चार्वाक ने बहुत पहले ही कह दिया था जब तक जियो सुख से जियों कर्ज लेकर घी पियो। उनके अनुसार सुख में कमी नहीं होना चाहिए चाहे इसके लिए कर्ज ही क्यों न लेना।हो इस प्रवृति के लोग कर्ज तो ले लेते हैं पर उसे कभी अदा नहीं करते उनके पास अपना कुछ नहीं होता सब उधारी का होता है। यह लोग उधार लेते समय बड़े विनम्र होते हैं। उधार लेने के बाद कुछ दिनों तक इनमें विनम्रता रहती है फिर ये कठोर होते चले जाते हैं और अंत जब ज्यादा तकरार हो जाती है तो कह देते हैं नहीं देना एक पैसा भी तुमसे जो बने सो कर लो।
कॉलोनी के एक दुकानदार प्यारेलाल फ्लेट में किराये से रहने वाले सतीश के यहाँ चार बार आ चुके थे पड़ोसी ने पूछ बात क्या है वे बोले सतीश से चौबीस हजार रुपये उधारी के वसूलना है। वे बोले चौबीस रुपये भी नहीं वसूल पाओगे वो दस दिन से गायब हैं फ्लेट के मालिक का चार महीने का किराया भी हड़प गया है। कल जब पुलिस की मौजूदगी में ताला तुड़वाया। तब पता चला कि घर तो पूरा खाली है मालिक के लगाए पंखे सोफा और बेड तक गायब थे फ्लेट मालिक को पूरे दो लाख की चपत लगाकर सतीश चंपत हुआ है। उसके ऊपर लाखों की उधारी थी इसलिए शहर छोड़कर ही चला गया। कर्जदार कहीं न कहीं से कर्ज की जुगाड़ तो कर ही लेते है। अदा तो इन्हें कभी करना नहीं है इसलिए उनके लिए तो मुफ्त है। इनकी कर्ज खाऊ प्रवृति के कारण वंचितों को कर्ज नहीं मिलता। और यह कर्ज लेने में कामयाब हो जाते हैं। ये ऊँची ब्याज दर पर भी कर्ज ले लेते हैं क्योंकि इन्हें अदा तो करना नहीं। कर्ज देने वाला सोचता है कि मूल ही मिल जाए तो काफी है ब्याज तो बाद की बात है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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