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चर्चित अचर्चित रचनाकार का असल सत्य व्यंग्य

हर बड़े शहर में ऐसे रनाकार भी मिल जाएँगे जिनकी  हर दो तीन महीने में किताबे छफ रही हैं भव्य विमोचन समारोह आयोजित हो रहा है वक्ता उनकी रचनाओं को कालजयी बतला रहे कुछ खाए पिए अघाए स्वनामधन्य समीक्षक उनकी रचना की नामचीन रचनाकारों से तुलना कर  उनकी रचना को उनके समकक्ष बतला रहे हैं बल्कि घोषित कर रहे  हैं और उनकी किताब विमोचन के बाद ऐसी काल कोठरी में पहुँच जाती है जिसका नामलेवा कोई नही बचता।
ऐसे ही एक रचनाकार की घटिया कविताओं का काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ उसका भव्य विमोचन समारोह शहर के सबसे बड़े सभागार में आयोजित हुआ । इसका कारण यह था कि वे मंत्री जी के भतीजे थे  एक निजी कॉलेज के संचालक और बहुत पैसे वाले  थे अस्सी पेज की किताब उन्होंने खुद के खर्चे से छपवाई थी अच्छा कागज बढ्रिया जिल्द  तथा आकर्षक कवर था उसका उसकी कीमत उन्होंने  दो हजार  रुपये रखी थी । मंत्री जी आयोजन में आए थे उनके कारण सभागार ठसाठस भरा हुआ था  शहर के सबसे बड़े समीक्षक  ने अपनी समीक्षा में उन्हें कालजयी घोषित कर दिया क्योंकि कई दिनोंतक उनकी खूब खातिरदारी हुई थी शहर की फाइव स्टार होटल में कई बार उन्होंने मुफ्त के डिनर का लाभ उठाया था  मँहगी शराब का सेवन किया था  तो  वे अपना परम कर्तव्य निभा रहे थे।  विमोचन के बाद शानदार भोज का अयोजन था  इसके साथ चाय काफी  के अलावा  विशेष लोगों के लिए और भी बहुत कुछ  था ।किताब की तो एक भी प्रति नहीं बिकी लेकिन लोगों ने महाभोज का खूब आनंद परिवार के साथ उठाया उनमें छोटे बच्चों की भी अच्छी संख्या थी।  इसके बाद उनकी किताब भी गुमनाम हो गई ।
शहर में कुछ ऐसे धनवान लोग भी हैं जिनके पास खूब पैसा बड्रा हाल है अयोजन में खर्च करने कै खूब पैसे हैं उन्हें चालू टाईप के  जुगाड़ू आयोजकों ने जबर्दस्ती कवि बना दिया है  उन्हें मुख्य अतिथि बना दिया जाता है और आयोजन का सारा खर्च उनसे वसूल लिया जाता है।  उनको भी  महान कवि निरूपित कर  उनका खूब दोहन किया जाता है और वो इसी गलतफहमी में रहते हैं कि वो बड़े कवि हैं। हर शहर में रचनाकारों की तो भरमार है लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है यही उनका सबसे बड़ा दुख है जिसे कोई दूर नहीं कर सकता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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