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व्यंग्य: डींगे हाँकने वाले

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बातें तो बहुत बढ़ी बढ़ी करते हैं मगर किसी भी काम भें सफल नहीं होते ऐसे लोग अपनी जमा पूँजी भी गँवा देते हैं और फिर बड़ी डींग हाँकते हैं । ये लोग अपने आप को दुनिया का सबसे बुद्धिमान समझदार इंसान समझते हैं और अपनी हर असफलता का दोष किस्मत को देकर खुद को निर्दोष साबित कर देते हैं ।
ऐसे ही एक व्यक्ति हैं राम भरोस जी पचास साल की उम्र हो गई हैआजकल ताश और शतरंज खेलकर अपना समय काट रहे हैं उनका लड़का आशीष अठ्ठाइस साल का है उसकी किराने की दुकान है जो ठीक ठाक चलती है वो सब उसकी मेहनत की कमाई का है रामभरोस का उसमें कोई योगदान नहीं है । आशीष व्यवसाय के संबंध में अपने पिताजी से कोई सलाह मशविरा नहीं लेता ऐसा वो अपनी मम्मी के कहने पर करता है जो उसके पिता की फितरत को अच्छी तरह जानती है। 
ऐसे लोग हर तरह का काम धंधा करते हैं पर किसी में भी सफल नहीं होते ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जिन्होंने अपने पिता की जीवन भर की कमाई दौलत को पूरी तरह ठिकाने लगा दिया है और अब मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। देखा जाए तो कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता काम करने वाला अगर सही हो तो वो काम कभी बिगड़ नहीं सकता।  
सुरेश बेरोजगार घूम रहा था इसके कारण उसकी शादी नहीं हो रही थी उसके पिताजी ने अपने रिटायर मेन्ट के पैसों से उसकी बुक और स्टेशनरी की दुकान खुलवा दी। दुकान खुलने से उसकी शादी हो गई। दुकान पर उसके पिताजी भी बैठते थे । जून जुलाई का महीना सीजन का था पर सुरेश अपनी ससुराल में जाकर जम गया दो महीने तक वो आया ही नहीं पूरे चार लाख रुपये खर्च कर के आया था वो। पिताजी बीमार होने के कारण दुकान पर नहीं बैठ सके थे। दो महीने बाद जब उसने दुकान खोली तो उसकी सारी ग्रहकी खत्म हो गई थी बहुत सारा सामान बेकार हो गया था जब कई दिनों तक कोई ग्राहक नहीं आया तब पिताजी से लडकर उसने दो लाख रुपये दुकान में खर्च कराए पर नतीजा कुछ नहीं निकला न उसमें धैर्य था न धंधे के गुर । वो दुकान बंद कर घर में ही रहने लगा और आखिर वही हुआ जिसका उसके पिताजी को डर था चालीस लाख की दुकान उसने दस लाख में बेच दी थी तथा ससुराल वालों की बातों में आकर पूरे पैसे लेकर पत्नी के साथ ससुराल चला गया। वहाँ आठ महीने में उसने पूरे पैसे बर्बाद कर दिए जब उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं रही तब ससुराल वालों ने उसे निकाल दिया। वो खाली हाथ वापस घर आ गया आजकल वो कुछ नहीं करता पिताजी की पेंशन से ही घर का खर्च जैसे तैसे चल रहा है। । और सुरेश निठल्ला होकर घूम रहा है। ये लोग किसी के दया के पात्र भी नहीं होते न ही कोई इनका सम्मान करता है। कोई अनजान इन्हें मिल जाए तो उसके सामने ये बड़ी बड़ी डींगे हाँकते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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