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व्यंग्य: बिचौलियों की मौज

आज के इस दौर में अगर कोई सबसे अधिक सुखी है तो वो है बिचौलिया ये बिचौलिया वो है जिसकी न हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा मिल जाए। इनके पास से एक रुपया भी खर्च नहीं होता और लाभ पूरा का पूरा होता है ।ये बिचौलिए आपको हर डगह मिल जाएँगे इनके लिए कोई काम कठिन नहीं है रिश्वत खोरों को रिश्वत दिलाने में इनका बड़ा योगदान रहता है कुछ काम तो ऐसे होते हैं जो बिचौलियों की मदद के बिना संभव ही नही होते। 
एक व्यक्ति को अपना मकान बेचना था उसने बिचौलिए से संपर्क किया । बिचौलिए ने कहा कितने में बेचना है वो बोला बीस लाख में बिचौलिया बोला बिकवे देंगे। मगर हमारा कमीशन एक लाख रुपया रहेगा। हम सौदा जितने में तय कराएँ उससे आपको कोई मतलब नहीं आपको अपने पैसे पूरे मिल जाएँगे आपको इससे मतलब रखना है वो बोला ठीक है। वो मकान जिसे कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था उसका ग्राहक बिचौलिया दुसरे दिन ले आया। उसने ग्राहक को मकान की कीमत चौबीस लाख बताई खूब भावताव के बाद सौदा बाइस लाख में तय हुआ। दो लाख रुपये बिचौलिए ने ग्राहक से झटके और एक लाख रुपये मकान बेचने वाले से और मिठाई मुफ्त में खाई एक झटके में बिचौलिए ने तीन लाख रुपये कमा लिए थे। ये बिचौलिए मजदूर भी उपलब्ध कराते हैं। और उनसे भी कमीशन खा जाते हैं मकान किराये से देने दिलाने का काम भी ये करते हैं। एक व्यक्ति इंदौर सामान खरीदने गया । बस स्टैण्ड से ही एक बिचौलिए ने उसका पीछा किया वो जिस दुकान पर गया उस दुकान के मालिक को उसने गुप्त इशारा किया और वहाँ से चला गया ग्राहक के जाने के बाद वो दुकान पर आया। ग्राहक दो लाख का सामान लेकर गया था उस के कमीशन के दस हजार रुपये उस दुकानदार ने उसे दे दिए । मुफ्त में ही वो दस हजार रुपये झटक चुका था। कुछ गाड़ी खड़ी करने के पैसे ले लेते हैं जबकि वे इस के लिए अधिकृत नहीं होते। इनकी संख्या जितनी तेजी से बढ़ रही है उतनी तेजी से यह फल पूल भी रहे हैं।बस स्टेण्ड पर सवारी से किराये का कमीशन लेने वाले बिचौलिया मी अक्सर मिल जाते हैं जो दिन भर में अच्छा खासा रुपया कमा लेते है। यह मुफ्त का काम कई लोगों को बड़ा अच्छा लग रहा है। आम आदमी लुट रहा है इसकी किसी को चिंता नहीं है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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