोनों एक दूसरे की खबर लेते रहते थे। प्राची और सोमेस कि निकटता खतरनाक मोड़ पर पहुँच गई थी जिससे प्रखर अनजान था वो अपनी पत्नी को वफ़ादार समझता था और सोमेश को सच्चा दोस्त। जब राजेश को सोमेश तथा प्राची के षडयंत्र का पता चला तो उसने विचार किया की जब दुश्मन ही जिंदा नहीं रहेगा तो वो किसे नीचा दिखाएगा किसकी बुराई कर खुश होगा।यह सोचकर उसने प्रखर को खतरे से आगाह करने की कोशिश की। और उसमें वो सफल भी हुआ। सोमेश और प्राची ने कुलदीप की बेरहमी से हत्या करने के बाद प्रखर को भी जान से मारने की साजिश रच ...

कहानी: गाय

संजना और दौलतराम दस साल पहले हाइवे  के किनारे शहर से दूर छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे उसी के पास उन्होंने एक झुग्गी बना रखी थी जिसमें वह रहा करते थे।आज  गोपाल गौशाला   डेयरी के भालिक थे सत्तर जर्सी गाएँ उनके पास थीं और बारह एकड़ सिंचित कृषि भूमि। अब वे संपन्न और खुशहाल जीवन जी रहे थे। यह सब  एक  गाय के कारण हुआ था जो  उन्हें दस साल पहले मिली थी। दस वर्ष पहले दिसंबर माह में तेज ठंड में  जब मावठा पड़ा था तब एक गाय उन्हें अपने घर के सामने बैठी मिली बगल में उसकी नवजात बछिया भी थी। संजना के मन में उसके प्रति दया का भाव उत्पन्न हुआ उसके लिए गुड़ अदरक डाल कर दलिया तैयार कर खिलाया उसे ठंड से बचाने का इंतजाम भी किया। और गाय के मालिक के आने का इंतज़ार करने लगे पर मालिक नहीं आया पूरे आठ दिन बीत गए। संजना और दौलतराम गाय की अच्छी देखभाल कर रहे थे चारा भूसा दाना खली चुनी सबकी व्यवस्था कर ली थी उन्होंने गाय भी उनसे हिल मिल गई थी। गाय लावारिस थी इसलिए कोई उसे लेने नहीं आया था  अच्छी देखभाल और खिलाई से गाय एक बार में ढाई लीटर दूध दे रही थी।  दोनों वक्त ...

कहानी: बेदखल

अपनी जमीन जायदाद से बेदखल करने वाला बेटा नेकचंद्र आज बुढ़ापे में रमेशचंद्र  एवं उनकी पत्नी माधवी का सहारा बना था। कभी जिसे वे निकम्मा नकारा कहकर तिरस्कृत करते थे आज उसके कारण उनका नाम रोशन हो रहा था।रमेशचंद्र कभी कभी अपने किए पर बहुत दुखी होते थे। पैंतालीस वर्ष पूर्व जब नेकचंद्र जी का जन्म हुआ था तब उन्हे बड़ी ख़ुशी हुई थी शादी के पन्द्रह साल बाद बेटे का जन्म जो हुआ था। उसके तीन साल बाद जब छोटे बेटे नवीन चंद्र का जन्म हुआ तब  उनका स्नेह छोटे बेटे पर कुछ अधिक हो गया नेकचंद्र स्वभाव से नेक सीधे सरल  थे। बचपन में उनकी सरलता और सीधापन रभेश चंद्र  और माधवी को अच्छा नहीं लगता था नवीन चंद्र उनके बिल्कुल विपरीत था चंचल चपल और बातूनी वो कुछ मतलबी भी था। बचपन में वो अपनी वस्तुएँ किसी को छूने तक नहीं देता था और नेकचंद्र जी की चीजें हडप लेता । माँ बाप हर बार नवीन का पक्ष लेते कई बार वो जो गलती करता उसका इल्जाम नेकचंद्र पर मढ़ देता धीरे धीरे दोनों बड़े हो रहे थे  नेकचंद्र जी माता पिता से पिट पिटकर और नवीन चंद्र माता पिता का लाड़ दुलार पाकर। नेकचँद्र पढ़लिखकर बढ़े हुए तो समाज...

