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हिन्दी के वास्तविक सेवी (व्यंग्य)

एक दिन हिन्दी दिवस मानकर पूरे साल अंग्रेजी में काम करने वाले अंग्रेजी बोलकर अपना रौब ज़माने वाले तो बहुत है। हिन्दी के नाम से विदेश घूमकर आने वाले भी हैं। पर क्या यह वास्तविक हिन्दी सेवी हैं? सही मायने में हिन्दी सेवी कौन है? इस पर तनिक विचार करें तो बहुत सी बातें हमारे सामने उजागर होंगी। योजनाएँ अंग्रेजी में बनाने वालों को भी हिन्दी की जरूरत पड़ जाती है।
आज जो हिन्दी जन जन की भाषा है तो उसमें आम लोगों का ही योगदान है। हिन्दी के नाम लाखों करोड़ रुपये खर्च करने वालों ने हिन्दी के लिए कितना किया और आम लोग जिन्होंने हिन्दी को दुनिया के कोने कोने तक पहुँचाया उन्हें इसके लिए कितना रुपया मिला? जवाब होगा एक धेला तक नहीं। पिक्चर बनाने वाले जो हिन्दी में फिल्में बनाते हैं। वे अंग्रेजी में संवाद करते हैं अंग्रेजी फिल्में देखते हैं। और आम आदमी महँगे टिकिट खरीदकर इनकी जेबें भरता है। सरकार को टैक्स देता है और इन फिल्मों को देखता है। जो मजदूर बन कर विदेश गए वे कोई हिन्दी के प्रोफेसर नहीं थे न ही हिन्दी अधिकारी। वे सिर्फ हिन्दी बोलते थे। उन्होंने विदेश में रहकर विदेशी भाषा न अपनाते हुए हिन्दी को अपनी बोलचाल की भाषा बनाए रखा और हमारे यहाँ कई लोग अंग्रेजी बोलना अपनी शान से समझते हैं। जिसे अंग्रेजी नहीं आती उसे हिकारत से देखते हैं। ऐसे लोगों को तब शर्मिंदगी होती है जब यह विदेश में किसी विदेशी से अंग्रेजी में बात करते हैं और वो हिन्दी में जवाब देता है और कहता है हिन्दी अच्छी भाषा है। विदेशी लोग हिन्दी पढ़ रहे हैं और हम अभी भी अंग्रेजी के पाश में जकड़े हुए हैं। जो अपनी भाषा को बढ़ावा न दे उसे क्या कहा जा सकता है। चीनी लोग चीनी बोलकर जापान जापानी बोलकर उच्च तकनीक हासिल कर बैठे। वे अंग्रेजी बिल्कुल नहीं जानते फिर भी खूब फल फूल रहे हैं। हमारी भलाई इसी में है कि हम हिन्दी को अपना आधार बनाएँ और शान से अपना जीवन बिताएँ।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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