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व्यंग्य: कलह प्रिय लोगों का साथ नर्क का वास

कहने वाले कहते हैं कि दुनिया में अगर कहीं नर्क है तो वहाँ है जहाँ कलह प्रिय लोग रहते हों जो अहसान फरामोश हो ।जिन्हें सबमें गलतियाँ नजर आती है जो अपनी बड़ी से बड़ी गलती को भी गलती नहीं मानते और दूसरों की छोटी से छोटी गलती को भी हिमालय से बड़ी मानकर उसे कलह का मुद्दा बना लेते हैं। और सामने वाले का जीना हराम कर देते हैं। कलह करने वाला तो अपनी भड़ास निकालकर शाँत हो जाता है पर जिसके साथ कलह करता है उसकी हालत बहुत खराब हो जाती है ये वो यातना है जिसे रोकने वाला कोई नहीं है इन कलह प्रिय लोगों को कोई सजा भी नहीं देता। इनकी सेहत तो कलह करने से अच्छी हो जाती है पर यह बेचारे पीड़ित की सेहत बिगाड़ देते हैं।
अगर परिवार में पति अथवा पत्नी में से कोई एक कलह प्रिय हो तो उस घर को नर्क में बदलते देर नहीं लगती और अगर पति पत्नी दोनों ही कलहप्रिय हों तो उनके बच्चे घोर नर्क की यातना भोग रहे होते हैं कलह प्रिय लोगों से पीड़ित की पीड़ा असाध्य होती है जिसे सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। 
सुरेश ने इस लिए शादी नहीं की क्योंकि उसकी माँ जबर्दस्त कलह प्रिय तथा झगड़ालू थी उसके पिताजी नितांत शाँति प्रिय इंसान थे जो अपनी पत्नी से डरे सहमें रहते थे और उसको इन्हें सताने में पीड़ा देने में बहुत आनंद आता था। सुरेश ने इसी डर के कारण शादी नही की थी इसका दोषी भी सुरेश की माँ सुरेश के पिताजी को ठहराती थी ओर यह भी कलह का एक बड़ा मुद्दा था जो कभी सुलझता ही नहीं था । 
दूसरी ओर निकिता ने इसलिए शादी नहीं कि क्योंकि उसके पिताजी कलह प्रिय थे और उसकी माँ शाँति प्रिय सहनशील सीधी सरल महिला थी। जो उनके साथ रहकर नर्क की यातना भोग रही थी। यही कारण था कि निकिता शादी का नाम सुनकर ही काँप जाती थी। कलह प्रिय लोगों को कलह करने के हजार कारण मिल जाते हैं । और यह कारण शाँति भंग करने के लिए पर्याप्त होते हैं। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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