कहानी: शिक्षा मंत्री का साला

प्रदेश के शिक्षा मंत्री रामस्वरूप के साले किशन कुमार  का तीसरी बार निलंबन हुआ था। क्योंकि  शिक्षा मंत्री खुद नहीं चाहते थे कि उनके रहते वो पद पर बहाल हो। ये निलंबन का तरीका भी उन्होंने अपने साले की हरकतों से परेशान होकर निकाला था।तीसरी बार निलंबित होने के बाद किशन कुमार अपने जीजा जी से  कहकर आया था कि मुझे बहाल करा दो मैं अब कोई ऐसा काम  नहीं करूँगा जिससे आपकी छवि धूमिल हो। पर मंत्री जी को उसकी फितरत देख उसकी बातों पर भरोसा तो नहीं हो रहा था । लेकिन विधानसभा चुनाव आने वाले थे यह सोचकर उन्होंने अधिकारियों  को किशन कुमार को बहाल करने के निर्देश दे दिए थे। तथा हिदायत देते हुए कहा था कि इसकी पदस्थापना ऐसी जगह करना जहाँ से ये ऐसा कोई कारनामा नहीं कर पाए जिससे मेरी छवि धूमिल हो। साढ़े चार साल पहले जब रामस्वरूप जी चुनाव जीतकर विधान सभा में पहुँचे थे तब उनकी बेदाग  छवि देखकर मुख्यमंत्री ने उन्हें शिक्षा मंत्री बनाया था। उनके शिक्षा मंत्री बनने के बाद उनके साले किशन कुमार का दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच गया था। वैसे किशन कुमार प्राइमरी स्कूल में सहायक शिक्षक था मगर अ...

कहानी: लडके ने मकान बिकवाया

सूरज सिंह कभी पाँच एकड़ जमीन के स्वामी थे पक्का घर था घर में आटा चक्की लगी हुई थी अच्छा कमाते खाते थे लेकिन उनके इकलौते लड़के  रवीन्द्र ने अपने गलत निर्णय के कारण उन्हें मिटा दिया था उनका मकान बिक गया जमीन बिक गई थी। आजकल वे एक किराये के मकान में रहकर चक्की चलाकर अपनी गुजर बसर कर रहे थे। लड़की रजनी की शादी वे चार साल पहले कर चुके थे और वो अपनी ससुराल में खुश थी। रवीन्द्र उनकी बर्बादी का कारण बनने के बाद  उन्हें छोड़कर अपनी पत्नी सुनीता तथा दोनों बच्चे सुनील तथा संगीता को लेकर दूसरे शहर में रहने चला गया था। सूरज सिंह  अकेले खजूरी कला गाँव में अपनी पत्नी शीला के साथ रह रहे थे उनकी उम्र साठ वर्ष की हो गई थी। आज वे बड़े दुखी थे दिन में दस बार  उन्होंने रवीन्द्र को फोन लगाया था। उन्हें पैसे की जरूरत थी रवीन्द्र को यह बात मालूम थी इसलिए वो फोन नहीं उठा रहा था।  रकम के नाम पर शीला के गले में सोने का मंगल सूत्र बचा था उसके भी बिकने की नौबत आ गई थी। बर्बादी की शुरूआत दो साल पहले हुई थी  तब सूरज सिंह का लड़का एक निजी यात्री बस में कंडक्टर था।  यह काम करते हुए उस...

