सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: ऊँचे पद वाले घटिया लोग

आज की इस दुनिया में जहाँ मतलबी लोगों की संख्या बहुत अधिक है। वहाँ ऊँचा पद सारी विशेषताओं का धारक है अगर ऊँचे पद पर कोई घटिया विराजमान है तो वो भी महान है। कोई कहता है फलाने साहब के मार्गदर्शन में निर्देशन में यह प्रयास सफल हुआ है तो लोग उसे सही मान लेते हैं जिस छोटे आदमी ने सबसे ज्यादा मेहनत की जिसकी वजह से काम सफल हुआ उसका कोई नाम तक नहीं लेता बल्कि वो खुद सोचता है कि साहब अगर नाराज हो गए तो परेशानी खड़ी हो जाएगी।
यह ऊँचे पद वाले घटिया लोगों अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं छोटे लोगों की इनकी निगाह में कोई कीमत नहीं होती यह कुछ करते धरते नहीं है । बस इनका एक ही काम रहता है हस्ताक्षर करना बाकी समय ये किसी को डराते हैं किसी को धमकाते हैं। किसी की इन्क्रीमेन्ट रोक लेते हैं किसी को सस्पेण्ड कर देते हैं। ये करते कुछ नहीं मगर रिश्वत की कमाई में सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं का होता है इनमें नौतिकता नहीं होती न इनका कोई धर्म ईमान होता है न इनमें सरलता सहजता होती है ये लोग ख़ुशामद पसंद होते हैं जिसका लाभ खुशामदी टाइप के लोग खूब उठाते हैं इनका बर्ताव व्यवहार ठीक नहीं रहता अपने छोटों के साथ ये बड़ी रूखाई से पेश आते हैं यह वो हैं जो गलत को सही साबित करने के लिए होते हैं। इनकी मोहर और दस्तखत बड़े से बड़े मुजरिम को भी बचाने का दम रखता है। यह जब रिटायर होते हैं तब इन्हें धरातल दिखाई देता है तब इनके पँख कट चुके होते हैं इनका कलेवर बड़ा होता हैऔर पाँव कमजोर इसलिए ठीक से चल नही पाते और रेंगरेंगकर अपने जीवन का अंतिम समय गुजारतें हैं। जाने कितने लोगों की बददुआएँ इनके पीछे लगी रहती हैं। जो इन्हें चैन से रहने नहीं देती जब अंतिम समय में अपने कर्मों को याद करते हैं तब इन्हें एक भी काम अच्छा नहीं दिखता तब ये यही सोचते हैं कि अब जब कुछ नहीं कर सकते तब पछतावा है जब कर सकते थे तब किया नहीं अगर करते तो ये पछतावा नहीं होता। हम तो इनकी चर्चा ही कर सकते हैं इन्हें कौन सुधार सकता है । इन्हें बातों से हराना मुमकिन नहीं और समझदार कहते हैं बड़े साहब से कभी बहस नही करनी है। नहीं तो इसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...