कहानी: लौट आए

तीस वर्ष की अवस्था में अपने माँ पिता से अलग हुए राम किशोर और उनकी पत्नी रमा साठ वर्ष की आयु में हमेशा के लिए अपने बयासी वर्ष बूढ़े पिता और अस्सी वर्ष बूढ़ी माँ के पास रहने आ गए थे।  उनकी माँ पार्वती और पिता हर प्रसाद  उन्हें अपने बीच देखकर बड़े प्रसन्न थे।हर प्रसाद के पास तीस एकड़ उपजाऊ जमीन थी। जिसे उन्होंने अभी तक रखी थी बीच भें कई बार मौके आए पर उन्होंने एक एकड़ जमीन भी नहीं बेची। हरप्रसाद जी खेती तो मजदूरों से कराते थे पर खेती की पूरी देखभाल वे ही करते इसिलिए बयासी वर्ष की आयु में भी वे साठ पैंसठ से अधिक के नहीं लगते थे। घर उनका बहुत बड़ा था जिसमें वे दोनों प्राणी रहते थे।रामकिशोर और रमा के आ जाने से अब उनकी संख्या चार हो गई थी। घर में किसी चीज की कोई कमी थी। रामकिशोर और रमा को यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा था।  रामकिशोर जी जब रमा के कहने पर तीस वर्ष पूर्व ये घर छोड़कर गए थे तब हर प्रसाद और पार्वती बहुत उदास हुए थे। तब हर प्रसाद ने यही कहा था बेटा इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए तुम्हारे लिए खुले हैं जब चाहे तुम यहाँ आ सकते हो यह घर हमेशा तुम्हारा ही रहेगा तब रामकिशोर ने मन...

कहानी: नौकरानी

रतनपुर माध्यमिक शाला की प्रधानाध्यापक शान्ति उइके आज  सेवानिवृत हो गई थीं  उनका भावभीना विदाई समारोह आयोजित हुआ था खुली जीप में बिठाकर  उनको  नगर  में घुमाया गया था उन्हें लेने उनका पूरा परिवार आया था उनका एक लडका विश्वास मजिस्ट्रेट तथा दूसरा  आशुतोष डॉक्टर था एक बहू  लता प्रोफेसर एवं दूसरी बहू  रश्मि डॉक्टर थी  पति  शिवलाल दो साल पहले पोस्ट मास्टर के पद से रिटायर हो गए थे  तथा उनके,दोनों पोते एवं पोतियाँ भी आए थे। इसके बाद उन्होंने अपने एच आई जी डूप्लेक्स में स्नेह भोज का आयोजन किया था । उसमें शहर के सभी प्रमुख लोग  शामिल हुए थे जिनमें  वयोवृद्ध वकील शीतल प्रशाद एवं उनकी पत्नी  सेवानिवृत प्राचार्य  सरला   भी  थी जिनकी  बदौलत वे आज इस मुकाम पर पहुँची थी शाँति उइके कभी  शीतल जी के यहाँ घरेलू नौकरानी थीं। शीतल जी और सरला जी बहुत खुश थे शाँति जी ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था तथा सभी से कहा था कि ये मेरे आदर्श हैं।  आयोजन के समाप्त होने के बाद जब शाँति जी अपने कक्ष में आई तो उनके दिम...

कहानी: मायके से ऐसे आई रामवती

माँगीलाल पूरे पन्द्रह साल बाद अपने गाँव आया था उसके छोटे भाई रमेश की लड़की संगीता की शादी थी । वह गाँव में घूमने निकला तो  उसे बचपन का  दोस्त हेमराज मिल गया हेमराज उसे घर ले गया  था घर पर उसने  अपनी पत्नी रामवती को आवाज देकर बुलाया देखो तो कौन आया है। रामवती  की उम्र अठ्ठावन वर्ष की हो गई थी अब वो नाती पोते वाली हो गई थी।  माँगीलाल और हेमराज भी साठ वर्ष के हो गए थे रामवती बाहर आई और माँगीलाल को अजनबी समझ जाने लगी तभी हेमराज ने कहा जरा गौर से तो देख और फिर पहचान ये कौन  है माँगी लाल भी बोले हाँ बताओ भाभी मैं कौन हूँ। अचानक वो पहचान गई और बोली माँगी भैया।  उसे पैंतीस वर्ष पुरानी घटना याद आ गई और फिर अपने तेवर में आकर बोली मरी का खाया  तुम्हारे कारण मैं ससुराल आई थी नहीं तो मैं तो हमेशा के लिए तुम्हारे दोस्त को छोड़कर गई थी और किसी भी हाल में आने वाली नहीं थी। अब माँगीलाल भी बोले मैंने क्या गलत किया था  आपके घर को बसाया आपकी गृहस्थी नहीं उजड़ने दी। सुनकर रामवती नरम पड़ गई हाँ भैया तुम सही कह रहे हो  तुमने उस समय मुझे  बड़ी दिलासा ...

कहानी: भाभी

नारायण सिंह आज अपनी भाभी माँ सुमन  की तेरहवीं के कार्यक्रम में  शामिल हुए थे ऐसे अवस सभी परिचित अःवं संबंधी उनसे जुड़ संस्मरण सुना रहे थे उनकी बात सुनकर नारायण इतना ही बोले  कि मैं उनके बारे म क्या क्या कहूँ  वो मेरी आदर्श थीं उनकी बदौलत में अपने जीवन में कुछ करने  लायक  हुआ। भाभी माँ के निधन का नायण कॅङभो बड़ा दुख था।  नारायण सिंह जब आठ वर्ष के थे तब उनके पिता  शिवनारायण का निधन हो गया था। उनके बड़े भाई प्रेमनारायण  जी  तब आठवीं में पढ़ रहे थे पिता के निधन से घर की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी वो समय उन्नीस सौ पचास का था। प्रेमनारायण  जी पढ़ने भें तेज थे लेकिन परीक्षा फीस के दो रुपये उनके पास नहीं थे तो वे परीक्षा नहीं दे सके उनके गाँ में स्वास्थ्य केन्द्र खुला था उसमें उनके ताऊ जी के लड़के तेजनाराय ने   उन्हें चपरासी की नौकरी दिलवा री थी  इसके बाद  उनकी शादी सुमन से हो गई। सुभन ने जोर देकर नारायण का स्कूल में एडमीशन कराया। एक बार प्रेमनारायण जी की नौकरी को लेकर उनकी ताई ने ऐसी बात कह दी जो उन्हें चुभ गई  उन्ह...

कहानी: बेवफ़ाई

सुरेश जी की आयु पैंसठ वर्ष की हो चुकी थी  वे अपने बेटे बहू और पोती के साथ  सुखपूर्वक रह रहे थे उनकी ऑटोमोबाइल की एजेंसी एवं शोरूम तथा वर्कशॉप का काम उनका बेटा गौरव देख रहा था। वे तो अब कभी कभी ही शोरूप एवं एजेन्सी पर जाते थे। आज वे जब शाम को घर आए तो उनकी इच्छा थी बहू रुपाली से खिचडी बनवाकर खाने की लेकिन वे कह,नहीं पाए पर  जब,वे खाने बैठे तो खिचड़ी देखकर उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ। बहू से इतना ही बोले बेटी  तूने मेरे मन की बात कैसे जान ली रूपाली जो कॉलेज में म्यूजिक की प्रोफेसर थी बोली पापा बचपन में मेरे पिता का निधन हो गया था भाँ ने  बड़े कष्ट उठाकर मुझे पाला था ।आपके बेटे गौरव से शादी के बाद आपने मेरे पिता की कमी पूरी कर दी  तबसे मैंने इस घर को मायके की तरह ही समझा कभी मुझे लगा ही नहीं की मैं ससुराल में हूँ। विगत सात वर्षों से यहाँ रह रही हूँ इसलिए यह समझने लगी हूँ कि आपको कब कैसा खाना पसंद है। सुनकर सुरेश जी भावुक हो गए बोले बेटी सदा सुहागन रहो और जुग जुग जियो।  रूपाली बोली  जीवन में  आपका वरद हस्त हमेशा हमारे सिर पर रहे। सुरेश जी पच्चीस साल ...